दृष्टि सम्पन्न लेखक की बोधगम्य लघुकथाएं

मनोज जैन ‘मधुर’
शिवपुरी (मध्यप्रदेश)
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पुस्तक समीक्षा…………………………….
यूं तो अग्रज घनश्याम मैथिल ‘अमृत’ जी साहित्यिक सुरुचि और अपने सुमधुर व्यक्तित्व के कारण राजधानी के चर्चित चेहरे हैं,पर इस बार वे चर्चा के केंद्र में अपने कृतित्व से आए हैं।
एक पखवाड़े के अंतराल में हाल ही में  उनकी लिखी दो पुस्तक पढ़ने में आईं जिनमें एक समालोचना पर केन्द्रित  समीक्षा संग्रह है तो दूसरी लघुकथाओं पर केन्द्रित…’एक लौहार की।’
९४ लघुकथाओं का यह संग्रह कई मायने में महत्वपूर्ण है। पहली बात तो यह कि सद्य प्रकाशित संग्रह पाठकों को आरम्भ से अंत तक बांधे रखने की अपनी कसौटी पर १०० फीसदी खरा उतरता है, और संग्रह की यह खूबी ही अपने-आप में बड़ी बात है।
दूसरी बात जो अत्यंत जरूरी और उल्लेखनीय है वह यह कि संग्रह में लघुकथाकार ने अत्यंत सूक्ष्म और गहन दृष्टि से विषय वैविध्य के अनुपम संसार की सराहनीय रचना की है। यह विषय वैविध्य लेखक की समीचीन दृष्टि सम्पन्नता के आस्वाद का पता देता है।मेरा मानना है कि बिना अन्वेषण दृष्टि के, लघुकथाकार वह क्षण पकड़ ही नहीं सकता,जिसमें एक अच्छे लघुकथा लेखक के खाते में एक अनुभव लघुकथा के रूप में जुड़ता चला जाता है। इस दृष्टि से भी मैथिल जी की लघुकथाएं अपना प्रभाव छोड़ने में समर्थ हैं।
अधिसंख्य लघुकथाएं भावुक मन पर-पाठक के मानस पर क्षणिक सन्देश छोड़तीं हैं।
कुछेक लघुकथाओं में जहाँ लेखक ने पाठकों की अतिरिक्त चिंता करनी चाही,  वहीं जाकर मामला अटपटा होता चला गया।
 प्रकारान्तर से कहूँ तो लेखक ने जहाँ कथावस्तु से जोड़ने के लिए पाठक को अतिरिक्त कड़ी देना चाही,वहाँ लघुकथा कमज़ोर हुई और होती चली गई।
संग्रह की एक लघुकथा जिसे मैथिल जी भले ही लघुकथा कहें,पर मुझे कविता के निकट का ही मामला नजर आया। अधिसंख्य ने ‘चल रे मटके टम्मक टू’  पढ़ी ही होगी,वह इस अपेक्षा से तो लघुकथा ही कही जाएगी।
द्रष्टव्य है,एक उदाहरण पृष्ठ क्रमांक १०२ से संग्रह की अंतिम लघुकथा विसंगति के बावजूद अपने स्थाई सन्देश के कारण मुझे भी बहुत पसन्द आई। देखें-
जड़ें
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उसने वृक्ष से
सारे फूल फल और
पत्तियाँ नोंच डाले।
पेड़ ने हँसते हुए
उन्हें फिर उगा दिया।
उसने फिर से
पेड़ की सारी डालियों
टहनियों को काट डाला।
पेड़ ने मुस्कराते हुए
उन्हें फिर हरा-भरा
कर दिया।
उसने अगली बार
पेड़ को तने सहित
काट डाला।
इस बार भी
पेड़ कराहते हुए
जमीन से
नई कोंपलें लेकर
फिर उठ खड़ा हुआ।
इस बार उसने पेड़ को
जड़ से खोद
उखाड़कर फेंक दिया।
अब इस बार उसने
पेड़ को नहीं
खुद को
उखाड़कर
फेंका था।
लगभग बेहद पठनीय इस कृति का साहित्य जगत स्वागत करेगा,ऐसा मेरा मानना है।
वैसे इस प्रक्रिया से मेरे समीक्षक और वैचारिक चेतना सम्पन्न मित्र मैथिल जी  आसानी से बच सकते थे,बावजूद इसके संग्रह पठनीय है,और संग्रहणीय भी।
कुल मिलाकर बेहतरीन काम हुआ है।
दूसरी ओर निराशा भी हाथ लगी है इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से लघुकथाएं
उड़ाकर अपने नाम करने वाले सक्रिय चोरों के हाथ,पर अब क्या किया जा सकता है। ऐसा होना तो स्वाभाविक प्रक्रिया है,आखिरकार अब वे भी कहाँ जाएं ?
बेचारे अब तो लघुकथाएं भी आसानी से नहीं मार सकेंगे,क्योंकि मैथिल जी अब प्रिंटमीडिया में आईएसबीएन क्रं. के साथ दर्ज हैं।
परिचय-मनोज जैन का जन्म २५ दिसम्बर १९७५ का है। आपका निवास ग्राम-बामौरकलां(शिवपुरी, (म.प्र.)है। उपनाम ‘मधुर’ लगाते हैं। आप फिलहाल मध्यप्रदेश की इन्दिरा कॉलोनी(बाग़ उमराव दूल्हा)भोपाल में रहते हैं। पेशे से निजी संस्थान में क्षेत्रीय विक्रय प्रबंधक श्री जैन ने अंग्रेज़ी साहित्य में स्नातकोत्तर की शिक्षा पाई है। आपकी प्रकाशित कृति-‘एक बूँद हम'(गीत संग्रह),’काव्य अमृत'(साझा काव्य संग्रह)सहित अन्य है। विविध प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में रचनाओं का नियमित प्रकाशन होता रहता है। दूरदर्शन व आकाशवाणी से भी रचनाएँ प्रसारित हुई हैं। संकलित प्रकाशन में ‘धार पर हम-२’, ‘नवगीत नई दस्तकें’ एवं ‘नवगीत के नए प्रतिमान’ (शोध सन्दर्भ ग्रन्थ)आदि प्रमुख हैं। दो गीत संग्रह,पुष्पगिरि खण्डकाव्य सहित बाल कविताओं का संग्रह तथा एक दोहा संग्रह प्रकाशनाधीन है। आपको मिले १५ सम्मानों में खास मध्यप्रदेश के राज्यपाल द्वारा सार्वजनिक नागरिक सम्मान (२००९),शिरढोणकर स्मृति सम्मान,म. प्र. लेखक संघ का रामपूजन मलिक नवोदित गीतकार-प्रथम पुरस्कार (२०१०) और अभा भाषा साहित्य सम्मेलन का साहित्यसेवी सम्मान, २०१७ में ‘अभिनव शब्द शिल्पी सम्मान’ और राष्ट्रीय नटवर गीतकार सम्मान आदि हैं।

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