ग्रामीण जनजीवन पर वैश्विकरण का बढ़ता प्रभाव

डॉ.मोनिका देवी
कादरगढ़(उत्तर प्रदेश )
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वैश्विकरण की दुर्जेय आंधी ने हमारे सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन में उथल-पुथल मचाकर रख दी है। हमारी पारंपरिक जीवन पध्दति और आचार-व्यवहार में इतना भारी बदलाव आ गया है कि हम अपनी जड़ों से पूरी तरह उखड़ गए हैं। इस बदलाव ने आम आदमी को दिग्भ्रमित कर दिया है। एक ओर वह वैश्विक गाँव का संभ्रांत नागरिक बनने के ‘भरम’ में जीता है तो दूसरी ओर अनेक श्रेष्ठ मूल्यों का क्षरण और रिश्तों-नातों की ऊष्मा के रीत जाने की पीड़ा उसे निरंतर साल रही है।
भूमंडलीकरण ने अनेक ऐसी सौगातें हमें अपने ‘महाप्रसाद’ के रूप में दे डाली है कि,हमसे उन्हें न ग्रहण करते बन पड़ रहा है,न छोड़ते। वैश्विक गाँव के इस परिदृश्य का आम आदमी पर जो प्रभाव पड़ा है,उसका आकलन करते हुए अपसंस्कृति की इस आंधी के प्रतिरोध का स्वर मिलाकर चलने को तैयार हो सकेगा और कोई इन स्वरों में अपना स्वर मिलाकर चलने को तैयार हो सकेगा तो यह श्रम सार्थकता हो पाएगा। भूमंडलीय आर्थिकता का सबसे अधिक श्याम पक्ष यह है कि जितना अधिक एक ही वर्ग, समाज का बहुत छोटा प्रतिशत अमीर होता चला जाएगा,उसी अनुपात में गरीब और गरीब होता चला है।

