गिरे हुए नेता

सुनील जैन `राही`
पालम गांव(नई दिल्ली)

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गिरा हुआ नेता,सत्ता में बैठे नेता से ज्यादा कद्दावर होता है। नेता कहीं भी-कैसे भी गिर जाते हैं। उनके गिरने का स्तर नहीं होता। नेताजी का गिरना कोई नई बात नहीं है। नेता हर बार सत्ता‍ के लिए गिर जाते हैं। नेता,जीवन में गिरता जरूर है। जो ना गिरे,वह नेता नहीं। कुछ नेता गिरते ही हैं,गिराने के लिए। ये नेता नये पुल की तरह होते हैं,जो आसानी से गिर जाते हैं। उन्हें गिराने की जरूरत नहीं होती। सत्ता रूपी गाजर उनके सामने रख दो,वे गिर जाएंगे। उनका गिरना कीमतों के गिरने से ज्यादा आसान है। नेताजी का गिरना जितना आसान है,उससे ज्‍यादा उठना मुश्किल है।
प्रजातंत्र का दूसरा नाम ही है गिरे हुए नेताओं का तंत्र। सत्ता प्राप्ति के लिए गिरे हुए नेता काम आते हैं। गिरे हुए नेता सत्ता में केवल व्हिप के समय याद आते हैं। नेता अकेले ही गिरते हैं,वे कभी झुण्ड में भी गिरते हैं। उनके गिरने से सत्ता गिर जाती है,तो कभी उनके गिरने से सत्ता वापस सत्ता में आ जाती है। इन गिरे नेताओं को बिकाऊ भी कह सकते हैं। कभी-कभी पूरी पार्टी ही बिक जाती है,अरे हाँ,गिर जाती है। ऐसे नेता का गिरना सत्ता और विपक्ष के लिए कैरम बोर्ड की रानी की तरह होता है,जिसके हत्थे चढ़ जाए,वह सत्ता में। गिरा हुआ नेता हमेशा सत्ता के लिए रानी रहता है।
गिरे हुए नेताओं का एक ही मकसद होता है-सत्ता के लिए गिरना। ये कभी नि:स्वार्थ भाव से नहीं गिरते। इनका गिरना और गोबर गिरना एक समान होता है। गोबर जब उठता है,या उठाया जाता है तो वह साथ में मिट्टी लेकर उठता है,वैसे ये ही जब भी उठते हैं सत्ता लेकर ही उठते हैं।
नेताजी अकेले सड़क पर नहीं चलते,इसलिए वे नहीं गिरते हैं। अक्सर वे खुली जीप में चलते हैं। दो इधर-दो उधर बॉडीगार्ड खुली जीप के साथ दौड़ते हैं। उन जवानों का दौड़ना देश की सीमा पर तैनात जवान से कम नहीं होता। सीमा पर तैनात जवान के पास पीने के लिए पानी और खाने के लिए खाना होता है तथा सामने होती है मौत। नेताजी के साथ दौड़ने वाले जवानों के पास पानी,खाने का पैकेट, गर्मी या ठंड से बचने का कोई इंतजाम नहीं होता।
नेता जब तक खुली जीप में जवानों के बीच है,सुरक्षित है। जीप के साथ जवानों का होना यानी सत्ता का हाथ में होना है।
वैसे नेता वही होता है,जो गिरता है। जो गिरा हुआ नहीं,वह नेता नहीं। नेता बनने की पहली शर्त होती है-वह कितना गिर सकता है। नेताओं की एक आभासी दुनिया होती है,जो उन्हें गिरे हुए होने का अहसास कराती है। जब तक सत्ता का सहारा मिलता है,वे नहीं गिरते। सत्ता वह संबल है जो नेता को गिरने नहीं देती। दूसरे शब्दों में सत्ता में रहते हुए,उसके गिरे होने का अहसास सीबीआई को भी नहीं होता। जैसे ही सत्ता सुख,खुली जीप का सुख और रोड-शो का सिलसिला समाप्त होता है,नेता गिर जाता है। सत्ता से,दल से जनता के बीच से।
नेता के गिरने में महिलाओं का बड़ा योगदान होता है। कभी-कभी महिलाओं के सहारे वह खड़ा भी रहता है। जब नेता खड़ा होता है,उसके बड़े-बड़े कट-आउट लगाए जाते हैं। नेता उन कट-आउट के सहारे खड़ा रहता है। गली,मुहल्ले,कस्बे,शहरों,राजधानी में। राजधानी में खड़े कट-आउट सड़क पर बने फुटपाथ पर लगाए जाते हैं,जिससे कार-बाइक वाले उनके कट-आउट का कद देख सकें। उनका असली कद तो जनता `मत` देते समय तय करती है।
नेताओं को गिरने से बचाने के लिए आज फिर राजधानी में कोई रैली या रोड-शो होना था। नेता जी को रामलीला मैदान में खड़ा करके,उनके राजनीतिक जीवन को गिरने से बचाना था। कई बार उन्हें गिरने से इसी तरह बचाया गया था। उन्हें गिरने से बचाने में शाला के बच्चों का बड़ा योगदान होता है। वे जानते हैं,बच्चे मन के सच्चे होते हैं,उनकी तरह धूर्त और मक्कार नहीं होते। उन्हें गिरने से बचाने में उन मजदूरों का भी बहुत बड़ा हाथ होता है,जो ५०० रुपए की दिहाड़ी पर रामलीला मैदान आते हैं। नेताजी गिरे नहीं,इसके लिए नारे लगाते हैं। नेताजी जिन्दाबाद,जो जिन्दा नहीं है,नेताजी अमर रहें,नेताजी मर रहे हैं,जब तक सूरज चांद रहेगा,नेताजी तुम्हारा नाम रहेगा यानी जैसे सूरज और चांद दिखाई तो सबको देते हैं,लेकिन उनको कोई पा नहीं सकता। उसी तरह नेताजी दिखाई तो देते रहेंगे,लेकिन उनके कार्य चांद और सूरज की तरह दूर से आप देखते रहेंगे।
`रोड-शो` के लिए फुटपाथ पर बहुत सबेरे नेताजी का कट-आउट लगा था। नेता जी नहीं गिरें, इसलिए उन्हें रस्सियों से बांधा गया था। उनकी मधुर मुस्कान के पीछे धूर्तता को छिपाया गया था। नेता जी को सफेद कुर्ते में झका-झक दिखाया गया,कट-आउट का साफ संदेश था,नेताजी में कोई `ब्लैक होल` नहीं है। नेता जी को खड़ा करने में मजदूरों का बड़ा हाथ होता है। नेताजी के कट-आउट को रस्सियों से बांधकर,फुटपाथ पर टांग दिया गया था,लेकिन सुबह-सुबह उत्पाती बन्दरों ने नेता जी के कट-आउट को गिरा दिया। उनका कट-आउट आधा सड़क पर और आधा फुटपाथ पर था। रात के अंधेरे में,अंधे मोड़ पर पड़े गिरे नेता जी की वजह से सुबह न जाने कितने बाइक वाले गिरे। यह कहना सही है-कितनों के सर फूटे,कितनों के हाथ-पैर टूटे। नेता जी का गिरना जितना खतरनाक होता है, उससे भी ज्यादा नुकसानदायक होता है नेताजी के कट-आउट का गिरना।
जब नेता जी के कट-आउट के गिरने से कइयों के मुंह-हाथ टूट जाते हैं तो नेता जी के गिरने से देश भी टूट-फूट सकता है।

