दुर्गोत्सव का उल्लास

लिली मित्रा
फरीदाबाद(हरियाणा)
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अश्विन मास के लगते ही,प्रकृति जैसे देवी-देवताओं के धरा आगमन की तैयारी में जुट जाती है। गणेशोत्सव के साथ शुभ का शंखनाद आरम्भ हो जाता है।
आकाश का नीलाभ जैसे खुद को श्रावणी वृष्टि से धो-पोंछकर नीलम रत्न-सा चटख चमकदार हो जाता है। ग्रीष्म के ताप से वाष्पित बिन्दुओं से भरे काले मेघ,बरस कर भारमुक्त हो चुके हों,जैसे-सब पंतग से हल्के होकर श्वेतमाल से नील गगन पर इधर-उधर उत्सव की तैयारी में जुटे,तत्परता से तैरते नज़र आने लगते हैं।
आसमान पर जैसे होड़ मची है उत्सवी शामियाना सजाने की। धरा ने भी खुद का श्रृंगार उतनी ही कुशलता से करना आरम्भ कर दिया है। धुले-धुले से गाछ-पात, हरित दूब के नरम गलीचे,हरश्रृगांर के फूलों से लदे पेड़,जो हवा के स्नेहिल स्पर्श से किसी नवयौवना की चंचल हँसी से बिखर पड़ते हैं घास पर। हवा का नटखट झोंका भर कर स्वयं में उन शिवली का सुवास बह निकलता है आत्मशीतल कर अन्यत्र कहीं। दूब का फैला आंचल एकत्र कर प्राजक्ता के फूल गुंथने लग जाते हैं पुष्पमाल देवी को अर्पित करने हेतु।
              नदी के जल से भर अपने यौवनी उन्माद में किल्लोल करती अलमस्त बही जा रही सूर्य की रश्मियों की गुनगुनाती ऊष्मा से हो उल्लासित उसकी अल्हड़ता मृणालिनी बन चली है। धरा निकली है नहाकर नदिया के तट पर,और धारण किए हैं लहलहाते कास-पुष्पी वसन, जिसका लहराता आंचल बार-बार उद्धत है आकाश  छूने को।
उधर गाँव में ढाकियों ने शुरू कर दिया है अभ्यास,दे रहे हैं दिन-रात ढाक पर एक नव आशा की थाप। इस बार ‘माँ’ आएगीं उनके लिए लेकर शुभ उन्नत जीवन का आशीर्वाद,जिससे दूर होंगें उनके संताप। छोटे बालक हाथों में लिए कांस्य थाल,मिला रहे अपने पितृ संग ताल,उन्हें है आस इस बार माँ लाएगीं उनके लिए स्वादिष्ट भोग-प्रसाद। स्त्रियां मन में संजोने लगी हैं नए स्वप्न,स्वामी कमाकर लाएगा कुछ अधिक ‘मूल’ इस बार,साथ होंगें  नूतन वस्त्र,आलता-सिन्दूर। उनका असल उत्सव तो शुरू होता है ‘माँ’ के वापस जाने के उपरान्त। जब उनके स्वामी परदेश से लौटकर आते हैं।
          हर हृदय में घुलने लगी है उत्सवी श्वांस,होंगें कितने ही परिवार एकत्र एक वर्ष बाद। वयोवृद्ध माँ-पिता आशान्वित हैं-आने वाले हैं पुत्र-पुत्रवधू और पोते-पोतियां। सब मिलकर बिताएंगें कुछ सुखद क्षण फिर एक बार।
धरा,गगन,मानव मन सब जुट गए हैं ‘देवी के आगमन’ की तैयारी में। ‘आज मेरा भी मन पूजा की पूर्वानुभूतियों से आन्दोलित हो उठा।’ मेरे मन का आकाश भी आश्विनी आभास(दुर्गोत्सव का उल्लास) से आनंदित हो नर्तन कर उठा।
परिचय- ब्लॉग पर भी लेखन में सक्रिय लिली मित्रा का निवास फरीदाबाद (हरियाणा)में है। आपने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर(राजनीति शास्त्र) किया है एवं लेखन तथा नृत्य के प्रति विशेष लगाव से कार्य निष्पादन करती हैं। लिली मित्रा की रचनाएं कई ऑनलाइन पत्रिकाओं में श्रेष्ठ रुपक एंव श्रेष्ठ ब्लाॅग के रुप में चुनी गई हैं। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में रचनाओं का प्रकाशन काव्य,बाल कविताएं,कहानियां एवं लघुकथा के रुप में हो चुका है। श्रीमती मित्रा हिन्दी भाषा के प्रति स्वाभाविक आकर्षण रखती हैं। इनके अनुसार भावनाओं की अभिव्यक्ति साहित्य एवं नृत्य के माध्यम से प्रस्तुत करने का यह आरंभिक सिलसिला है। इनकी रुचि नृत्य,लेखन,रसोई और साहित्य पाठन विधा में भी है। कुछ समय पहले ही लेखन शुरू करने वाली श्रीमती मित्रा बतौर गृहिणि शौकिया लेखक हैं। आपकी विशेष उपलब्धि में एक समूह द्वारा आयोजित काव्यलेखन स्पर्धा में दिल्ली के ‘एवान-ए-ग़ालिब’ में ‘काव्य शिखर’ सम्मान,ऑनलाइन वेबसाइट पर कई लेख ‘बेस्ट ब्लाॅग’ एंव ‘फीचर्ड’ सहित एक वेबसाइट पर दो बार ‘शीर्षस्थ कवि’ सूची में नाम आना है। लेखन विधा-स्वतंत्र सृजन,आलेख,बाल रचनाएं है। आपकी लेखनी का उद्देश्य हिन्दी भाषा के प्रति अनुराग है।

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