देना पड़ता है कर्मों का हिसाब

संजय जैन 
मुम्बई(महाराष्ट्र)

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कोई भी युग हो चाहे कलयुग या सतयुग,इन युग में जिन्होंने जन्म लिया है,उन्हें अपने कर्मों का हिसाब-क़िताब यहीं पर देना पड़ता है। इसमें चाहे अमीर हो,संत हो या गरीब हो,जैसे कर्म संसार में किए हैं,उन्हीं के अनुसार उन्हें अपने अपने कर्म का फल भोगना पड़ेगा। यही संसार का नियम है। इसी बात को समझाने के लिए एक छोटा-सा दृष्टांत देता हूँ-

एक छोटा-सा शहर था,उसमें एक सेठजी अपने परिवार सहित रहते थे। सेठ जी धर्म-कर्म में बहुत ही यक़ीन करने के साथ दयालु स्वाभाव के भी थे। सेठजी साहूकारी का व्यवसाय करते थे। उनके पास जो भी व्यक्ति उधार मांगने आता,वे उसे उधार देने के लिए मना नहीं करते थे। सेठ जी मुनीम को बुलाते और जो उधार मांगने वाला व्यक्ति होता,उससे पूछते कि-‘भाई,तुम उधार कब लौटाओगे ?​ इस जन्म में या फिर अगले जन्म में ?’ जो लोग ईमानदार होते वो कहते-‘सेठ जी हम तो इसी जन्म में आपका कर्ज़ चुकता कर देंगे,वो भी पूरा ब्याज देकर,क्योंकि आपने हमारी मदद की है,तो हमारा भी फर्ज बनता है कि जिसने मुसीबत में साथ दिया,उसे भला क्यों झूठ बोलना।’ कुछ लोग जो ज्यादा चालाक व बेईमान होते वे कहते-‘सेठ जी,हम आपका कर्ज़ अगले जन्म में उतारेंगे।’ वो अपनी चालाकी पर मन ही मन खुश होते कि,क्या मूर्ख सेठ हैI जो अगले जन्म में उधार वापसी की उम्मीद लगाए बैठा है। ऐसे लोग मुनीम से पहले ही कह देते कि वो अपना कर्ज़ अगले जन्म में लौटाएंगे। मुनीम भी कभी किसी से कुछ पूछता नहीं था। जो जैसा कह देता,मुनीम वैसा ही बही में लिख लेता था।
यह बात एक चोर को पता चली कि,इस शहर में एक सेठ जी है,जो पैसे उधार देते हैं,और वापिसी अगले जन्म में लेते हैं। चोर के मन में लालच आया कि,क्यों न हम ऐसे सेठ से उधार लें और फिर पैसे वापिस देंगे ही नहीं। फिर क्या था,एक दिन चोर भी सेठ जी के पास उधार मांगने पहुँचा। उसे भी मालूम था कि सेठ अगले जन्म तक के लिए रकम उधार दे देता है। हालांकि,उसका मकसद उधार लेने से अधिक सेठ की तिजोरी को देखना था। चोर ने सेठ से कुछ रुपए उधार मांगे। सेठ ने मुनीम को बुलाकर उधार देने को कहा। मुनीम ने चोर से पूछा-‘भाई,इस जन्म में लौटाओगे या अगले जन्म में ?’ चोर ने कहा-‘मुनीम जी,मैं यह रकम अगले जन्म में लौटाऊँगा।’ मुनीम ने तिजोरी खोलकर पैसे उसे दे दिए। चोर ने भी तिजोरी देख ली और तय कर लिया कि इस मूर्ख सेठ की तिजोरी आज रात में उड़ा दूँगा। फिर क्या,मन में लालच का भूत जो सवार था,तो उसी रात ही सेठ के घर पहुँच गया और वहीं भैंसों के तबेले में छिपकर सेठ के सोने का इन्तजार करने लगा। अब घटना कुछ इस तरह से घटी कि,अचानक चोर ने सुना कि भैंसे आपस में बातें कर रही हैं। चोर को पशुओं की भाषा समझ आती थी,भैंसें आपस में बात कर रही थी। एक भैंस ने दूसरी से पूछा-‘तुम तो आज ही आई हो न बहन ?’ दूसरी भैंस ने जवाब दिया-‘हाँ,आज ही सेठ के तबेले में आई हूँ,सेठ जी का पिछले जन्म का कर्ज़ उतारना है और तुम कब से यहाँ हो ?’ दूसरी भैंस ने पलटकर पूछा,तो पहले वाली भैंस ने बताया-‘मुझे तो तीन साल हो गए हैं,बहन। मैंने सेठ जी से कर्ज़ लिया था यह कहकर कि अगले जन्म में लौटाऊँगी। सेठ से उधार लेने के बाद जब मेरी मृत्यु हो गई,तो मैं भैंस बन गई और सेठ के तबेले में चली आई। अब दूध देकर उसका कर्ज़ उतार रही हूँ। जब तक कर्ज़ की रकम पूरी नहीं उतर जाती,तब तक यहीं रहना होगा।’ इस तरह की दोनों की बातचीत चोर सुन रहा था। फिर क्या,चोर ने ये सब बातें सुनी, तो उसके होश उड़ गए और वहाँ बंधी भैंसों की ओर देखने लगा। वो समझ गया कि ​उधार चुकाना ही पड़ता है,चाहे इस जन्म में या फिर अगले जन्म में…उसे चुकाना ही होगा।​ चोर उल्टे पाँव सेठ के घर की ओर भागा और जो कर्ज़ उसने लिया था,उसे फटाफट मुनीम को लौटाकर रजिस्टर से अपना नाम कटवा लिया। ​
बात इतनी-सी है कि,हम सब इस दुनिया में इसलिए आते हैं​,क्योंकि हमें किसी से लेना होता है,तो किसी का देना होता है।​ इस तरह से हर मनुष्य या पशु-पक्षी को कुछ-न-कुछ लेने-देने के हिसाब चुकाने होते हैं। इस कर्ज़ का हिसाब चुकता करने के लिए इस दुनिया में कोई बेटा बनकर आता है,तो कोई बेटी बनकर आती है,कोई पिता बनकर आता है,तो कोई माँ बनकर आती है। ऐसे ही कोई पति बनकर आता है,तो कोई पत्नी बनकर आती है,कोई प्रेमी बनकर आता है,तो कोई प्रेमिका बनकर आती है। कोई मित्र बनकर आता है,तो कोई शत्रु बनकर आता है,कोई पड़ोसी बनकर आता है तो, कोई रिश्तेदार बनकर आता है। याद रखिए कि,चाहे दुःख हो या सुख..हिसाब तो,सबको देना ही पड़ता है। यही प्रकृति का नियम है,इसलिए साथियों,बताना चाहता हूं  कि जब हमें ८४ योनि के बाद मानव जन्म मिला है तो क्यों न हम इसे सार्थक बनाएं और अच्छे कर्म करके इस संसार से विदा लें,ताकि हमें और आपको किसी भी प्रकार का कर्ज न चुकाना पड़े। जरूरी नहीं है कि हर दिन आप पूजा-पाठ,धर्म-ध्यान आदि करें,परन्तु एक काम तो सभी लोगों को करना चाहिए और वो है हमारे अच्छे कर्म।
परिचय-संजय जैन बीना (जिला सागर, मध्यप्रदेश) के रहने वाले हैं। वर्तमान में मुम्बई में कार्यरत हैं। आपकी जन्म तारीख १९ नवम्बर १९६५ और जन्मस्थल भी बीना ही है। करीब २५ साल से बम्बई में निजी संस्थान में व्यवसायिक प्रबंधक के पद पर कार्यरत हैं। आपकी शिक्षा वाणिज्य में स्नातकोत्तर के साथ ही निर्यात प्रबंधन की भी शैक्षणिक योग्यता है। संजय जैन को बचपन से ही लिखना-पढ़ने का बहुत शौक था,इसलिए लेखन में सक्रिय हैं। आपकी रचनाएं बहुत सारे अखबारों-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रहती हैं। अपनी लेखनी का कमाल कई मंचों पर भी दिखाने के करण कई सामाजिक संस्थाओं द्वारा इनको सम्मानित किया जा चुका है। मुम्बई के एक प्रसिद्ध अखबार में ब्लॉग भी लिखते हैं। लिखने के शौक के कारण आप सामाजिक गतिविधियों और संस्थाओं में भी हमेशा सक्रिय हैं। लिखने का उद्देश्य मन का शौक और हिंदी को प्रचारित करना है।

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