तुम अपनी भाषा में पूछो,तो ये मदद करेंगे

कादम्बरी मेहरा

लंदन
*****************************************************************************
हिंदी के ऊपर राजनीति करते हमें एक ज़माना हो गया,पर यह स्थिति सुधरी नहीं। हाँ,एक संचेतना में बदलाव अवश्य आया है जबसे श्री मोदी ने इसको अपनाया। मेरे ही घर में देखती हूँ पुरुष वर्ग अब हिंदी की खबरें अधिक चाव से सुनता है। इसके साथ ही उनकी शब्दावली का विस्तार भी हुआ है। वरना ‘सारी कहानी ख़तम हुई तो सीता किसका बाप था’ वाली स्थिति थी।
जब हम ७० के दशक में पहले पहल भारत से आये थे तो कहीं-कभी रस्ते चलते अंग्रेज हमें बरज देते थे और जोर से डाँट कर चिल्ला देते थे,’स्पीक इन इंग्लिश’. अपनी भद्द न हो अतः हम सबने जल्दी ही बोलना सीख लिया,मगर अंग्रेजों का अपनी भाषा से प्रेम अदभुत है। फ्रांस में हम पहली बार गए तो हमें फ्रेंच कहाँ आती थी। हम अंग्रेजी में पूछताछ करते चलते थे,मगर फ्रेंच उत्तर न दें। कोई कोई अच्छा मिल जाये तो अपना काम बन जाये। तो एक मिल गया,हमने उससे कहा-क्यों ये लोग हमें उत्तर नहीं देते। उसने समझाया कि-तुम अंग्रेजी बोलते हो इसलिए। यदि तुम अपनी भाषा में पूछो तो ये हर संभव कोशिश करेंगे तुमको मदद करने की।
यह गुरु मंत्र काम कर गया। हम पूरे एक महीना पेरिस में रहे,खुश-खुश। मित्र भी बनाये। साथ के फ्लैट वाली स्त्री ने हमारे बच्चों को अपने पुत्र के सारे दामी खिलौने दे दिए। जाते समय हम लौटाने गए,तो वह गदगद होकर बोली कि सब ले जाओ,इंग्लैंड में खेलेंगे तुम्हारे बच्चे। मेरा बेटा अब बड़ा हो गया है। तब कुछ भी मेड इन चीन नहीं होता था। फ्रांस और जर्मनी की अपनी फैक्ट्रियां खिलौने बनाती हैं।
सो,मेरे विचार में यदि हम हिंदी प्रेमी दूसरों को कहते चलें कि हिंदी बोलो तो जरूर बदलाव आएगा। सड़क पर चलता व्यक्ति हिंदी में बोलता है। बच्चे भी खेल के मैदान में हिंदी बोलते हैं। हमें स्वयं उनसे हिंदी में बात करनी है। अस्तुl
(सौजन्य:वैश्विक हिंदी सम्मेलन,मुंबई)

Hits: 13

आपकी प्रतिक्रिया दें.