चुनावी संध्या

विजयसिंह चौहान
इन्दौर(मध्यप्रदेश)
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स्वतंत्रता दिवस  स्पर्धा विशेष………………

भाषण,भिया का चुनावी संध्या का भाषण सुनते-सुनते आंख कब लग गई,पता ही नहीं चला। भोजन की अल्प मात्रा के कारण पेट का संतुलन बिगड़ रहा था,वहीं सुबह १५ अगस्त की उहापोह ने रातभर,एक आँख से सोने पर मजबूर कर दिया।
सुबह १८ जगह भाषण,१७ स्थानों पर झण्डा जो फहराना है। गली-मोहल्ले से लेकर विद्यालय,महाविद्यालयों के कार्यक्रम राह तक रहे हैं। ड्रेस-अप से लेकर गेट-अप तक सब टकाटक होना चाहिए। मजाल है,कलफ की रेखा टूट जाए। सफेदी ऐसी हो कि चांद की शीतलता और बगुले की उज्जवलता भी फीकी पड़ जाए।
अलसुबह ही पट्ठों का आना शुरू हो गया…भिया चलें…देर हो रही है। एक सेवादार ने आकर भैय्या को मक्खन लगाते हुए,अधमरी मुस्कान में फरमाया कि भिया,…गाड़ी सजा ली है…मन्दिर से रात को ही हार ले आया था,….गाड़ी पर डाल दिए..,गाड़ी एकदम झमकुड़ी लग रही है,तभी दूसरे सेवादार ने अपनी मुण्डी भीड़ में से निकालते हुए….एक बार और मक्खन का लेप लगाया। भिया…फोटू वाले को भी बोल दिया, आपके आगे ही आगे चलेगा। हर अदा पर आपको ताली मिले या न मिले, लेकिन हर अदा पर क्लिक जरूर करेगा। अच्छी कवरेज के लिए सभी को चाक-चौबंद कर दिया है।
तभी,….घरवाली ने भी थाल सजाकर ऐसे तिलक लगाया,जैसे जंग का सिपाही किसी रण में जा रहा हो। मन फूले नहीं समा रहा था। रौबदार चेहरे पर,चावल युक्त तिलक,झकाझक सफेदी,दोनों हाथों में सोने की अगूंठियाँ समा नहीं रही थी। मोटे से डील-डोल पर आधी बरनी इत्र बरसाया,तब जाकर भिया के अर्न्तमन में बहार आई। अर्रे-छर्रे,पट्ठों के साथ रवाना हुआ… कांरवा भिया का। रास्ते में लगे पोस्टर देख भिया मन्द-मन्द मुस्करा रहे थे,वहीं मक्खन पालिस वाले चमचे,पोस्टर से भिया की प्रसिद्धि का बखान कर रहे थे। पोस्टर को देखकर केजी प्रथम का छात्र भी बता सकता है कि कौन किसको निहार रहा है,या ललचाई नजरों से प्रभावित करना चाहता है,तिरछे देखने वाले,जरूरत से ज्यादा साफ दांत वाले,बिन बात के कैसे मुस्कराया जाता है,यह सब पोस्टर देखकर बखूबी समझा जा सकता है।
दूसरी ओर….देशभक्ति के गीत पूरे वायुमण्डल में गूंज रहे थे। इस दिन पत्ता-पत्ता झूम उठता है, सावन भी इस त्यौहार में अपनी उपस्थति दर्ज कराता है….जय हो..। हरी,पीली झण्डियाँ तो कहीं रांगोली से झांकता वेलकम,भिया के स्वागत को आतुर है। ठण्ड में बच्चों ने ठिठुरते हुए अगवानी की। अबोध बच्चे पैरे छू रहे थे,तो कुछ ने इसी बहाने भिया के लहराते जूते के बंध तक बांध दिए और भिया थे,कि फूले नहीं समा रहे…।
छोटू पत्रकार का लिखा भाषण वैसे तो रट लिया था,फिर भी हेडफोन का सहारा भिया के लिए एक सकारात्मक सोच का परिणाम निकला। भिया का भाषण चल्लू हुआ,….कल्लू भी इतना उस्ताद निकला कि,एक इशारा करते ही हेडफोन ऑन। बच्चों…विज्ञान जगत ने हमें कहाँ से कहाँ पहुंचा दिया…सब कुछ बटन दबाते ही सहज-सुलभ है। आज हम चांद तक जा पहुंचे। आज के समय में राशन मिले या न मिले कोई बात नहीं,मगर एक फोन पर बर्गर-पिज्जा मगांया जा सकता है,इसलिए अगर आगे बढ़ना है तो हम सभी को विज्ञान का सहारा लेना होगा…इतना कहकर भिया ने अपनी वाणी को विराम दिया।
बच्चों के लडडू चूंकि वनस्पति घी में बने थे,लिहाजा भिया ने शक्कर हो जाने का बहाना बनाकर मसाले का मीठा पान खा लिया। कल्लू भी खुश…छोटू भी प्रसन्न..।
आज दिन भर का हिसाब लगा रहे थे कि संध्या भाभी ने भिया को भरचक नींद से जगाया…उठिए…राशन की दुकान पर घासलेट का डिब्बा रख आईए….लंबी कतार होगी…अगर आज घासलेट नहीं मिला तो घर का चूल्हा कैसे जलेगा! रातभर खर्राटे मारते रहे,जरा सुध नहीं है घर की। भिया ने दोनों आँखें मसली,सफेदी का नशा उतर चुका और भिया घासलेट का डिब्बा थामे चल पड़े…राशन की जुगाड़ में। जय हो।

परिचय : विजयसिंह चौहान की जन्मतिथि ५ दिसम्बर १९७० और जन्मस्थान इन्दौर(मध्यप्रदेश) हैl वर्तमान में इन्दौर में ही बसे हुए हैंl इसी शहर से आपने वाणिज्य में स्नातकोत्तर के साथ विधि और पत्रकारिता विषय की पढ़ाई की,तथा वकालात में कार्यक्षेत्र इन्दौर ही हैl श्री चौहान सामाजिक क्षेत्र में गतिविधियों में सक्रिय हैं,तो स्वतंत्र लेखन,सामाजिक जागरूकता,तथा संस्थाओं-वकालात के माध्यम से सेवा भी करते हैंl लेखन में आपकी विधा-काव्य,व्यंग्य,लघुकथा और लेख हैl आपकी उपलब्धि यही है कि,उच्च न्यायालय(इन्दौर) में अभिभाषक के रूप में सतत कार्य तथा स्वतंत्र पत्रकारिता जारी हैl

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