दिवाली पर नई फिल्मों की सस्ती सेल,चले आईये

विनोद नागर
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सिने विमर्श…………………….
मध्यप्रदेश में करीब एक महीने से चल रही सिनेमाघरों की हड़ताल आखिर इस शुक्रवार बिना किसी नतीजे के समाप्त हो गई। हालाँकि,एकल सिनेमाघरों ने पिछले हफ्ते ही दर्शकों के लिये अपने दरवाजे खोल दिए थे, लेकिन मल्टीप्लेक्स वालों को बॉक्स ऑफिस पर जमी धूल साफ़ करने में एक सप्ताह का समय और लगा। जैसा कि इस खाकसार ने पूर्व में भी लिखा, वाजिब मुद्दे पर गलत मुहूर्त में शुरू हुई यह हड़ताल नामाकूल परिस्थितियों की भेंट चढ़ गई।
सिनेमा के टिकट पर पहले से लागू जीएसटी के इतर मध्यप्रदेश में स्थानीय निकायों के जरिये थोपे गए मनोरंजन कर के विरोध में लम्बी चली इस हड़ताल के समर्थन में कोई आगे नहीं आया। चुनाव की गहमा-गहमी में न विपक्षी दलों ने फिल्म वालों की मांग पर ध्यान दिया,न सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इसे व्यापक जनहित का मुद्दा बनाने में कोई दिलचस्पी ली। मीडिया ने भी देश के मध्य भाग में सिनेमाघरों में पसरे सन्नाटे को ख़ास तवज्जो नहीं दी। बिल्ली के भाग से टूटे छींके की तर्ज पर अचानक विधानसभा चुनाव की आचार संहिता लागू हो जाने से सरकार भी दर्शकों की तरह मूक दर्शक बनी रही। हड़ताल से होने वाले करोड़ों रुपये के राजकोषीय घाटे की भरपाई को लेकर भी सबने मुँह में दही जमा रखा है।
बहरहाल इस शुक्रवार हड़ताल समाप्त होते ही राज्य के सिनेमाघरों में नई फ़िल्में थोक के भाव में प्रदर्शित हुईं।  पिछले एक महीने से दर्शक जिन नई फिल्मों को देखने से वंचित रह गए थे जब वे रुपहले परदे पर एकसाथ प्रकट हुई तो दिवाली पर फिल्मों की सेल लगे होने का नजारा दिखाई पड़ा। ‘लव यात्री,वेनम,तुम्बाड़,सूर्या-द ब्रेव सोल्जर, राष्ट्रपुत्र,दशहरा,जैक एंड दिल’ से लेकर ‘अंधा धुन,लुप्त,बधाई हो और बाज़ार’  जैसी तकरीबन एक दर्जन फिल्मों में से दर्शक अपनी पसंद की फिल्म इस सेल में चुन सकते हैं। इसे दर्शकों की पौ बारह मानिए कि इनमें से कई फ़िल्में तो उन्हें मात्र पचास रुपये की घटी दरों पर देखने को मिल रही हैं।  मानो कह रही हों रस्ते का माल सस्ते में..दिवाली पर लगी है नई फिल्मों की सेल..चले आइये..!
