‘ठाकरे’…शेर का उदय

इदरीस खत्री
इंदौर(मध्यप्रदेश)
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‘ठाकरे’ फिल्म के निर्देशक-अभिजीत पानसे और कलाकार-नवाज़ुद्दीन, अमृता राव,सुधीर मिश्रा,राजेश खैर, डॉ.सचिन,विशाल सरदेश्वर,अब्दुल कादिर अमीन,लक्ष्मण सिंह हैं।
हम पहले बायोपिक पर चर्चा करेंगे, फिर फ़िल्म पर,क्योंकि यह दशक ही बायोपिक से लबरेज़ चल रहा है-‘पान सिंह तोमर,दंगल,सरबजीत,अज़हर, सचिन,धोनी,बुधिया,संजू,मंटो और अब ठाकरे’ इसमें शामिल है।
इस फ़िल्म के शुरू में ही घोषणा कर दी गई कि,-कुछ कल्पनाओं का समावेश किया गया है’ जो खलता है। बायोपिक में कोई जगह नहीं होती कल्पना की,लेकिन निर्देशक अपनी सुविधानुसार या मनमाफिक अंजाम के लिए फेर बदल करते हैं जो जनता के रुझान पर निर्भर करता है।
वैसे बायोपिक(जीवन वृत्तांत)में इससे परहेज़ या दूरी बेहतर होती है,लेकिन ‘ठाकरे’ फ़िल्म में ऐसा महसूस ही नहीं हुआ कि कहाँ सच चल रहा है और कहाँ  कल्पना।
फ़िल्म में रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की कविता सुनाई देती है-“खाली करो सिंहासन,के जनता आती है…”
इसी फिल्म में सोहनलाल द्विवेदी की गाँधीजी पर लिखी एक कविता भी सुनाई देती है-
“चल पड़े इधर दो डग मग,

चल पड़े कोटि पर उसी और,
गड़ गई दृष्टि उसी और…।”

