केन्द्र और राज्य सरकारों की जमीनी हक़ीक़त

डॉ.अरविन्द जैन
भोपाल(मध्यप्रदेश)
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दादाजी मृत्यु शय्या पर थे,उन्होंने अपने बेटे से कहा-मुझे नाती को देखना हैl लड़के ने कहा-पिताजी,अभी मेरी शादी नहीं हुई तो बच्चा पैदा करने के लिए शादी करना अनिवार्य हैl शादी के बाद बच्चा हो न हो,यह कोई गारंटी नहींl दूसरा शादी होने के बाद कम से एक साल अधिकतम या कम से कम नौ माह तो लगेगा,तो दादाजी बोले-मैं तब तक जी पाऊंगा या नहीं,मुझे नाती देखना जरूर हैl बेटा बोलता है-पिताजी,यह कोई तैयार नहीं मिलता,समय तो देना पड़ेगा या फिर आप कहें तो दूसरे का बेटा,नाती बनाकर दिखा देंl नहीं बेटा,तुम्हारा ही बेटा चाहिएl बेटा-आपको इतनी जल्दी क्यों हैं ? मैं अपनी आँखों से देखना चाहता हूँ कि तू बाप बनने लायक हैं या नहीं और वंश चलाएगा कि नहींl
इतना ही उतावलापन हमारे देश के प्रधान-सेवक का हैl कारण उनको भरोसा नहीं है कि अगला चुनाव जीतेंगे या नहींl दूसरा उनका नाम स्वर्ण अक्षरों में लिखा जाएगा या नहींl कारण उनको भरोसा नहीं है या रहा हैl
बात यहाँ से शुरू कर रहा हूँ कि,बिहार में एक सप्ताह में कई लाख शौचालय बन गए,जितना मनुष्य को श्वांस में लेने में समय लगता है उससे कम समय मेंl वैसे स्वस्थ्य मनुष्य की श्वांस प्रति मिनट १८ बार और नाड़ी ७२ बार चलती हैl इतने समय में इतने अधिक शौचालय बन गए,कोई ताज़्ज़ुब नहींl कारण हम लोग इस समय डिजिटल इंडिया की ओर जा रहे हैं,नक़ल करके चिपकाया और भेज दिया..खेल ख़तमl
कारण बहुत साफ़ है कि जिस काम को करने में जितना समय लगता है,उतना तो देना होगाl बच्चे के जन्म में ९ माह लगना हैं तो लगेगा,ऐसा नहीं कि आप प्रधानमंत्री हो तो भगवान् आपको कम समय में फुर्सत कर देगाl `जाके पाँव न फटी बिवाई,वो का जाने पीर पराई`l  .बैंकों में जनधन खाता खोलना इसमें हेराफेरी की गुंजाईश कम हो सकती है,पर खाता खोलने वाले हमारे ही समान काली खोपड़ी वाले हैं
,उनसे कोई नहीं जीत सकताl एक बात और है कि,बाल सफ़ेद करने में साठ साल लग जाते हैं,पर काला करने में ३० मिनट लगते हैं,या उससे भी कमl
‌             आजकल ४८ माह की गूंज से देश गुंजायमान हो रहा है,कहीं घुटने बदलने,कहीं रसोई गैस या स्वच्छता  अभियान या शौचालय या सड़क निर्माण या गंगा सफाई,या विदेश यात्राओं का वर्णन या विरोधियों की छिछालेदारी करने में या जुमलेबाज़ी में समय बीत रहा हैl इससे हमारे चारों तरफ विकास की गंगा बहती नज़र आ रही है,जैसे वाराणसी में बनने वाला पुल अगले चुनाव के पहले बन जाना चाहिए,जो उपलब्धि मानी जाएगी,पर जल्दी-जल्दी में बिना पका,गर्भपात हो गया और अपने साथ कई लोगों को ले गया और उस पर कुछ नहीं,कारण दूध देने वाली गाय द्वारा बनाया जा रहा है । जैसा कहा भी गया है-‘मुखिया मुख-सा चाहिए,खान पान सो एक,पाले पोसे सकल अंग’। इसके लिए जरुरी नहीं हैं कि प्रधान सेवक सब जगह संलिप्त रहे। कम से कम वो इस कीचड़ सें  से दूर हैं जिसमे कमल खिलता है।