इधर चतुर वितरकों ने हड़ताल की अवधि में प्रदर्शित ‘आय एम नॉट ए टेररिस्ट,फ्रायडे,मॉल रोड दिल्ली, जलेबी,नमस्ते इंग्लैंड,हेलीकॉप्टर इला, मुंबई सिटी द डार्क साइड ऑफ़ लाइफ,फाइव वेडिंग्स’ जैसी फ्लॉप फ़िल्में प्रदर्शित करने से परहेज भी किया है।
जहाँ तक चुनिन्दा फिल्मों के समीक्षात्मक विश्लेषण की बात है,तो इसमें सबसे पहले आयुष्मान खुराना की ‘अंधा धुन’ और ‘बधाई हो’ का जिक्र आवश्यक रूप से करना होगा। अलग-अलग जॉनर और छोटे बजट की इन दोनों फिल्मों ने देखते ही देखते न केवल अपनी लागत निकाली,बल्कि ‘बधाई हो’ तो बॉक्स ऑफिस पर सौ करोड़ की कमाई के मानक आंकड़े को छूने वाली है। छोटी फिल्मों की बड़ी कामयाबी ने आयुष्मान खुराना और राजकुमार राव को बॉलीवुड में सितारा हैसियत की उस सीढ़ी पर पहुंचा दिया है,जहाँ नये युवा प्रतिस्पर्धी दिग्गज खिलाड़ियों के साथ दौड़ में बेहतर प्रदर्शन के प्रोत्साहन पुरस्कार पाकर अपनी उपलब्धियों के नए कीर्तिमान रचते हैं।
निर्देशक अमित रविंद्रनाथ शर्मा की
‘बधाई हो’ अपने ताजगी भरे कथानक से दर्शकों को पूरे समय गुदगुदाती है। उत्तर भारत के एक मध्यमवर्गीय कौशिक परिवार में दो वयस्क बच्चों की माँ प्रियंवदा (नीना गुप्ता) के अचानक प्रौढ़ावस्था में तीसरी बार गर्भवती होने से उपजी असहज पारिवारिक स्थितियों और प्रसंगों से जुड़ी मनोभावनाओं को नवोदित निर्देशक ने बड़ी खूबी से उभारा है। फिल्म में नीना गुप्ता,गजराज राव, सुरेखा सीकरी जैसे समर्थ कलाकारों का अभिनय देखते ही बनता है। आयुष्मान खुराना,सान्या मल्होत्रा और शीबा चड्ढा फिल्म का समुचित मूल्य संवर्धन करते हैं। कसी हुई पटकथा तथा चुस्त संपादन के चलते फिल्म विषय से जरा भी नहीं भटकती। छोटे शहरों के मध्यमवर्गीय परिवारों से निकलकर आने वाली कहानियाँ और स्थानीय परिवेश को ईमानदारी से उभारने की यह लेखकीय-निर्देशकीय पहल स्वागत योग्य है। यह सत्तर के दशक में हृषिकेश मुख़र्जी और बासु चटर्जी की हल्के-फुल्के मनोरंजन वाली अनेक सफल फिल्मों के दौर की याद दिलाने वाली हैं।
सैफ अली खान की इस हफ्ते प्रदर्शित ‘बाज़ार’ स्टॉक मार्केट ट्रेडिंग जैसे नए विषय की पृष्ठभूमि पर बनी थ्रिलर ड्रामा फिल्म है। तीन दशक पूर्व हॉलीवुड में बनी ‘वाल स्ट्रीट’ के इस भारतीय संस्करण में नवोदित  निर्देशक गौरव चावला ने शेयर के धंधे में उलझे धन पिपासुओं की तिकड़मों को अच्छे से उभारा है,पर आम दर्शक शायद ही इस ‘बाज़ार’ की ओर रुख करे। चतुर चालाक गुजराती व्यापारी  शकुन कोठारी के किरदार में सैफ अली खान बहुत ज्यादा प्रभावित नहीं करते। इलाहाबाद से मुंबई में संघर्ष नहीं,स्थापित होने के बुलंद इरादे से पहुंचे युवक रिजवान अहमद उर्फ़ प्रयाग राज को रोहन मेहरा ने पूरे जतन से साकार किया है पर बॉलीवुड में स्थापित होने में यह किरदार उन्हें शायद ही कोई मदद करे। राधिका आप्टे,चित्रांगदा सिंह सहित अन्य कलाकारों का काम औसत दर्जे का है। पुरानी पीढ़ी के दर्शक इस ‘बाज़ार’ को सागर सरहदी की १९८२ में आई ‘बाज़ार’ का नया संस्करण मानने की भूल न करें तो अच्छा,जिसमें नसीरुद्दीन शाह,फारुख शेख,स्मिता पाटिल और सुप्रिया पाठक के सशक्त अभिनय व खय्याम के दिलकश गीत-संगीत ने हैदराबाद के आर्थिक तंगी से जूझते मुस्लिम परिवारों की मन को झकझोरने वाली दास्ताँ उजागर की थी।

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