जी-२० में सफल कूटनीति

 डॉ.वेदप्रताप वैदिक
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अर्जेटिंना की राजधानी ब्यूनस आयर्स में चल रहे जी-२० सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पहली सफलता तो यह है कि उन्होंने इस २० राष्ट्रीय संगठन का २०२२ का सम्मेलन भारत में करवाने का वादा ले लिया। २०२२ में भारत की आजादी का वह ७५ वां साल होगा। इस २० सदस्यीय संगठन में दुनिया के सारे शक्तिशाली राष्ट्र सक्रिय हैं और उनके अलावा भारत,जापान,इंडोनेशिया,दक्षिण अफ्रीका जैसे देश भी हैं,जो निकट भविष्य में महाशक्ति बन सकते हैं। इन सब राष्ट्रों का लक्ष्य यह होता है कि वे एक जगह बैठकर अंतरराष्ट्रीय वित्तीय,व्यापारिक,आर्थिक और कानूनी समस्याओं पर विचार करें और उन्हें हल करने के रास्ते निकालें। ये १९ राष्ट्र और २० वां यूरोपीय संघ मिलकर दुनिया का ८५ प्रतिशत व्यापार करते हैं और ८० प्रतिशत सकल उत्पाद के ये मालिक हैं। इस सम्मेलन में मेादी के भाषणों का जोर इसी बात पर रहा कि नीरव मोदी,चोकसी,माल्या जैसे आर्थिक अपराधियों के खिलाफ कार्रवाई करने में सारे सदस्य राष्ट्र एक दूसरे का सक्रिय सहयेाग करें। मोदी ने अपना नौ-सूत्री कार्यक्रम भी पेश किया। दुनिया के जो राष्ट्र ऐसे अपराधियों को अपने यहां शरण देते हैं, पता नहीं,उन पर मोदी का कितना असर होगा,लेकिन असर होने का माहौल तो जरुर बनेगा। मोदी का दूसरा बड़ा हमला आतंकवाद पर था,खासकर उस आतंकवाद पर जो दूसरे देशों को निर्यात किया जाता है। मोदी ने आतंकवाद को प्रोत्साहित करने ओर समर्थन करनेवाली शक्तियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने की अपील की है। इस तरह की अपीलें भारत के पिछले प्रधानमंत्री भी कर चुके हैं लेकिन आजकल उनका असर होता इसलिए दिख रहा है कि पश्चिम के शक्तिशाली राष्ट्रों के अंदर भी इधर आतंकवादी घटनाएं जोरों से होने लगी हैं। भारत के इन दो प्रमुख लक्ष्यों को साधने के अलावा मोदी ने प्रमुख राष्ट्रों के नेताओं से भी विशेष भेंट की। दो त्रिपक्षीय भेंटों ने विशेष ध्यान खींचा,एक भेंट अमेरिका के डोनाल्ड ट्रम्प,जापान के शिंजो एबे से और दूसरी रुस के व्लादिमीर पुतिन और चीन के शी चिन फिंग के साथ। लगे हाथ उन्होंने वहां ‘ब्रिक्स’ की भी एक बैठक कर ली। यूरोपीय संघ और संयुक्त राष्ट्र संघ के प्रमुख से भी बात हो गई। जितनी मुलाकातों में एक माह लग जाता,वे दो दिन में हो गईं। यदि विदेश मंत्री सुषमा स्वराज को मोदी साथ में ले जाते, तो सोने में सुहागा हो जाता।

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