गाय को चारा डालकर दुर्गति में भागीदार तो नहीं…!

दुर्गेश कुमार मेघवाल ‘डी.कुमार’
बूंदी (राजस्थान)
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भारत सभ्यता के प्रारम्भिक काल से ही कृषि प्रधान देश के रूप में विश्व सभ्यताओं में अग्रण्य रहा है। कृषि अपनी प्रगति की प्रारम्भिक अवस्था से ही धेनु पुत्रों पर आश्रित रही है। कृषक पुत्रों और धेनु पुत्रों के इसी समायोजित कृत्य के फलस्वरूप,कृषक पुत्रों द्वारा अपने कर्मभाई को सम्मान देने के प्रयास में ही शायद धेनु को भी अपनी धात्री माता के समान ‘पय का पान’ में भी सहयोग के कृतज्ञता स्वरूप माता का स्थान उनमें से ही कतिपय कृषक पुत्रों ने दिया हो,और हो सकता है वही तथ्य उसकी सार्थकता के कारण वेदों में भी स्थान पा गया। इसीलिए, वैदिक संस्कृति से उदित विचारधारा में धेनु को माता का पूज्य स्थान विचारधारा के अंग के रूप में प्रतिस्थापित हो गया। सभ्यता की प्रगति में और रामायण,महाभारत और अन्य विचारधारा के प्रचारक ग्रन्थों में कौशल्या,यशोदा जैसी माताओं की ख्यात वृद्धि से माँ का स्थान ज्यों-ज्यों पूजनीय के चरम स्तर की ओर अग्रसर होता रहा,त्यों-त्यों ही गाय का स्थान भी धात्रीमाता से उच्चतर न सही,निम्नतर भी नहीं हुआ। इस पर इन्हीं महाकाव्यों में धेनुकथाओं द्वारा और श्रीकृष्ण के अवतार को भी गोपालक के रूप में चित्रण कर और कृष्ण के बाद भी भारत के अनन्य लोक देवताओं द्वारा धेनुवंशजों की रक्षार्थ प्राणोत्सर्ग बलिदान ने गाय के स्थान को और महत्ता प्रदान कीl इसी कारण से भारत के वर्तमान तक के कृषकपुत्रों ने गाय को जिस प्रकार परिवार में माता का स्थान होता है,उसी प्रकार गाय को आदर सहित पूजकर ही स्वर्ग प्राप्ति के लिए प्रयास पीढ़ी दर पीढ़ी अबाधित क्रम से किए हैं।
सभ्यता में मशीनों के प्रादुर्भाव से धीरे-धीरे परिस्थितियां परिवर्तित हुई,जिसका प्रभाव गाय में मातृ स्थान पर भी पड़ा।इसमें कुछ कारण मार्क्सवाद का भी पड़ा हो,तो गलत नहीं कहा जा सकता है जो इस बात को भी प्रमाणित करने के लिए पर्याप्त है कि मनुष्य स्वभावगत कितना स्वार्थी होता हैl इसी तथ्य को कवि कृपाराम ने अपने सेवक राजिया को अपने सोरठे में भी कहा-
“मतळब री मनवार,चुपके लावे चुरमो।
बिन मतलब मनवार,राब न राखे राजियाll”
कृषक पुत्रों ने भी इस सोरठे को चरितार्थ करते हुए मशीनों के सामने धेनु पुत्रों का महत्व कम मानकर उनको कर्मभाई के रिश्ते से धीरे-धीरे मुक्ति प्रदान करने का क्रम शुरू कर दिया।
इसके कारण वृष माता को धेनुमाता का जो पूजनीय स्थान प्राप्त हुआ था,वो स्थान क्षीण होना अवश्यम्भावी होता गया।
यह भी तब तक तो सहनीय था,जब तक स्थिति धेनु पुत्रों तक ही सीमित रहती। आज की व्यवसायिक सोच के युग में जहां एक-एक सौदा कई तराजुओं में तौल और मोल-भाव कर किया जाता है,तो वो तो आमदनी चवन्नी और खर्चा रुपया वाला सौदा हो तो निश्चित रूप से कोई समझदार ही चवन्नी प्राप्त कर रुपया खर्च करना चाहेगा। और,उसमें भी चव्वनी तो बढ़ने से रही हो और रुपया दिन दोगुनी और रात चौगुनी गति से अग्रसर हो रहा हो,तो धेनु माता क्या धायमाताl उस पर कलियुग तो जन्मदात्री माता को भी नहीं बख्श रहा है,तो इसमें किसका दोष ?
