खुदा बहरा नहीं है…

सुनील जैन `राही`
पालम गांव(नई दिल्ली)

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खुदा बहरा नहीं है। खुदा तभी सुनता है,जब आपकी बात या दर्द में दम हो,अथवा आपकी इबादत में दम हो। खुदा बहरा नहीं है,देश और विश्‍व बहरा हो रहा है। देश में जिस गति से बहरों की संख्‍या बढ़ी है,यह आतंकवाद से ज्‍यादा खतरनाक है।
बहरों से भरा पड़ा है देश। कर्जदार,बॉस,दुकानदार कोई नहीं सुनता। दुकानदार वही सुनता है,जिसमें उसे फायदा होता है। देश में बहरों की संख्‍या और प्रजातियां बढ़ी हैं। इन प्रजातियों में असली-नकली बहरे हैं। बहरे होने का नाटक करने वाले,आधे-पूरे बहरे,पारिवारिक बहरे,शहरी बहरे,ग्रामीण बहरे…कुल मिलाकर सभी प्रकार के बहरे पूरे देश में पूरे गर्व के साथ विचरण कर रहे हैं। ये ऐसे बहरे हैं,जिनका बहरापन कान में `इयर फोन` से दिखाई देता है।
कुछ बहरे हैं जो कार्यालयों में बैठे हैं,नगरपालिका,सरकारी कार्यालयों में,पूछताछ के नाम पर बने डिब्‍बे में बैठे हैं और घर में पति और देश में नेता। ये बहरों की मुख्‍य प्रजातियों में शामिल हैं। बहरा होना भगवान की देन नहीं है,चलायमान(मोबाईल) की देन है। बहरा क्‍या देख रहा है,क्‍या सुन रहा है,आपको न तो दिखाई देगा न सुनाई देगा। उसकी अपनी दुनिया है-अलग है। अकेले में हंसना-रोना,मायूस होना,उल्‍लास से झूम उठना या फिर एकटक देखते रहना। उसका कोई तर्क नहीं होता। उसका तर्क या कारण उसे समझ में आता है। वह अपने में मस्‍त है। उसे आप दीवाना,पागल,मोक्ष गामी या कुछ भी कह सकते हैं। वह बहरा है, न सुनता है,न ही सुनेगा। वह केवल वही सुनता है जो लीड के माध्‍यम से सुनाया जाता है,वह वही देखता है जो पर्दे पर आता है।
इनकी एक प्रजाति है,उसे `सड़क के बहरे` कहते हैं। आप इन्‍हें `इयर फोन` लगाए सड़क पार करते,गाड़ी चलाते,या चालक सीट पर झूमते देख सकते हैं। इनके पास से गुजरने के लिए हार्न रूपी यंत्र बजाना होता है। सड़क पर इन्‍हें ठोंक नहीं सकते,बेचारे बहुत ही मासूम,लाचार,निरीह और मजबूर हैं। उनकी बीमारी असाध्‍य है। वे अपने आपको `इयर फोन` से मुक्‍त नहीं कर सकते। आप रुकें,हाथ जोड़कर निवेदन करें,कहें-महोदय,अगर आप सड़क के किनारे चलेंगे तो,हम सड़क पार कर सकेंगे।
घर में भी बहरों की संख्‍या बढ़ी है। पहले दादाजी,नानाजी, ताऊजी बहरे हुआ करते थे,लेकिन वे असाध्‍य बीमारी ग्रसित नहीं थे। अब घर के लोग फेसबुक और व्हाट्सएप असाध्‍य बीमारी से ग्रसित हैं। यह असाध्‍य बीमारी,कैंसर जैसी बीमारी को मात दे रही हैं। घर के बहरों को कुछ कहना है तो उन्‍हें सन्देश कीजिए। घर आए मेहमानों की सूचना भी व्हाट्सएप या फेसबुक के माध्‍यम से दें।
इस बीमारी से ग्रसित व्‍यक्ति दीन-दुनिया से परे होता है। उसे सुख-दुख की अनुभूति नहीं होती। भोजन में कुछ भी परोस दीजिए। उसकी अपनी दुनिया होती है। उस दुनिया में फेसबुक और व्हाट्सएप के माध्‍यम से आप प्रवेश कर सकते हैं। हिमालय की कंदरा में बैठे योगी(मुख्‍यमंत्री नहीं) की तरह होता है,जिसका सांसारिक सुखों से लेना-देना नहीं होता।
इस बीमारी का इलाज अभी तक खोजा नहीं जा सका है। जो वैज्ञानिक इस बीमारी के इलाज की खोज में गए थे,वे आज तक नहीं लौटे। उनकी अथक यात्रा देखते हुए दूसरे वैज्ञानिकों ने इस दिशा में कदम बढ़ाने से इन्‍कार कर दिया।
इस बीमारी के लक्षण-ऐसा व्‍यक्ति `इयर फोन` से जुड़ा होता है। उसके हाथ में पॉवर बैंक होता है। जहां भी जाता है,पॉवर प्‍लग की तलाश में उसकी नजरें घूमती रहती हैं। उसे भूख-प्‍यास नहीं लगती। वह फटी जीन्‍स,अस्‍त-व्‍यस्‍त कपड़ों में,कानों में `इयर फोन` पर स्‍वयं से बात करते हुए चलता है। उसे हार्न,रोने-हँसने या किसी अन्‍य प्रकार की आवाज सुनाई नहीं देती। दूर से देखने पर चिकित्सक लगता है, लेकिन यह भ्रम है।
ऐसे व्‍यक्ति समाज,कार्यालय,घर और मोक्ष की प्राप्ति की दिशा में बीच सड़क पर किसी बड़े वाहन से टकराने की उम्‍मीद में `इयर फोन` लगाए,गाड़ी,बाइक या फिर किसी बड़े गडढे की तलाश में विचरण करते पाए जाते हैं। उनके कान में `इयर फोन` है,आप सुन और देख सकते हैं,पुलिस के लफड़े से बचने के लिए इन बहरों से बचें।
देश में बहरे पहले भी हुआ करते थे। ये पांच साल में एक बार सुनते हैं और फिर से बहरे हो जाते हैं। उनसे कुछ भी कहते रहें,वे हाथ जोड़कर खड़े रहेंगे। आप बोलते रहिए,वे सुनते रहेंगे। आप सोच रहे हैं, वे समस्‍या के बारे में समझ रहे हैं,ऐसा भ्रम है। वे सुनने-समझने का नाटक करते हैं। वे न सुनते हैं,न समझते हैं। वे जन्‍मजात बहरे हैं,जो केवल देख सकते हैं। उनकी सुनने की बारी आते ही बहरे हो जाते हैं। वे संसद से लेकर सड़क तक सुनाते हैं,लेकिन आपकी बात नहीं सुनते। जनता सुनती है,सुनना उसका धर्म है,उसे ही सुनाया जाता है,लेकिन उसकी कोई नहीं सुनता।
बहरों का जिस तेजी से विकास हुआ,उतना विकास अगर अर्थव्‍यवस्‍था का होता तो,देश फ्रांस नहीं,अमेरिका को पछाड़कर अग्रणी भूमिका में होता।