चुनाव में किए गए वादे कोई याद करने के लिए थोड़ी होते हैं। ‘वो वादे पर न आए न आए,कोई बात नहीं,बात कहने को रही और वक्त गुजर गया’। चुनाव में लग रहा था कि अलाउद्दीन का चिराग आ जाएगा और ‘खुल जा सिम सिम’ और सब कल्पना लोक में से हक़ीक़त में उतर आएगा। वैसे सेवक ने कोई आराम नहीं किया,इसमें दो राय नहीं है। कारण इतना अधिक लाव-लश्कर रहता हैं इनके पास काम करने वाला। उससे अधिक तो व्यापारी-मजदूर काम करते हैं यहां,इसमें कोई कमाल नहीं।इनके पास एक ही काम है-काम काम काम।
‘नोटबंदी’ से आशातीत सफलता मिली। काला धन जितना था,उससे अधिक निकल आया और आतंकवाद पर अंकुश लगा।  आजकल तो कश्मीर में अमन-चैन का वातावरण है। रोज हम आतंकवादियों को मार गिरा रहे हैं,  अपने जवानों की कोई गिनती नहीं । ४८ माह से चेतावनी देते आ रहे हैं और सफलता मिली। जीएसटी ने व्यापारियों की पौ बारह कर दी। खैर,ये तो उनके नीतिगत निर्णय रहे और इस समय पूरा देश-दल-मंत्री मंडल के अनुशासन में चल रहा है।
किसान आंदोलन का कोई महत्व नहीं,कारण-किसान की आदत है रोना रोने की। माँ ने दो बच्चों को एक-एक आम दिया,तो बड़े लड़के ने छोटे का आम छुड़ा लिया। छोटा रोने लगा पर उसे संतोष था कि बड़े भाई ने मेरा आम खाया,दूसरा आम अभी है। फिर बड़े भाई ने दूसरा आम खाना शुरू किया तो छोटा और ज़ोर से रोने लगा। माँ ने पूछा-छोटा क्यों रो रहा हैं ?
बड़ा लड़का बोला-जब मैं इसका आम खा रहा था तब रो रहा था। अब मैं अपना आम खा रहा हूँ तो फिर रोने लगा।किसान तो हमेशा रोने वाला है,अधिक पैदावार तो दाम के लिए रोना,और कम फसल तो लागत के लिए रोना।
मध्यप्रदेश में टीकमगढ़ जिले के पारा गांव के  ६०० शौचालय के सैप्टिक टैंक में पीने का पानी का संचय कर रहे हैं। यह स्वच्छ भारत अभियान की एक पहल है। मध्यप्रदेश सरकार ने बुंदेलखंड अंचल में पानी की कमी को देखते हुए ५४००० हैण्डपम्प खुदवाए हैं। पलेरा ब्लॉक के पारा गांव में ६०० परिवारों ने स्वयं अपने घर में शौचालय का निर्माण कराया पर जलाभाव के कारण पीने का पानी का उपयोग सैप्टिक टैंकों में किया जा रहा है। उसका कारण उसमें संचित पानी लम्बे समय तक ठंडा रहता है। इस गांव में दो हैण्ड पम्प हैं,पर फरवरी माह से सूखे होने के कारण दो-तीन बाल्टी पानी देते हैं। गायब के नजदीक पोखर भी पूरी तरह से सूख गया है। उसकी तलहटी पर बहुत बड़े-बड़े गड्ढे  हो चुके हैं,जमीन दरक गई  हैं…स्वच्छ भारत अभियान के अंतरगत सूखे शौचालय बनाए गए हैं,पर पानी की कमी के कारण उनका उपयोग कैसे करें ? इस कारण गांव वालों के पास पानी जमा करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। सैप्टिक टैंक में पानी रखने का मूल उद्देश्य यह है कि सैप्टिक टैंक के पानी का वाष्पीकरण नहीं होता है।