     यहाँ एक तरफ़ आधुनिकता की विकल्पीय दुनिया है तो,दूसरी ओर आधुनिकता का बहुविकल्पीय समन्वय भी है। आज गाँव में उत्तर आधुनिकता विचारों की बहुलता और जीवन को विभिन्न आयामों से देखने की जरूरत पर जोर देती है। आज वैश्विक गाँव की संस्कृति भी काफी अलग हो रही है।  विभिन्न संस्कृतियों के बीच संवाद की कहानियाँ लिखी जा रही है। इसके ठीक विपरीत संस्कृतियों के बीच टकराव के दृश्य देखने को मिलते हैं। इसके साथ-साथ शांति और सौहार्द्र की स्थापना भी राजनीति का हिस्सा बनती जा रही है।
आज ग्रामीण जीवन में पहले  की तरह लोगों में आपसी स्नेह नहीं दिखाई देता है। लोक संस्कृति का दायरा सिमटा जा रहा है। तीज-त्योहारों व शादी में भाई-चारा,मेल-मिलाप नहीं रहा। लोग स्वार्थी बनते जा रहे हैं। सिर्फ अपने स्वार्थ के कारण एक-दूसरे से वार्तालाप करते हैं। आज युवाओं में मदिरापान शाही महफिल का हिस्सा बनता जा रहा है। लोग बड़ी शान से इसका सेवन करते हैं। विविधताओं का अस्तित्व किसी मुद्दे पर दो पक्षों को बाँटने,जोड़ने,टकराने के साथ साथ आपसी बातचीत से समाधान का विकल्प भी पेश करता है।
काशीनाथ सिंह के उपन्यास ‘रेहन पर रग्घू‘ में अपनी नई पीढ़ी को अमेरिका बसते देख रग्घू मास्टर को कचोट है कि- “कभी सोचा था कि एक छोटे से गाँव से लेकर अमेरिका तक फ़ैल जाओगे ? चौके में पीठा पर बैठकर रोटी प्याज  नमक खाने वाले तुम अशोक विहार में बैठकर लंच और डिनर करोगे।”
गाँव-समाज के लोग भी अमेरिका के आकर्षण से बँधे किस प्रकार वहां भाग रहे हैं,उसका पीड़ादायक वर्णन कुछ तो इस उपन्यास ‘रेहन पर रग्घू ‘ में देखा जा चुका है।
रामसिंह दिवाकर ने अपने उपन्यास ‘अकाल संध्या’ में इस स्थिति का मार्मिक आख्यान रचा है। उनके उपन्यास में ‘माई के दालान’ में कहा गया है कि माई के दालान की बड़ी ममतामयी छाँव है,जिसके बीच नन्दू के बाबू जी के इंतकाल और फिर नन्दू के अमेरिका चले जाने के बाद आस-पड़ोस के वे सब आश्रयहीन लोक-सौखीलाल,महावीर मियाँ,उलटदास आदि में से कुछ के परिवारजन माई के यहाँ ही आश्रय पाए हुए हैं। बेटे के अमेरिका चले जाने के बाद इन सब परायों के बीच अपनापन खोजती माँ अमेरिका में बैठे बेटे की ‘दुर्गति’ देखती है और उसकी दशा का वर्णन नन्दू को फोन करके बताती है।
“तुम्हारा मन तो लगता है न नंदू अमेरिका में”…माई ने फ़ोन पर बात करते हुए पूछा था। नन्दू का जबाव था-“यह सोचने का समय कहाँ मिलता है।”
माई नन्दू का जबाब सुनकर सन्न रह गई थी। “मन को भी भुला दिया नन्दू ने। इतना समय नहीं है नन्दू के पास कि सोच सके मन के बारे में ? मन की बात अमेरिका जाते ही एकदम झूठी हो गई !”
दरअसल,वैश्विकरण के कारण भारतीय संस्कृति,धर्म, साहित्य,कला,समुदायों और जीने के कई तरीके बदल गए हैं। यह बदलाव पश्चिमी संस्कृति के विस्तार के कारण है। अधिकांश लोग ग्रामीण इलाकों में रहते हैं,खेती से ही जीवनयापन किया जाता है।  इनको  शिक्षा,राजनीति,कृषि,प्रौधोगिकी, संस्कृति,सामाजिक मूल्यों और देश में रोजगार ने प्रभावित किया है। नई उन्नति से ग्रामीण जनजीवन पर बहुत प्रभाव पड़ रहा है। वे शिक्षा-रोजगार के लिए पलायन कर रहे हैं। वैश्विक अपसंस्कृति की आंच से साहित्य जगत भी अता नहीं रह सकता था। वह भी अपने समय और समाज से प्रभावित होता ही है।
परिचय- डॉ.मोनिका देवी का साहित्यिक नाम डॉ.मोनिका शर्मा है। इनकी जन्म तारीख १६ जून १९८८ एवं जन्म स्थान-कादरगढ़ है। आपका 
वर्तमान और स्थाई पता-कादरगढ़,जिला शामली(उत्तर प्रदेश )है। डॉ.शर्मा ने एम.ए.,एम.फिल. सहित पी-एच.डी.,  और अनुवाद डिप्लोमा की शिक्षा प्राप्त की है। कार्यक्षेत्र-नौकरी(सहायक प्रवक्ता-हिंदी विभाग)है। सामाजिक गतिविधि के अंतर्गत आप समाज में फैली बुराई के विभिन्न मुद्दों पर आलेख लिखती हैं।इनकी लेखन विधा-कविता और आलेख है। आपकी रचित ५ पुस्तक प्रकाशित हो गई है तथा ५ पर कार्य जारी है। इसमें भगवती शरण मिश्र के उपन्यास लक्ष्मण रेखा में समकालीनता बोध और अंतिम दशक की कहानियों में वैचारिक संघर्ष आदि हैं। अब तक आपको २५ सम्मान मिल चुके हैं। इनकी विशेष उपलब्धि-पीएचडी है। लेखनी का उद्देश्य-समाज की सोई चेतना को जगाना है। 

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