दुष्कर्म-नैतिकता या दंड से निराकरण सम्भव ?

डॉ.अरविन्द जैन
भोपाल(मध्यप्रदेश)
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वर्तमान में बलात्कार पर चर्चा और चिंतन बहुत हो रहा है,स्वाभाविक है कि गलत कार्य गलत होता है,उसको आप किसी भी परिभाषा या दृष्टिकोण से देखो समझो। बलात्कार के अलावा अन्य पाप भी बहुलता से हो रहे हैं। यहाँ यह समझ लेना चाहिए कि जो कृत्य या कर्म शुभ भाव से किया जाए वह अच्छा,और जो अशुभ भाव से किया जाए,वह पाप है। भाव का तात्पर्य इरादे से है। सम्पूर्ण विश्व में अपराध इस इरादे के अंतर्गत बनते हैं। जैसे कहा गया है कि-‘जाकी रही भावना जैसी,प्रभु मूरत दिखीं तैसी’,इसीलिए भारतीय दंड संहिता में धारा ३९२ और ३०७ इरादे के आधार पर रखी गई। पाप पांच प्रकार के होते हैं हिंसा, झूठ,चोरी,कुशील और परिग्रह। इसके अलावा क्रोध,मान,माया तथा लोभ से भी पाप होते हैं। एक समाचार के आधार पर यह बात सामने आई है कि,भारत वर्ष में साइबर अपराध बहुत तेज़ी से बढ़ रहा हैं। ६० प्रतिशत फेसबुक से,१५-२० प्रतिशत अपराध ट्विटर और व्हाट्सप्प से भी हो रहे हैं। इसके अलावा आज लड़कियों और लड़कों को समानता का अधिकार की बात उठाने के साथ सहपाठनता ने भी इस अपराध को बढ़ाने में महती भूमिका निभाई और निभा रही है। उसका परिणाम सदाचरण की दृष्टि से अच्छा नहीं हो सकता है। युवा हो या कोई हो,दो विपरीत लिंग का आकर्षण ऐसा होता है कि,आप इससे बच नहीं सकते। अभी एक समाचार-पत्र में आया कि,पुत्र ने अपनी बहिन से बलात्कार किया। पिता-भाई द्वारा अपनी पुत्री या बहिन से बलात्कार यानी दुष्कर्म करना एक आम बात दिखाई दे रही है। इसके अलावा अबोध बालक-बालिकाओं के साथ यौन दुराचरण इतना अधिक बढ़ गया है कि,मानो यह संक्रमण रोग हो,जो असाध्य हो चुका है। इस हेतु शासन ने बड़े कड़े कानून बनाए हैं। सब जगह इसे बताया गया है कि,यदि धन गया तो कुछ नहीं गया, स्वास्थ्य गया तो कुछ गया और चरित्र गया तो सब कुछ गया। यहाँ यह बताना भी यथोचित होगा कि इसके लिए कहा गया है कि,स्त्री में माता,बहिन और बेटी के समान रुपत्रिक को देखते हुए,जो स्त्री सम्बन्धी कथडी की निवृत्ति है,वह सत्पुरुष की दृष्टि में ब्रह्मचर्य है। कामवासना का कारण कामोद्दीपक पदार्थ के आहार करने से,विषयभोग सम्बन्धी चिंतन करने से,स्त्री आदि व्यसनों में आसक्त व्यक्ति की संगति से और वेद नाम कर्म की उदीरणा से मैथुन संज्ञा होती है। यानि स्त्री द्वारा पुरुष के प्रति निरंतर चिंतन करना और पुरुष को स्त्री के प्रति चिंतन करना,यह स्त्रीवेद, पुरुषवेद और नपुंसक वेद कहलाता है। विषय सेवन जनित सुख को सच्चा सुख नहीं कहते हैं-जैसे दाद को खुजाने से क्षण भर आनंद का आभास मिलता है,उसके बाद विपत्तियों के सिद्धू में अपार दुःख भोगना पड़ते हैं।इसका बहुत चर्चित और पौराणिक उदहारण हैं रावण द्वारा सीता बलात हरण का। आज भी वह अपकीर्ति का फल भोग रहा है,जबकि बहुत प्रतापी,विद्यावान,गुणवान था। एक ही कार्य से उसके सब गुण इस प्रकार भस्म हो गए,जैसे अग्नि की लौ में गिरते ही शलभ के प्राण नष्ट हो जाते हैं,इसलिए कहा गया है-मैथुन अब्रह्म है,क्योंकि कभी-कभी दो पुरुष,दो स्त्रियां,स्त्री-पुरुष, अकेला पुरुष और स्त्री भी एकांत में कुचेष्टा करते हैं।
इसके अलावा-परविवाह कारनोत्वरिका परिग्रहिता परिग्रह गमनागमनंग क्रीड़ा कांति वृताभिनिवेशा- अर्थात अपने पारिवारिक दायित्व से बाहर के लोगों की शादी विवाह कराने में रूचि लेना,गलत चाल-चलन वाले विवाहित स्त्री-पुरुषों के साथ उठना-बैठना,अप्राकृतिक यौनाचार करना,भोंडापन करना,फूहड़पन अपनाना,भांडगिरी करना,काम की तीव्र लालसा करना और काम की विपुल लालसा रखना भी अपकीर्ति है।