इन शौचालय के निर्माण के समय इन बातों का ध्यान नहीं रखा जाता है कि,वहां पानी की समुचित व्यवस्था है या नहीं। पानी के अभाव में उनका उपयोग करना संभव नहीं हैं और जब पीने के पानी की ही उपलब्धता नहीं हैं तो अन्य काम का कैसे उपयोग करें। इस कारण से प्रधान सेवक की योजनाएं जमीनी हकीकत से दूर नज़र आती हैं।
कागज़ों में,सरकार के रेकॉर्ड में,खर्च में कोई कमी नहीं हुई पर वास्तव में जो उपयोगकर्ता उपयोग करना भी चाहते हैं,वे जलाभाव के कारण क्या कर सकते हैं ? इसी प्रकार किसानों के आंदोलन के पीछे की मूल समस्या क्या है,कोई नहीं समझना चाहता। तर्क अनंत हैं और समस्या एक है-बैठो,बात करो और निराकरण करो,पर इसमें सबका अहम टकरा रहा है।
मात्र चुनाव जीतना और अधिकतम वादों की घोषणा करना अलग बात है,उनका क्रियान्वयन कैसे किया जाए,यह अलग बात है। ऐसा हो रहा है जैसे मुंगेरीलाल के हसीन सपने। अभी भी काम इन कर्मचारियों और अधिकारियों से कराना है। मंत्री-संत्री को कुछ भी ज्ञान नहीं है। उनका लक्ष्य बजट और कितना खर्च और चुनाव के कारण लगने वाले खरच की पूर्ति  है। इसका ज्वलंत उदाहरण स्वास्थ्य मंत्री,जल संसाधन मंत्री और सांसद ने पत्रकारवार्ता में स्वीकार किया है। यानी ये सरकार  की चार साल की उपलब्धियों से अनभिज्ञ हैं।
मानव का मस्तिष्क कोई प्रधान सेवक जैसा कम्प्यूटर तो है नहीं कि उन्हें सब योजनाएं,  पूरा इतिहास एक सांस में याद हो। वे तो उगल देते हैं,पर वैसा मस्तिष्क और याददाश्त सबकी कौन-सी होती है। पूरा जीवन योगमय हैं,भोग से कोसों दूर हैं और दिन-रात देश के विकास की चिंता,उसके बाद दल की चिंता और उसके बाद आगामी चुनाव की चिंता। बाकी कुछ तो विदेश दौरों की चिंता। इतनी चिंता करना ठीक नहीं हैं,
क्योंकि चिंता से कुछ नहीं होता है.. कर्म और पुरुषार्थ करना ही पड़ता है।
परिचय- डॉ.अरविन्द जैन का जन्म १४ मार्च १९५१ को हुआ है। वर्तमान में आप होशंगाबाद रोड भोपाल में रहते हैं। मध्यप्रदेश के राजाओं वाले शहर भोपाल निवासी डॉ.जैन की शिक्षा बीएएमएस(स्वर्ण पदक ) एम.ए.एम.एस. है। कार्य क्षेत्र में आप सेवानिवृत्त उप संचालक(आयुर्वेद)हैं। सामाजिक गतिविधियों में शाकाहार परिषद् के वर्ष १९८५ से संस्थापक हैं। साथ ही एनआईएमए और हिंदी भवन,हिंदी साहित्य अकादमी सहित कई संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। आपकी लेखन विधा-उपन्यास, स्तम्भ तथा लेख की है। प्रकाशन में आपके खाते में-आनंद,कही अनकही,चार इमली,चौपाल तथा चतुर्भुज आदि हैं। बतौर पुरस्कार लगभग १२ सम्मान-तुलसी साहित्य अकादमी,श्री अम्बिकाप्रसाद दिव्य,वरिष्ठ साहित्कार,उत्कृष्ट चिकित्सक,पूर्वोत्तर साहित्य अकादमी() आदि हैं। आपके लेखन का उद्देश्य-अपनी अभिव्यक्ति द्वारा सामाजिक चेतना लाना और आत्म संतुष्टि है।

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