खादी के किरदार निराले होते हैं…

अनुपम आलोक
उन्नाव(उत्तरप्रदेश)
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खादी के किरदार निराले होते हैं,
सत्य,अहिंसा के धनुआ से धुनी गई
सर्व-धर्म के  शुचि चरखे से गुनी गईl 
त्याग,तपस्या की धवला अँगनाई में-
जग कुटुंब की भाव नीति से बुनी गईl 
 
 
फिर भी इसे पहनने वाले काँधे क्यों, 
दुर्योधन के कुल रखवाले होते हैंl 
खादी के किरदार निराले होते हैंll
 
सूत-सूत में महकी थी इसके आजादी,
इंच-इंच में शोभित थी छवि गाँधीवादीl 
बलिदानों की रक्त-माधुरी से पावन यह-
रची-बसी थी भारत के अंतस में खादीl 
 
किन्तु स्वार्थ संग हुए कपट के गठबंधन से-
केंचुए भी पहनें तो ब्याले होते हैंl 
खादी के किरदार निराले होते हैंll
शकुनि,भीष्म,के साथ-साथ जयचंदों ने,
खादी पहनी आज राष्ट्र अरि वृंदों नेl 
कुंठित अंतस गाँधी का भी सोच रहा-
क्या कर डाला है खादी को बंदों नेl 
 
धवल सूत के इन पावन बसनों में अक्सर, 
जाने क्यों अब मन के काले होते हैंl 
खादी के किरदार निराले होते हैंll
परिचय-अनुपम ‘आलोक’ की साहित्य सृजन व पत्रकारिता में बेहद रुचि है। अनुपम कुमार सिंह यानि ‘अनुपम आलोक’ का जन्म १९६१ में हुआ है। 
बाँगरमऊ,जनपद उन्नाव (उ.प्र.)के मोहल्ला चौधराना निवासी श्री सिंह ने वातानुकूलन तकनीक में डिप्लोमा की शिक्षा ली है। काव्य की लगभग सभी विधाओं में आप लिखते हैं। गीत,मुक्तक व दोहा में विशेष रुचि है। आपकी प्रमुख कृतियाँ-तन दोहा मन मुक्तिका,अधूरी ग़ज़ल(साझा संकलन)आदि हैं। प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में शताधिक रचनाएँ प्रकाशित हो चुकी हैं। आपको सम्मान में साहित्य भूषण,मुक्तक प्रदीप,मुक्तक गौरव,मुक्तक शास्त्री,कुण्डलनी भूषण, साहित्य गौरव,काव्य गौरव सहित २४ से अधिक सम्मान हासिल हुए हैं।

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