आजकल चलायमान और अंतरताना ने जहाँ जानकारियां विपुल मात्रा में सहज-सुगम और सरलता से उपलब्ध कराई,उससे हमको सूचनाएं बहुत जल्दी मिलने लगी हैं। इसके कारण जहाँ जानकारियों का भंडार मिल गया है,तो उसके दुष्परिणामों से कोई बच नहीं पा रहा है। हमारे बच्चे,युवा,प्रौढ़ सब गुणमान हो गए और बच्चे एवं युवा शारीरिक सम्बन्धों से संबधित जानकारियों से पूर्ण परिचित होकर जब सिद्धांत देखकर प्रायोगिक कार्य करते हैं तो बलात्कार-यौन जैसे रोगों से ग्रसित हो रहे हैं। आज का युवा समय से पूर्व सेक्स से पूरा लबालब भर गया है,और समय से पहले नपुंसकता के शिकार हो चुके सह अध्ययन के कारण और सह कर्मियों के कारण विपरीत लिंग के प्रति आकर्षण होने से बच नहीं सकता है। ऐसे में लगभग ९५ फीसदी बच्चे-बच्चियां शादी के पूर्व ही इससे पूर्ण हो चुकते हैं, और जिन्हें अवसर नहीं मिलता,वे अपराध की और भी बढ़ने लगते हैं। दूसरा वातावरण,खान-पान में उत्तेजकता, लिबास के प्रति अमर्यादा,और वाहन पर चलते हुए मुंह ढंककर इतने अमर्यादित रूप से मिलते हैं,जैसे उनके पास समय या जगह की कमी है,इस कारण समय का पूरा सदुपयोग करते हैं।
ऐसे में क्या उनसे आप इस प्रकार के सम्बन्ध से बचने की उम्मीद कर सकते हैं ?
इसके बचाव के कुछ उपाय या भावनाएं इस प्रकार हैं-
स्त्रीराग कथाश्रवण,तनमनोहरा रंगनिरीक्षण,पूर्वरतानुस्मरण-व्रष्येष्टरस,स्वशरीर संस्कार त्यागः पंच…अर्थात स्त्रियों के विषय में
राग उत्पन्न करने वाली कथा को न सुनना,स्त्रियों के मनोहर अंगों को न तांकना,पहले भोगे हुए भोगों का स्मरण न करना,कामोद्दीपन करने वाले बाह्य रसों का सेवन न करना और अपने शरीर को इत्र-तेल वगैरह से न सजाना,ये ब्रह्मचर्य व्रत की ५ भावनाएं हैं। इस बात को बहुत ध्यान से समझने की जरुरत है। इसी कारण से बलात्कार और यौनाचार होते हैं।आजकल सामाजिक माध्यमों सहित पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से भी शारीरिक सम्बंध बनाने सम्बन्धी साहित्य प्रचुरता से उपलब्ध है। आजकल फैशन की दुनिया में मारा-मारी इतनी बढ़ गई है कि,समझना होगा कि युवा-युवतियां कपड़े अंग ढंकने के लिए पहनते हैं या अंगों के उभार के लिए। इसके कारण भी विपरीत लिंग का आकर्षण बढ़ता है,और जब कभी अवसर मिलता है,तब अनैतिक कार्य हो जाते हैं। इसमें कौन दोषी है,कहना मुश्किल है ? आजकल नशे का सेवन आम बात है,और कामोत्पादक औषधि पैसे खर्च करने पर बहुलता से मिल रही है,उनका सेवन आम बात है। दूसरों को आकर्षित करने वाले इत्र,ब्यूटी पार्लर,फैशन शो,फिल्म,टी.वी.शो तथा आजकल यू-ट्यूब पर बनने वाले शो के लिए युवा वर्ग दीवाना है। इसके कारण कलाकारों का अधिकतम समय ऐसे माहौल में बीतता है,जिससे सब कुछ संभव है । आजकल प्रतिभा उभारने के लिए युवा वर्ग सब कुछ दांव पर लगाने को तैयार है। अभी एक केन्द्रीय मंत्री ने कह दिया कि,’इतने बड़े देश में दुष्कर्म की एक घटना होने से इतना हो-हल्ला ठीक नहीं’। शायद मंत्री को जानकारी नहीं है कि, इस तरह के अपराध हत्याओं से अधिक होते जा रहे हैं। कम-से-कम इस स्तर पर सुरक्षा होने से बचाव तो होना चाहिए।
