जयपुर डायरी

डॉ. स्वयंभू शलभ
रक्सौल (बिहार)

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भाग ३……….
१५ जनवरी को आरंभ हुए आइसटीस के अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का समापन १६ जनवरी की शाम को हो चुका था। देश-विदेश के वैज्ञानिकों एवं शिक्षाविदों के बीच मुख्य अतिथि के रूप में सम्मान पाना निःसंदेह मेरे लिए गौरव की बात थी…मेरी १८ की वापसी की  उड़ान भी मौसम की खराबी को लेकर रद्द हो गई थी…लिहाजा १७ को पुष्कर भ्रमण के बाद मेरे पास पर्याप्त समय था अजमेर शरीफ के लिए…
पुष्कर से निकलकर हम अरावली पर्वत श्रृंखला की चढ़ाई की ओर बढ़े…
पहाड़ी इलाकों का सफर बेहद रोमांचकारी होता है…घुमावदार सड़क पर गाड़ी भी हवाओं के साथ लहराती हुई चल रही थी…
यहां स्थित नाग पर्वत अजमेर और पुष्कर को अलग करता है…करीब १५ किलोमीटर आगे चलने पर हम अजमेर मुक़द्दस दरगाह पर पहुंचे। करीब ८०० साल पहले महान सूफी संत मोइनुद्दीन चिश्ती ईरान से सैकड़ों मील का कठिन सफर तय करके यहां पहुंचे थे और इसी जगह को अपनी इबादतगाह बना लिया था। फिर जो भी उनके पास आया,उनका मुरीद होकर रह गया। उनके दर पर दीन-ओ-धर्म,अमीर-गरीब,बड़े-छोटे किसी का फर्क नहीं था। सब पर उनकी रहमत का नूर बराबरी से बरसा। तब से लेकर आज तक आठ सदियाँ गुजर गईं लेकिन राजा हो या रंक,हिन्दू हो या मुसलमान जो भी उसकी चौखट पर पहुंचा,खाली हाथ नहीं लौटा। उन्होंने हर मजहब के लोगों को आपसी प्रेम और मोहब्बत का संदेश दिया…उनकी मुरादें पूरी की…
उनकी दरगाह का बुलंद दरवाजा इस बात का गवाह है कि मुहम्मद-बिन-तुगलक,अल्लाउद्दीन खिलजी और मुगल बादशाह अकबर से लेकर बड़े से बड़ा हुक्मरान भी यहां पर पूरे अदब के साथ सिर झुकाकर आया। यह दरवाजा इस बात का भी गवाह है कि ख्वाजा साहब सर्वधर्म सदभाव की दुनिया में एक ऐसी मिसाल हैं,जिसकी कोई सानी नहीं है।
ख्वाजा के पवित्र आस्ताने में राजा मानसिंह का लगाया चांदी का कटहरा और ब्रिटिश महारानी मेरी क्वीन का अकीदत के रूप में बनवाया गया वजू का हौज इसकी मिसाल है।
दुनियाभर में धर्म के नाम पर संघर्ष के बावजूद ख्वाजा की दरगाह में हिन्दू,जैन,सिख सभी तरह के विचार रखने वाले धर्म के अनुयायी समभाव से अपनी अकीदत का नजराना पेश करते हैं। विदेशी सैलानी भी यहां बड़ी संख्या में पहुंचते हैं।
हम दरगाह पर पहुंचे,तब तक दोपहर का वक्त हो चला था। वहां मजार पर चादर और फूल चढ़ाने वालों का तांता लगा था। हम सब भी कतार में आगे बढ़ते हुए उस मुक़द्दस स्थल तक पहुंचे और अपनी श्रद्धा के सुमन अर्पित किये।
हर सिद्ध स्थल दरअसल एक ऊर्जा केन्द्र होता है। यहां आकर इस केन्द्र की अदृश्य तरंगों को आसानी से महसूस किया जा सकता है।
मजार से बाहर एक झरोखे पर कई लोग मन्नत का धागा बांधते हुए भी नजर आये।
वापसी के समय बाहर निकलते हुए कुछ अपंग लोगों पर नजर पड़ी,जो विचित्र मुद्रा में सड़क पर रेंगते हुए भीख मांग रहे थे। यह विचलित कर देने वाला दृश्य था।
प्रशासन को ऐसे लोगों के इस तरह के प्रदर्शन पर रोक लगानी चाहिए और जो वास्तव में अशक्त और लाचार हैं उनके जीवन यापन की व्यवस्था करनी चाहिए ताकि दुनियाभर से यहां आनेवाले लोगों के दिलो-दिमाग पर केवल भक्ति और इबादत का भाव बना रहे…
पुष्कर और अजमेर से वापस जयपुर की ओर लौटते हुए मैं यही सोच रहा था कि महानगरों की चमक-दमक से दूर राजस्थान के ये छोटे-छोटे शहर कैसे अपनी धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत को बचाकर देश-दुनिया के आगे एक मिसाल कायम कर रहे हैं…।
(प्रतीक्षा कीजिए अगले भाग की…)

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