चूहा मुक्‍त देश

सुनील जैन `राही`
पालम गांव(नई दिल्ली)

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जार्जिया देश के चूहा मुक्‍त देश घोषित होने के साथ ही विश्‍व चूहा समुदाय सकते में आ गया। अगर इस तरह सभी देश सक्रिय हो गए तो विश्‍व चूहा मुक्‍त हो जाएगा। चूहा मुक्‍त होना देश के लिए खतरनाक है। अगर चूहे ही नहीं होंगे तो,व्‍यवस्‍था में उठ रही संड़ाध का इल्‍जाम किस पर लगाया जाएगा। व्‍यवस्‍था में उठ रही संड़ाध के लिए चूहे और सिर्फ चूहे जिम्‍मेदार हैं। अधिकारी, कर्मचारी,नेता और व्‍यापारी नहीं। चूहे देश कुतर रहे हैं। राष्‍ट्र विरोधी चूहों को पनाह दे रहे हैं। आओ कुतरों,अब धर्म भी कुतरने लगे हैं। कुतरना हर चूहे का दैनिक धर्म है। कुछ चूहे इच्‍छाधारी सांप होते हैं। कुछ भेष बदलकर कुतरने का काम करते हैं। चूहों पर कई संस्‍थाएं शोध कर रही हैं। एक शोध संस्‍थान ने चूहों पर बड़ा काम किया। इस बड़े काम को चूहे की प्रजाति कुतर गई। यह बड़ा काम फिर से नई परियोजना के रुप में नए बजट के साथ आया है। नई योजना में कुछ चूहे योजना के अनुसार शामिल हो गए। इस योजन में चूहों को देखते ही गोली मारने के आदेश दिए गए,लेकिन चूहे इस परियोजना की फाइल में महफूज हैं।
चूहों पर शोध कोई नई बात नहीं है। कुछ बीमारियों को आप रिश्‍तेदारों से साझा नहीं कर सकते। जब भी नई बीमारी का पता चलता है,वैज्ञानि‍क उसके इलाज के लिए टीका तैयार कर उसका पहला प्रयोग चूहों पर ही करते हैं। यही कारण है चूहे,इन्‍सान को अपना सबसे बड़ा दुश्‍मन मानते हैं। बीमार पड़े आदमी और प्रयोग चूहों पर…चूहा न हुआ प्रयोगशाला का पदार्थ हो गया।
देश की कोई-सी भी व्‍यवस्‍था या योजना,बिना फाइल के नहीं चल सकती है। किसी भी विकास के लिए जरूरी है,फाइल। फाइल के लिए जरूरी है,उसे कुतरा जाए। फाइल के कुतरने को समीक्षा करना भी कह सकते हैं। जब फाइल को कुतरा जाता है तो नई फाइल बनती है,नई फाइल से नई दलाली तैयार होती है। फाइलें इसीलिए कुतरी जाती हैं,जिससे देश का विकास कुतर-कुतर हो। सीधा-सीधा विकास न तो संभव है और न ही उचित।
चूहे घरों में,कार्यालयों में,मंत्रालयों में और फाइलों में पाए जाते हैं। फाइलों और चूहों का जन्‍म-जन्‍मांतर का संबंध है। ऐसा शायद ही कोई कार्यालय होगा,जहां चूहे नहीं हों। यह संबंध कार्यालय के भीतर और बाहर भी होता है। जहां-जहां फाइल जाती है,चूहे कुत्‍तों की तरह सूंघते हुए पहुंच जाते हैं। कुत्‍ते पुलिस के लिए काम करते हैं,लेकिन चूहे पुलिस के लिए नहीं,दलालों के लिए काम करते हैं। जिस फाइल से फायदा नहीं होता, उस फाइल को चूहा कुतर जाता है। फाइल बंद कर दी जाती है,-‘लिख दिया जाता,फाइल चूहा कुतर गया।’ जिस फाइल पर निर्णय नहीं लेना होता,उस पर लिख दिया जाता है- ‘कृपया बोलें या चूहा कुतर गया।’ ‘चूहों का विनाश में योगदान’ पर कई बार चर्चाएं हुईं,आज भी हो रही हैं। उनके इस योगदान पर कार्यशाला से लेकर राष्‍ट्रीय और अंतर्राष्‍ट्रीय स्‍तर पर सम्मेलन आयोजित किए गए।
विश्‍व समुदाय चूहे जैसे देशों से परेशान है। ये चूहे जैसे देश कभी विश्‍व शांति के लिए खतरा साबित हो सकते हैं। इन चूहे देशों ने चूहों को प्रशिक्षण देना शुरू कर दिया है। इनके प्रशिक्षित चूहे देश के लिए,समाज के लिए,धर्म के लिए,जाति के लिए,शहर,गांव सभी के लिए घातक हैं।
साहित्‍य के चूहे भी होते हैं। ये चूहे साहित्‍य सृजन नहीं करते। ये चूहे साहित्यिक सृजन से चुकने के बाद साहित्‍य कुतरने के लिए काम करते हैं। इन साहित्‍य के चूहों को विघ्‍नसंतोषी भी कहा जाता है। वैसे साहित्‍य कुतरने में चूहों का विशेष योगदान है। साहित्‍य के साथ-साथ पुरस्‍कार भी कुतर जाते हैं। कुछ कुतरे हुए पुरस्‍कार साहित्‍यकार वापस कर देते हैं। उन्‍हें पुरस्‍कारों में चूहों के मल की बू आती है। कुछ पुरस्‍कार लेने जाते हैं,लेकिन कुतरे हुए पुरस्‍कार लेना पसंद नहीं करते। झूठा या कुतरा हुआ पुरस्‍कार बिरला ही ग्रहण करता है।साहित्‍यकार पुरस्‍कार कुतर कर वापस भी कर देते हैं। कुतरे हुए पुरस्‍कार विरोध का प्रतीक माने जाते हैं।
चूहे कुतरते हैं,समाज,फाइल,फसल, अनाज और आपके संबंधों को। इन चूहों के दो पैर होते हैं,लेकिन मानसिकता चूहों की होती है। ये समाज को घुन की तरह कुतरते हैं। समाज इन चूहों का कुछ भी बिगाड़ नहीं सकता। इन चूहों के बिल मंत्रालय की दहलीज से लेकर से नींव के पत्‍थर तक होते हैं।
चूहे-देश,समाज,साहित्‍य और परिवार में आस्‍तीन के सांप की तरह छुपे रहते हैं। चूहा मुक्‍त होना मुश्किल ही नहीं,असंभव है।

