खूब रोया दरख्त

प्रदीप कुमार दाश ‘दीपक’
रायगढ़ (छत्तीसगढ़)

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स्नेहिल स्नेह
जगमग दीपक
राह उज्ज्वल।

 

लुटाता मधु
खिलकर कुसुम
भौंरा लोलुप।

 

धन्य है माता
लुटाकर सर्वस्व
तृप्त ममता।

 

लांघता रहा
अपनी परछाई
लांघ न सका।

 

दरख्त कटा
थका लकड़हारा
छाया ढूँढता।

 

शरद प्रात
मोतियों की फसल
खेत गेहूँ का।

 

मध्य रात्रि में
देख अपनी छाया
शिशु सहमा।

 

तुम्हारी याद
चाँद तारे साथ थे
गुजरी रात।

 

माँ बिना आज
सो नहीं पाया शिशु
लोरी की याद।

 

नीड़ उजड़े
खूब रोया दरख्त
कटते वक्त।

 

गोधूलि बेला
तालाब से सूरज
विदा ले रहा।

 

रो रहा चूल्हा
चू रहे हैं छप्पर
मन है गीला।

परिचय-प्रदीप कुमार दाश का उपनाम `दीपक` हैl आपकी जन्म तारीख १० अगस्त १९७९ हैl शिक्षा-एम.ए.(हिन्दी साहित्य व राजनीति शास्त्र)एवं बी.एड. है। इनकी प्रकाशित कृति में-मइनसे के पीरा( छत्तीसगढ़ी का प्रथम हाइकु संग्रह) ,हाइकु चतुष्क(हिन्दी,उड़िया,छत्तीसगढ़ी व संबलपुरी हाइकु संग्रह)सहित `संवेदनाओं के पदचिह्न( काव्य संग्रह)आदि हैंl आपके द्वारा सम्पादित कृति में-प्राची(म.वि.वार्षिक पत्रिका), जागृति(विद्यालयीन पत्रिका) सहित कबीर एक दृष्टि (समालोचना)आदि हैंl श्री दाश की रचनाओं का प्रकाशन प्रदेश से लेकर राष्ट्रीय स्तर के पत्र-पत्रिकाओं में हुआ है,और निरंतर जारी हैl आपको सम्मान में कोविद,दीनबंधु,राष्ट्रभाषा रत्न, राष्ट्रभाषा आचार्य,शास्त्री,लोक कवि कबीर पुरस्कार,मैन आॅफ द इयर-२००१ और राष्ट्रीय युवा साहित्यकार सम्मान प्रमुख रूप से मिले हैंl भारत के कई साहित्यिक एवं सास्कृतिक संस्थानों द्वारा पुरस्कृत व सम्मानित किया गया है। सम्प्रति से आप हिन्दी व्याख्याता (जिला-सरगुजा,छग) हैंl इनका स्थायी निवास और संपर्क साँकरा,जिला-रायगढ़ (छत्तीसगढ़) हैl आपकी लेखनी ब्लॉग पर भी जारी हैl

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