व्यवसायिक सिद्धांतों के प्रकाश में देखा जाए तो मांग और पूर्ति के सिद्धांत के अनुसार जिसकी मांग ज्यादा होती है,उसकी यदि पर्याप्त उपलब्धता न हो तो उसका मूल्य भी द्रोपदी के चीर से भी होड़ करना अपना धर्म समझता है। और धर्म करने में भी कुछ पाने की चाह में चालीस से पचास रूपए की क्या बिसात और बात जब स्वर्ग और नर्क में से स्वर्ग की निश्चितता तय करती हो,तो यह तुच्छ खर्च नित्य भी किया जाए तो भी लाभ का सौदा ही प्रतीत होगा,लेकिन इसी धर्म के पाठ में कृषक पुत्र तो जब इस लोक में भी नारकीय जीवन से त्रस्त वो स्वर्ग नर्क में से भी कुछ पैसों की कमी में नर्क भी मिले तो नर्क से नर्क में जाने में उसे क्या हर्ज हो सकता है। शायद इसी सोच के परिणाम स्वरूप जो कृषक खुद गाय का चारा स्वयं अपनी धरतीमाता के वक्ष को चीर हरित दुग्ध को अपनी धेनुमाता को खिलाने के स्थान पर सरे-बाजार कुछ रुपयों में बेचने को ही अपना धर्म समझता है। जिसको वो चाहे तो स्वयं धर्म कर अपना स्थान लगभग नि:शुल्क ही स्वर्ग में अपना पंजीकरण पक्का कर सकता है,लेकिन चारा चक्र के चलते जो चारा इतिहास में सीधा किसान से गाय के पोषणार्थ उदरपूर्ति करता था,वर्तमान में किसान के खेत से थोक चारा व्यापारी और क्रमशः छोटे चारा व्यापारी तक होते हुए धर्मकांक्षी श्रद्धालुओं की जेब से निकलकर ही गाय के मुख में प्रवेश कर पाता है। यदि इस बीच गाय अपने हक को कहीं प्राप्त करने का अधिकार जमाने का प्रयास भी करे,तो उसे निश्चित तौर पर डंडे के रूप में दण्ड अदा करना ही पड़ता है,भले ही वो गाय स्वयं किसान की ही क्यों न हो,
क्योंकि जिस निवाले को गाय पेट भरने के लिए किसान से प्राप्त करना चाह रही है,किसान उसे भौतिक बाजार में बेच कर अतिरिक्त मुनाफा कमाना चाहता हैl बाजार में भी धर्म के नाम पर जो चारा बिना प्रयास के खेतों में खरपतवार के रूप में सरपट उत्पन्न हो जाता है,उसे भी गायों के मुँह से छीनकर बाजार में बेचकर फिर कहीं जाकर गाय के उदर तक पहुँच पाता है।
चूँकि,वह शहर के बाजार में दाम चुकाने के बाद ही मिल पाता है,जो स्वर्ग प्राप्ति के टिकट से तो सस्ता ही होता है अतः और अधिक से अधिक दाम उसका बढ़ता जाता है।
शहर के गो-पालक और स्वयं किसान भी उस धर्म के मोल पर अपने गोवंश के लिए चारा न खरीद पाने के कारण उसे मुफ़्त का चारा खाकर उदर पूर्ति करने हेतु चारा संघर्ष में धकेलकर अपने को सही ठहराने का प्रयास करते हैं।
यह सही है कि,गो वंश का प्राचीन काल के बनिस्पत आज उपयोग कम हो गया है,फिर भी इसे नगण्य नहीं कहा जा सकता है,इसलिए चारा चक्र यदि सही और सकारात्मक रूप से चले तो गाय ही नहीं,सभी पशुओं को मुहैया होने में दिक्कत नहीं रहेगीl इससे चारे की मांग-पूर्ति भी सन्तुलित बनी रहेगी।

परिचय-आप लेखन क्षेत्र में डी.कुमार के नाम से पहचाने जाते हैं। दुर्गेश कुमार मेघवाल की जन्मतिथि-१७ मई १९७७ तथा जन्म स्थान-बूंदी (राजस्थान) है। आप राजस्थान के बूंदी शहर में इंद्रा कॉलोनी में बसे हुए हैं। हिन्दी में स्नातकोत्तर तक शिक्षा लेने के बाद शिक्षा को कार्यक्षेत्र बना रखा है। सामाजिक क्षेत्र में आप शिक्षक के रुप में जागरूकता फैलाते हैं। लेखन विधा-काव्य और आलेख है,और इसके ज़रिए ही सामाजिक मीडिया पर सक्रिय हैं।आपके लेखन का उद्देश्य-नागरी लिपि की सेवा,मन की सन्तुष्टि,यश प्राप्ति और हो सके तो अर्थ प्राप्ति भी है। २०१८ में श्री मेघवाल की रचना का प्रकाशन साझा काव्य संग्रह में हुआ है। आपकी लेखनी को बाबू बालमुकुंद गुप्त साहित्य सेवा सम्मान-२०१७ सहित अन्य से सम्मानित किया गया है|

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