महामहिम राष्ट्रपति ने इस पर एक अध्यादेश लागू कर कठोरतम नियम लागू किया है और समय-सीमा निर्धारित की है। यह शुरुआत बहुत अच्छी है,पर कागज़ों पर व्यवहारिक धरातल पर और हमारे देश के लचीले कानून एवं प्राकृतिक न्याय की अवधारणा से कितना कारगर और असरकारक होगा,यह भविष्य के गर्भ में छिपा है। हमारे यहाँ दंड व्यवस्था बहुत सर्वश्रेष्ठ और मानवीय आधार पर स्थापित है,पर उसका क्रियान्वयन करने वाले हमारे वकील,पुलिस,न्यायालय,साक्ष्य,पीड़ित और उससे जुडी व्यवस्थाएं इतनी जटिल हैं कि अब तो व्यवस्थाओं से भी डर लगता है। हमारे यहाँ दंड व्यवस्था बहुत है,पर सुधार या बचाव का कोई मापदंड या मानदंड निर्धारित नहीं किया गया है।
अपराध की शुरुआत मन से होती है,फिर वचन में तथा उसके बाद क्रियान्वन में होती है। यह एक निश्चित प्रक्रिया है,हमें पहले मानसिक रूप से शिक्षित करने की जरुरत है। प्रायः अपराध या कोई भी काम मन से शुरू होते हैं-मन में नकारात्मक और सकारात्मक विचार आते हैं। हमने नकारात्मकता को बहुत बढ़ावा दिया-जैसे हमें झूठ नहीं बोलना चाहिए,की जगह हम नहीं सिखाते कि हमें सच बोलना चाहिए। जैसे बलात्कार नहीं होना चाहिए,की जगह हम ब्रह्मचर्य के आदर्शों को समझाएं,दिशा-बोध दें,हम पहले स्वस्थ व्यक्ति,परिवार, समाज के निर्माण में कैसे भागीदारी निभाएं,उसके बाद उससे उपजने वाली बीमारियों का इलाज़ करें,पर हमारा जोर इलाज पर है कारण पर नहीं।
विकृति का यह आंकड़ा और बढ़ेगा,उसमें कानून का लचीलापन,  सामाजिक ढांचा में परिवर्तन,भौतिक सम्पन्नता की अंधी दौड़ और सरलता से आगे बढ़ने की होड़ ने सब मर्यादाएं तोड़ दी है,और हम दूसरों से अपेक्षा कर रहे हैं। आज के समय में युवा वर्ग को पाप-दुष्कर्म से बचाने के लिए घर में प्रथम नैतिकता,धार्मिकता और सामाजिकता का पाठ सिखाना होगा,अन्यथा जिसके ऊपर बीतती है,उसके साथ सहानुभूति क्षणिक होकर हम विस्मृति में चले जाते हैं। हमें समाज में कुछ बुनियादी बातों पर चर्चा करानी चाहिए-बचाव ही इलाज़ है,ये विकृतियां सनातनी हैं और रहेंगी,न होती इतिहास में तो क्यों कहना पड़ता पुराणों को नीति शास्त्रों को और कथाकारों को।
सवाल यह है कि,क्या हम विस्मृत हो गए हैं अपने इतिहास से…? पृथ्वीराज ने संयोगिता का बलात हरण न किया होता,जयचंद ने गौरी को न बुलाया होता तो क्या हम ये दिन देखते? इतिहास इन्हीं आख्यानों से भरे पड़े हैं,और साथ में यह भी बताया-समझाया और मार्ग दिखाया कि,बुरे काम का बुरा नतीजा होता है। याद रखिए कि,एक क्षण की भूल जिंदगी भर के लिए गुनाहगार बना देती है। अब जरुरत है बचाव और कारणों की,  जब तक जड़ तक नहीं पहुंचेंगे,तब तक कोई सुधार नहीं होगा। कानून के साथ चरित्र निर्माण बहुत जरुरी है।

परिचय- डॉ.अरविन्द जैन का जन्म १४ मार्च १९५१ को हुआ है। वर्तमान में आप होशंगाबाद रोड भोपाल में रहते हैं। मध्यप्रदेश के राजाओं वाले शहर भोपाल निवासी डॉ.जैन की शिक्षा बीएएमएस(स्वर्ण पदक ) एम.ए.एम.एस. है। कार्य क्षेत्र में आप सेवानिवृत्त उप संचालक(आयुर्वेद)हैं। सामाजिक गतिविधियों में शाकाहार परिषद् के वर्ष १९८५ से संस्थापक हैं। साथ ही एनआईएमए और हिंदी भवन,हिंदी साहित्य अकादमी सहित कई संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। आपकी लेखन विधा-उपन्यास, स्तम्भ तथा लेख की है। प्रकाशन में आपके खाते में-आनंद,कही अनकही,चार इमली,चौपाल तथा चतुर्भुज आदि हैं। बतौर पुरस्कार लगभग १२ सम्मान-तुलसी साहित्य अकादमी,श्री अम्बिकाप्रसाद दिव्य,वरिष्ठ साहित्कार,उत्कृष्ट चिकित्सक,पूर्वोत्तर साहित्य अकादमी() आदि हैं। आपके लेखन का उद्देश्य-अपनी अभिव्यक्ति द्वारा सामाजिक चेतना लाना और आत्म संतुष्टि है।

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