परिचय-आपका जन्म स्थान पाढ़म(जिला-मैनपुरी,फिरोजाबाद)तथा जन्म तारीख २९ सितम्बर है।सुनील जैन का उपनाम `राही` है,और हिन्दी सहित मराठी,गुजराती(कार्यसाधक ज्ञान)भाषा भी जानते हैं।बी.कॉम.की शिक्षा खरगोन(मध्यप्रदेश)से तथा एम.ए.(हिन्दी,मुंबई विश्वविद्यालय) से करने के साथ ही बीटीसी भी किया है। पालम गांव(नई दिल्ली) निवासी श्री जैन के प्रकाशन खाते में-व्यंग्य संग्रह-झम्मन सरकार,व्यंग्य चालीसा सहित सम्पादन भी है।आपकी कुछ रचनाएं अभी प्रकाशन में हैं तो कई दैनिक समाचार पत्रों में लेखनी का प्रकाशन होने के साथ आकाशवाणी(मुंबई-दिल्ली)से कविताओं का सीधा और दूरदर्शन से भी कविताओं का प्रसारण हो चुका है। राही ने बाबा साहेब आम्बेडकर के मराठी भाषणों का हिन्दी अनुवाद भी किया है। मराठी के दो धारावाहिकों सहित करीब १२ आलेखों का अनुवाद भी कर चुके हैं। इतना ही नहीं,रेडियो सहित विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में ४५ से अधिक पुस्तकों की समीक्षाएं प्रसारित-प्रकाशित हो चुकी हैं। आप मुंबई विश्वविद्यालय में नामी रचनाओं पर पर्चा पठन भी कर चुके हैं। कुछ अखबारों में नियमित व्यंग्य लेखन करते हैं। एक व्यंग्य संग्रह अभी प्रकाशनाधीन हैl नई दिल्ली प्रदेश के निवासी श्री जैन सामाजिक गतिविधियों में भी सक्रीय है| व्यंग्य प्रमुख है,जबकि बाल कहानियां और कविताएं भी लिखते हैंl आप ब्लॉग पर भी लिखते हैंl आपकी लेखनी का उद्देश्य-पीड़ा देखना,महसूस करना और व्यक्त कर देना है।

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