कोना फटी…!

पूजा हेमकुमार अलापुरिया ‘हेमाक्ष’
मुंबई(महाराष्ट्र)
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वर्तमान युग में नितांत आधुनिकता और तकनीकी यंत्रों ने अनौपचारिक पत्रों का गला-सा घोंट दिया है। पत्रों की खुशबू,अपनेपन का आभास, शब्दों में अंकित रिश्तों की दृढ़ता सचमुच कहीं खो गई हैI आधुनिक यंत्रों ने इन्हें हम से छीन लिया हैI मोबाईल,इंटरनेट,ईमेलआदि द्वारा पलक झपकते ही दूरदराज में बैठे मित्रों एवं रिश्तेदारों तक संदेश पहुँच जाता हैI वीडियो कॉलिंग पर बातें करते-करते आप साक्षात् व्यक्ति को देख भी सकते हो। अत्याधुनिक यंत्रों ने दूरियों को कम कर दिया है। पत्रों की औपचारिकता केवल दफ्तर और कार्यालयों तक ही सीमित रह गई हैI
गुंजन को आज भी याद है,बचपन में माँ अक्सर बुआजी,दादाजी,चाचाजी आदि को कुशलमंगल जानने हेतु पत्र लिखवाया करती थी। सभी पत्रों के प्रत्युत्तर का इंतजार भी तत्परता से किया करते थे। पत्र का उत्तर मिलते ही कुशलमंगल पढ़ने पर,बस यही उत्साह रहता कि कब उसका जवाबी पत्र लिखा जाए। माँ पत्र ही कुछ इस अंदाज में लिखवाती थी,कि पत्र पढ़ने वाला एक-एक शब्द की भावना की अनुभूति महसूस कर सके। मुहावरे,कहावतें तो माँ को मुंह जुबानी याद थे,पत्र में भी इनकी कोई कटौती न रहती। कभी-कभी तो बड़े से पत्र पर सिर्फ चाँद अक्षर अंकित करवाती,जिससे बुआ जी मायके आने पर विवश हो जाए।बड़ा आनंद मिलता था इस पत्र व्यवहार में। घर में आने वाले सभी पत्रों और निमंत्रण पत्रों को संभालकर रखना भी गुंजन का ही काम था।
एक दिन गुंजन के माँ-पिताजी दोनों घर पर न थे। डाकिया एक पोस्ट कार्ड दे गया। पोस्ट कार्ड पढ़ने में तो उसे और भी मजा आता,क्योंकि उसे खोलने की आवश्यकता न होती थी। बस जल्दी-जल्दी उसने कार्ड पढ़ डाला। पढ़कर अति दुःख की अनुभूति हुई। मन में खटका हुआ तो था मगर इस बात का आभास न था। यही सोचकर बड़े ही संभालकर उस पोस्टकार्ड को गुंजन ने मंदिर के पास रख दिया कि माँ-पिताजी के आने पर उन्हें सूचित कर देगी। शाम को उसकी व्यस्तता कुछ यूँ रहती दोस्तों के साथ बचपन का आनंद लेना,माँ के साथ घर के छोटे-मोटे काज में हाथ बंटाना,शाला का गृहकार्य,अगले दिन पढ़ाए जाने वाले पाठ का वाचन करना आदि से मुक्ति मिलने पर सपरिवार रात्रि भोजन करना आदि। भोजन के उपरांत पिताजी से बातें करने और उनकी कहानी या जीवन के अनुभवों को सुनाने का यही उचित समय हुआ करता था। किसी कारणवश उस दिन वह जल्दी सो गई और उसे पोस्ट कार्ड के सन्दर्भ में माँ-पिताजी को बताना याद ही न रहा। एक दिन बीता,ऐसे ही दूसरा भी दिन बीत गया। इस तरह चार-पांच दिन बीत गए। तभी यकायक उसे याद आया कि गाँव से चाचाजी का पत्र आया था। उसने किसी को इस सन्दर्भ में न बताया I सुबह-सुबह शाला जाते उसने मंदिर से पोस्टकार्ड निकाल पिताजी को थमा दियाI
पोस्टकार्ड देखते ही उसके पिताजी की आँखे द्रवित हो उठी और भरे स्वर में बोले,-‘बेटा,यह पत्र कब मिलाI’ गुंजन उस कोने फटे कार्ड से अबोध थी I उस कोना फटी चिट्ठी का पिताजी के जीवन में क्या महत्व  था,सचमुच इसका बिलकुल भी आभास न थाI उसने भी अबोध बालिका जैसा प्रत्युत्तर दिया,-‘यही कोई चार-पांच दिन पहलेI’
उसका उत्तर सुनते ही पिताजी का स्वर जो अब तक केवल दुःख में लिप्त था लेकिन अचानक स्वर में क्रोध और विशिष्ट झल्लाहट लिए उभर पड़ा,-‘तुम्हें अक्ल नहीं हैI इस विषय में तुम्हें उसी दिन बताना था। तुम्हें थोड़ा भी आभास है कि तुमने कितनी बड़ी गलती की हैI’ पिता जी के इन शब्दों ने उसकी आँखों को द्रवित कर दियाI वह डर से थर-थर काँपने लगी। माँ ने शक भरी नज़र से पिताजी और गुंजन की ओर देखा,और पूछा,-‘आखिर हुआ क्या है ? सुबह-सुबह क्यों क्रोधित हुए जा रहे हो ? और यह क्या है आपके हाथों में ? कुछ कहोगे भी ….?’
