दुरुपयोग

डॉ.चंद्रेश कुमार छतलानी 
उदयपुर (राजस्थान) 
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एक बूढ़ा आदमी जिसने सिर्फ धोती पहनी हुई थी, धीरे-धीरे चलता हुआ,महात्मा गांधी की प्रतिमा के पास पहुंचा। वहां उसने अपनी धोती में बंधा हुआ एक सिक्का निकाला,और जिस तरफ ‘सत्यमेव जयते’ लिखा था,उसे ऊपर कर,सिक्के को महात्मा गांधी के पैरों में रख दिया।
अब उसने मूर्ति के चेहरे को देखा,उसकी आँखों में धूप चुभने लगी,लेकिन उसने नज़र हटाए बिना दर्द भरे स्वर में कहा,-
“गांधीजी,तुम तो जीतकर चले गए,लेकिन अब यहाँ दो समुदाय बन गये हैं,एक तुम्हारे नाम की जय-जयकार करता है तो दूसरा तुम्हें दुष्ट मानता है…तुम वास्तव में कौन हो,यह पीढ़ी भूल ही गयी।” कहते-कहते उसकी गर्दन नीचे झुकती जा रही थी।
उसी समय उसके हृदय में जाना-पहचाना स्वर सुनाई दिया,-“मैं जीता कब था ?अंग्रेजों के जाने के बाद आज तक मेरे भाई-बहन पराधीन ही हैं,मुट्ठीभर लोग उन्हें बरगलाकर अपनी विचारधारा के पराधीन कर रहे हैं… और सत्य की हालत…।”
“क्या है सत्य की हालत ?” वह बूढ़ा आदमी अपने अंदर ही खोया हुआ था।
उसके हृदय में स्वर फिर गूंजा,-“सत्य तो यह है कि दोनों एक ही काम कर रहे हैं-मेरे नाम को बेच रहे हैं…।”
और उसी समय हवा के तेज़ झोंके से मूर्ति पर रखा हुआ सिक्का नीचे गिर गया,शायद उसका आधार कमज़ोर था।
 परिचय-डॉ.चंद्रेश कुमार छतलानी का कार्यक्षेत्र उदयपुर (राजस्थान) स्थित विश्वविद्यालय में सहायक आचार्य (कम्प्यूटर विज्ञान)का है। इसी उदयपुर में आप बसे हुए हैं। इनकी लेखन विधा-लघुकथा,कहानी, कविता,ग़ज़ल,गीत,लेख एवं पत्र है। लघुकथा पर आधारित ‘पड़ाव और पड़ताल’ के खंड २६ में लेखक, अविराम साहित्यिकी,लघुकथा अनवरत (साझा लघुकथा संग्रह),लाल चुटकी(साझा लघुकथा संग्रह), नयी सदी की धमक(साझा लघुकथा संग्रह),अपने-अपने क्षितिज (साझा लघुकथा संग्रह)और हिंदी जगत(न्यूयॉर्क द्वारा प्रकाशित)आपके नाम हैं। ऐसे ही विविध पत्र-पत्रिकाओं सहित कईं ऑनलाइन अंतरतानों पर भी रचनाएं प्रकाशित हुई हैं। 

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