इसमें से गाँधीजी वाली कविता ज्यादा उपयुक्त लगी है। यह फ़िल्म बाला साहेब ठाकरे पर आधारित है,जो अपने-आपमें विवादित,विस्मयकारी शख्सियत रहे,तो फ़िल्म देखने से पहले मन में एक सवाल था-क्या फिल्म में विवाद या विवादित मुद्दे दिखाए जाएंगे ? या केवल बाला साहेब का महिमा मंडन मात्र होगा ??
जवाब मिला फ़िल्म में,जिससे फ़िल्म निर्देशकों और लेखकों पर आस्था कायम रही।
संजय राउत फ़िल्म के लेखक हैं,  जो शिवसेना से राज्यसभा सांसद भी हैं। उन्होंने सभी वैचारिक, विवादास्पद मुद्दों को बड़ी कुलीनता से लिखा है,कुछ विवादित मुद्दे जैसे बेगाव मुद्दा, मुस्लिम लीग के साथ युक्ति करना, कम्युनिस्ट नेताओं के विरूद्ध आक्रोश के साथ मराठीवाद को तरजीह देना,
जय महाराष्ट्र इत्यादि। फ़िल्म की शुरूआत १९९४ के उत्तर प्रदेश के लखनऊ में अदालती पूछताछ से शुरू होती है। यहाँ सवालात बाबरी मस्जिद विध्वंस से ताल्लुक रखते हैं,जिसमें बाला साहेब (नवाज़ुद्दीन सिद्धिकी) से सवालात हो रहे हैं,जो देश का सबसे विवादास्पद मुद्दा है।(यह समीक्षा का विषय नहीं,देश का राजनीतिक मुद्दा बन गया है।)
फिर फ़िल्म अतीतकाल १९६० में  जाती है,कि कैसे बाला साहेब ने एक समाचार-पत्र से शुरूआत की। यहीं से शुरू होती है गाथा बाला किशोर से बाला साहेब ठाकरे बनने की। १९६० का दौर फ़िल्म में श्वेत श्याम दिखाया गया,जो अच्छा फैसला और रचनात्मकता लगी,क्योंकि ६० के दौर को आज के दौर से अलग दिखाना यह सफल प्रयोग है।
अब शुरू होता है सफर बाला किशोर का बाला साहेब बनने का। कैसे उन्होंने समाचार-पत्र में काम शुरू किया,फिर कैसे मराठियों के हक के लिए आवाज़ बुलंद की,कैसे उन्होंने अपना एक संगठन निर्माण किया,कैसे स्वयं के समाचार-पत्र की शुरूआत की,  कैसे राजनीतिक सफर की शुरूआत,उस दौर में मराठियों को कमज़ोर दिखाना, दक्षिण भारतीयों को उन पर काबिज दिखाना,यह थोड़ा समझ से परे लगता है,लेकिन शुरूआत में ही घोषणा याद आ गई तो हज़म कर लिया।
१९६० में बाला किशोर नौकरी छोड़कर मराठियों की आवाज़ बुलंद करते हैं,लेकिन यह घटनाक्रम इतना तेज बहता है कि अविश्वसनीय अंदाज़ में निकल जाता है,तो इसमें कुछ और दृश्यों का समावेश किया जा सकता था।
फ़िल्म में दल का एक नेता मुख्यमंत्री पद की शपथ ले रहा होता है,उस पर दृश्यांकन बाला साहेब का दिखाया गया जो यह दर्शाता है कि किंग मेकर कौन है,यानी सत्ताधारी कोई भी हो मुख्यमंत्री बने हैं बाला साहेब ठाकरे।
इस तरह के दृश्य खुद में बहुत कुछ बयां करते हैं,जिन्हें विसंगत माना जा सकता है। एक और दृश्य है जिसमें एक नेता संसद में बाला साहेब के बारे में बोल रहा है। इस दृश्य के दृध्यान्तर में एक कुत्ता भौंकता दिखाया गया है।
एक दृश्य और जिसमें बाबरी मस्जिद पर हथौड़ा पड़ता है,और दृध्यान्तर में अदालत कक्ष में न्यायाधीश साहब ‘ऑर्डर..ऑर्डर’ कह के अपना हथौड़ा ठोंक रहे हैं। ये सभी दृश्य तर्कसंगत विसंगत(एब्स्ट्रैक्ट) है,जो एक शैली है,फ़िल्म निर्माण एवं प्रस्तुति की एक कला है,यहां इसका प्रयोग लाजवाब किया गया है।
फ़िल्म में मध्यांतर दिखाने का दृश्य भी लाजवाब है। एक श्वेत श्याम फ्रेम में केवल गेंदे का फूल रंगीन हो जाता है और लिखा आता है मध्यांतर।
फ़िल्म को आज के राजनीतिक परिपेक्ष्य से आसानी से जोड़ा जा सकता है,जैसे-चौड़ा सीना,पकौड़े बनाने का व्यवसाय।
बाला साहेब द्वारा एक मुस्लिम को अपने निवास पर नमाज अदा करने देने की इजाजत दिया जाना जबरन ठूंसा गया दृश्य लगा,क्योंकि कोई खास कारण नहीं दिखा इस दृश्य को डालने का।
अदाकारी पर बात करें तो
नवाज़ को लेकर संशय था कि  ‘मंटो’ से बाहर आए होंगे या नहीं,लेकिन नवाज़ ने ठाकरे साहब को आंगिक, वाचिक,आहारिक,सात्विक,अभिनय के चारों आयाम को निचोड़कर किरदार को निभा दिया। कई जगह बाला साहेब असल में दिखने लगे,यही उस कलाकार की साधना है। अमृता राव ने पत्नी मीणा ठाकरे के किरदार को निभाया। इन्हें ज्यादा स्क्रीन टाइम तो नहीं मिला,लेकिन जितना मिला, लाजवाब किया।
संगीत पक्ष शानदार है। गानों में
-साहेब तू सरकार तू,आया रे ठाकरे,आपले साहेब ठाकरे..
तीनों अच्छे बन गए,और इनका फ़िल्मांकन भी बढ़िया किया गया है।
फ़िल्म के अंत में ‘टू बी कंटीन्यू…’  यानी अभी जारी है,के 3 अर्थ हो सकते हैं-
फ़िल्म में १९६० से १९९४ तक का जीवन दिखाया गया,शेष दूसरे भाग में होगा।
विचारधारा,जिसे बाला साहेब ने प्रस्फुटित किया,वह निरन्तर जारी रहेगी।
फ़िल्म का एक भाग शेष है, जिसमें बाला साहेब का १९९४ से अंतिम साँस लेने तक का सफर होगा। इस फ़िल्म को ३ सितारे दिए जाना सही है।
परिचय : इंदौर शहर के अभिनय जगत में १९९३ से सतत रंगकर्म में इदरीस खत्री सक्रिय हैं,इसलिए किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। परिचय यही है कि,इन्होंने लगभग १३० नाटक और १००० से ज्यादा शो में काम किया है। देअविवि के नाट्य दल को बतौर निर्देशक ११ बार राष्ट्रीय प्रतिनिधित्व नाट्य निर्देशक के रूप में देने के साथ ही लगभग ३५ कार्यशालाएं,१० लघु फिल्म और ३ हिन्दी फीचर फिल्म भी इनके खाते में है। आपने एलएलएम सहित एमबीए भी किया है। आप इसी शहर में ही रहकर अभिनय अकादमी संचालित करते हैं,जहाँ प्रशिक्षण देते हैं। करीब दस साल से एक नाट्य समूह में मुम्बई,गोवा और इंदौर में अभिनय अकादमी में लगातार अभिनय प्रशिक्षण दे रहे श्री खत्री धारावाहिकों और फिल्म लेखन में सतत कार्यरत हैं। फिलहाल श्री खत्री मुम्बई के एक प्रोडक्शन हाउस में अभिनय प्रशिक्षक हैंl आप टीवी धारावाहिकों तथा फ़िल्म लेखन में सक्रिय हैंl १९ लघु फिल्मों में अभिनय कर चुके श्री खत्री का निवास इसी शहर में हैl आप वर्तमान में एक दैनिक समाचार-पत्र एवं पोर्टल में फ़िल्म सम्पादक के रूप में कार्यरत हैंl

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