पिताजी पत्र पढ़ने के पश्चात कुछ शिथिल से पड़ गए,इसलिए माँ ने उनके हाथों से कोना फटा पत्र ले फटाफट पढ़ डाला और सारे माजरे से वाकिफ हो गई। ‘अरे! गाँव वाले फुफाजी न रहेI बड़ा दुखद समाचार है,और कल ही उनकी तेरहवीं भी है,कैसे पहुँचा जाएगा ? इतनी देरी से पत्र भेजने से तो फोन पर ही इतला कर दी होती तो दुःख में शरीक हो जाते। अब प्रश्न यही है कि कैसे पहुंचा जाए…?’
‘गलती उनकी नहीं है I उन्होंने समय से ही कार्ड भेज दिया था I तुम्हारी लाड़ो ही इस कार्ड को कहीं धरकर भूल गई थीI बुआजी के चले जाने पर भी फूफाजी ने सदैव रिश्तों की डोर को संभाले रखा थाI कितना स्नेह था हमसेI याद है अगर फूफाजी न होते तो…I’  गुंजन के माँ-पिताजी पुरानी स्मृतियों की गागर में कहीं गोते से लगाने लगेI पिताजी के मनोभावों को देख, पीड़ा,दादाजी के प्रति स्नेह और अपनी गलती का अहसास हो वह सरपट भीतर बिस्तर में जा धंसी।  गुंजन ने तब जाना कोना फटी चिट्ठी का अर्थ,-‘किसी अपने के दूर जाने का संकेत है कोना फटी चिट्ठी।  अपनों के दुःख में शामिल होने का प्रतीक है कोना फटी चिट्ठी,हृदय और अक्षु को विदीर्ण कर अश्रुओं का उमाड़ है कोना फटी चिट्ठी, अपनों को खोने का आभास है कोना फटी चिट्ठी,अपनों को सांत्वना,हौंसला और कर्तव्य निभाना है कोना फटी चिट्ठी…I
परिचय-पूजा हेमकुमार अलापुरिया का साहित्यिक उपनाम ‘हेमाक्ष’ हैl जन्म तिथि १२ अगस्त १९८० तथा जन्म स्थान दिल्ली हैl श्रीमती अलापुरिया का निवास नवी मुंबई के ऐरोली में हैl महाराष्ट्र राज्य के शहर मुंबई की वासी ‘हेमाक्ष’ ने हिंदी में स्नातकोत्तर सहित बी.एड.,एम.फिल (हिंदी) की शिक्षा प्राप्त की है,और पी.एच-डी. की शोधार्थी हैंI आपका कार्यक्षेत्र मुंबई स्थित निजी महाविद्यालय हैl रचना प्रकाशन के तहत आपके द्वारा आदिवासियों का आन्दोलन,किन्नर और संघर्षमयी जीवन….! तथा मानव जीवन पर गहराता ‘जल संकट’ आदि विषय पर लिखे गए लेख कई पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए हैंl हिंदी मासिक पत्रिका के स्तम्भ की परिचर्चा में भी आप विशेषज्ञ के रूप में सहभागिता कर चुकी हैंl आपकी प्रमुख कविताएं-`आज कुछ अजीब महसूस…!`,`दोस्ती की कोई सूरत नहीं होती…!`और `उड़ जाएगी चिड़िया`आदि को विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में स्थान मिला हैl यदि सम्म्मान देखें तो आपको निबन्ध प्रतियोगिता में तृतीय पुरस्कार तथा महाराष्ट्र रामलीला उत्सव समिति द्वारा `श्रेष्ठ शिक्षिका` के लिए १६वा गोस्वामी संत तुलसीदासकृत रामचरित मानस पुरस्कार दिया गया हैl इनकी लेखनी का उद्देश्य-हिंदी भाषा में लेखन कार्य करके अपने मनोभावों,विचारों एवं बदलते परिवेश का चित्र पाठकों के सामने प्रस्तुत करना हैl

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