गिरते अश्क़ बताते हैं…

अवधेश कुमार मिश्र ‘रजत’
वाराणसी(उत्तरप्रदेश)
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जिनसे हो उम्मीद वफ़ा की,
दिल को वही जलाते हैं।
ख़्वाब दिखाने वाले अक्सर,
सारी उमर जगाते हैंll

गीतों की दुनिया में रहता
लिखता मन के भावों को,
अपने हाथों ही सिलता हूँ
दिल के गहरे घावों को।
पीड़ा के आलिंगन का सुख
गिरते अश्क़ बताते हैं,
ख़्वाब दिखाने वाले अक्सर,
सारी उमर जगाते हैंll

सहता हूँ हर वार सदा मैं
अपनों के बेगानों के,
ढूँढ रहा अपना-सा कोई
बस्ती में इंसानों के।
राह कठिन है मंज़िल ओझल
फिर भी कदम बढ़ाते हैं,
ख़्वाब दिखाने वाले अक्सर,
सारी उमर जगाते हैंll

घोर निराशा की रातों में
दीपक बनकर जलना है,
अवसादों के तूफानों से
हरपल हमको लड़ना है।
यादों में उनकी खो कर हम
खुद को `रजत` सताते हैं,
ख़्वाब दिखाने वाले अक्सर
सारी उमर जगाते हैंll

परिचय-अवधेश कुमार मिश्र का साहित्यिक उपनाम ‘रजत’ है। १ जनवरी १९८१ को वाराणसी में इनका जन्म हुआ है। वर्तमान में मंडुआडीह, वाराणसी में निवासरत हैं। आपको हिंदी एवं भोजपुरी भाषा का ज्ञान है। उत्तर प्रदेश राज्य के वासी श्री मिश्र ने एम.एस-सी.(सूचना तकनीक)की शिक्षा प्राप्त की है। निजी उच्च शिक्षण संस्थान में सिस्टम एडमिनिस्ट्रेटर के पद पर कार्यरत हैं। इनकी लेखन विधा-काव्य (गीत,कविता,छंद,मुक्तक) है। प्रीत की छाँव (कविता संग्रह), सहोदरी सोपान ३(साझा काव्य संग्रह) तथा काव्य करुणा (साझा काव्य संग्रह)में आपकी लेखनी आ चुकी है तो विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में रचना प्रकाशन भी हो रहा है। लेखन से-राष्ट्र गौरव रत्न,काव्य करुणा सम्मान, साहित्य भूषण सम्मान और अटल सम्मान मिल चुका है। ब्लॉग पर भी अपनी अभिव्यक्ति करते हैं। आपकी लेखनी का उद्देश्य-आम जनमानस को कविता के माध्यम से सामाजिक कुरीतियों के प्रति जागरूक करना, सामयिक देशहित के मुद्दों पर आवाज़ उठाना व नई पीढ़ी को हिंदी साहित्य के प्रति आकर्षित करना है। सभी वरिष्ठ रचनाकार आपके लिए प्रेरणा पुंज हैं।

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