परिचय-आपका जन्म स्थान पाढ़म(जिला-मैनपुरी,फिरोजाबाद)तथा जन्म तारीख २९ सितम्बर है।सुनील जैन का उपनाम `राही` है,और हिन्दी सहित मराठी,गुजराती(कार्यसाधक ज्ञान)भाषा भी जानते हैं।बी.कॉम.की शिक्षा खरगोन(मध्यप्रदेश)से तथा एम.ए.(हिन्दी,मुंबई विश्वविद्यालय) से करने के साथ ही बीटीसी भी किया है। पालम गांव(नई दिल्ली) निवासी श्री जैन के प्रकाशन खाते में-व्यंग्य संग्रह-झम्मन सरकार,व्यंग्य चालीसा सहित सम्पादन भी है।आपकी कुछ रचनाएं अभी प्रकाशन में हैं तो कई दैनिक समाचार पत्रों में लेखनी का प्रकाशन होने के साथ आकाशवाणी(मुंबई-दिल्ली)से कविताओं का सीधा और दूरदर्शन से भी कविताओं का प्रसारण हो चुका है। राही ने बाबा साहेब आम्बेडकर के मराठी भाषणों का हिन्दी अनुवाद भी किया है। मराठी के दो धारावाहिकों सहित करीब १२ आलेखों का अनुवाद भी कर चुके हैं। इतना ही नहीं,रेडियो सहित विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में ४५ से अधिक पुस्तकों की समीक्षाएं प्रसारित-प्रकाशित हो चुकी हैं। आप मुंबई विश्वविद्यालय में नामी रचनाओं पर पर्चा पठन भी कर चुके हैं। कुछ अखबारों में नियमित व्यंग्य लेखन करते हैं। एक व्यंग्य संग्रह अभी प्रकाशनाधीन हैl नई दिल्ली प्रदेश के निवासी श्री जैन सामाजिक गतिविधियों में भी सक्रीय है| व्यंग्य प्रमुख है,जबकि बाल कहानियां और कविताएं भी लिखते हैंl आप ब्लॉग पर भी लिखते हैंl आपकी लेखनी का उद्देश्य-पीड़ा देखना,महसूस करना और व्यक्त कर देना है।

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