परिचय-आपका जन्म स्थान पाढ़म(जिला-मैनपुरी,फिरोजाबाद)तथा जन्म तारीख २९ सितम्बर है।सुनील जैन का उपनाम `राही` है,और हिन्दी सहित मराठी,गुजराती(कार्यसाधक ज्ञान)भाषा भी जानते हैं।बी.कॉम.की शिक्षा खरगोन(मध्यप्रदेश)से तथा एम.ए.(हिन्दी,मुंबई विश्वविद्यालय) से करने के साथ ही बीटीसी भी किया है। पालम गांव(नई दिल्ली) निवासी श्री जैन के प्रकाशन खाते में-व्यंग्य संग्रह-झम्मन सरकार,व्यंग्य चालीसा सहित सम्पादन भी है।आपकी कुछ रचनाएं अभी प्रकाशन में हैं तो कई दैनिक समाचार पत्रों में लेखनी का प्रकाशन होने के साथ आकाशवाणी(मुंबई-दिल्ली)से कविताओं का सीधा और दूरदर्शन से भी कविताओं का प्रसारण हो चुका है। राही ने बाबा साहेब आम्बेडकर के मराठी भाषणों का हिन्दी अनुवाद भी किया है। मराठी के दो धारावाहिकों सहित करीब १२ आलेखों का अनुवाद भी कर चुके हैं। इतना ही नहीं,रेडियो सहित विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में ४५ से अधिक पुस्तकों की समीक्षाएं प्रसारित-प्रकाशित हो चुकी हैं। आप मुंबई विश्वविद्यालय में नामी रचनाओं पर पर्चा पठन भी कर चुके हैं। कुछ अखबारों में नियमित व्यंग्य लेखन करते हैं। एक व्यंग्य संग्रह अभी प्रकाशनाधीन हैl नई दिल्ली प्रदेश के निवासी श्री जैन सामाजिक गतिविधियों में भी सक्रीय है| व्यंग्य प्रमुख है,जबकि बाल कहानियां और कविताएं भी लिखते हैंl आप ब्लॉग पर भी लिखते हैंl आपकी लेखनी का उद्देश्य-पीड़ा देखना,महसूस करना और व्यक्त कर देना है।

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