गुंडे सरकार हो गए

डॉ.दिलीप गुप्ता
घरघोड़ा(छत्तीसगढ़)
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सड़कें-मोहल्ले-चौक तो बटमार हो गए,
उनकी गली के गुंडे सरकार हो गए।
जितने उचक्के रौशनी गुल करके,लूटते,
क़ानून और धरम के ठेकेदार हो गए।
लुटते गरीब आम,जमीनों से बेदखल,
वर्दी में लुटेरों के…सरदार हो गए।
विधान औ क़ानून का,डंडा है ‘आम’ पर,
औ ‘ख़ास’,कुर्सियों पर मक्कार हो गए।
भगवान् खुदा गंगा थाना और कचहरी,
प्रवचन अनेक…ठगी के दरबार हो गए।
कहीं बल औ छल तो कहीं नोटों की गड्डियां,
बेशरम की तरह बढ़े,भ्रष्टाचार हो गए।
काबिलियत की अब कहीं जगह नहीं रही,
पग-पग में घूसखाऊ…व्यापार हो गए।
आशा भी आस्था भी बलात्कार की शिकार,
बाबाओं के भी हाथ में…तलवार हो गए।
मां-बेटी-बहन हो रहीं…शिकार हवस की,
हवसी को धर्म-कानून…बेकार हो गए॥
परिचय-डॉ.दिलीप गुप्ता का साहित्यिक उपनाम `दिल` है। १७ अप्रैल १९६६ को आपका जन्म-घरघोड़ा,जिला रायगढ़ (छग) में हुआ हैl वर्तमान निवास घरघोड़ा स्थित हनुमान चौक में ही हैl छत्तीसगढ़ राज्य के डॉ.गुप्ता ने एम.डी.(मेडीसिन)और डीएसी की शिक्षा हासिल की हैl कार्यक्षेत्र में आप निजी चिकित्सा कार्य करते हैंl सामाजिक गतिविधि में अग्रणी होकर असहायों,गरीबों,बीमारों की हरसम्भव सहायता के साथ ही साहित्यिक सेवाएं-जन जागरण में भी तत्पर रहते हैं। आपकी लेखन विधा-गीत,ग़ज़ल तथा कविताएं हैंl प्रकाशन में खुद की `हे पिता`(ओ बाबूजी)पुस्तक व करीब 20 संकलनों में रचनाएं प्रकाशित हुई है। आपको प्राप्त सम्मान में-कला श्री २०१६,डॉ.अब्दुल कलाम सम्मान सहित साहित्य अलंकरण २०१६ और दिल्ली से `काब्य अमृत` सम्मान आदि ख़ास हैंl २०१६ में कवि सम्मेलन में `राष्ट्रीय सेवा सम्मान` ४ बार प्राप्त किया है। डॉ.दिलीप की लेखनी का उद्देश्य समाज और संसार से बुराइयों को समाप्त कर अच्छाइयों से जन-जन को वाकिफ कराना है।

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