दोगलापन

डॉ. सुशीला पाल
मुम्बई(महाराष्ट्र)
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पवित्र पावनी गंगा को,
याद तो श्रद्धा से करते हैं।
किन्तु पापनाशिनी के,
आशय से पूजन-अर्चन करते हैं।

पतित पावनी कह स्नान करते,
लेकिन मलिनता ही तो घोलते हैं।
फिर भी मन साफ नही,पावन है विश्वास कहीं ?
क्यों इस सोच को ही लोग प्रणाम करते हैं।

धर्म को कर्म से जोड़कर,
क्यों नहीं लोगों का कल्याण चाहते हैं!
निसर्ग ने दिए उदाहरण भरपूर,
मानव ने उल्लू साधे,अपने निराकुल।

जब देखा आरक्षित सिर पर चढ़कर गा रहा!
तीसरा वर्ग भी ज्ञान का भंडार सजा रहा है।
फिर हिल गया सिंहासन इंद्र का,
आरक्षण हटाओ का नारा दे मारा है।

स्वार्थवादिता से परे यज्ञ कुछ ऐसा प्रगटाया जाए,
उपाय करो कि कनखी दृष्टि से बच निकल जाओ।
कब तक इन दोगली विचार धारा के अभिमुख रहा जाए!
निर्दोष अभिमन्यू ही चक्रव्यूह के घेरे में क्यों कर आए ?

परिचय-डॉ.(श्रीमती) सुशीला पाल का साहित्यिक उपनाम-साथी है। आप २ जनवरी १९७८ को बड़ौदा (गुजरात) में जन्मीं हैं। वर्तमान में मुम्बई स्थित लोक निसर्ग कॉ.हा.सो.(घाटिपाड़ा के पास)मुलुंड (पश्चिम) में रहती हैं। महाराष्ट्र राज्य की मुम्बई यानी ‘माया नगरी’ से जुड़ीं डॉ.पाल की शिक्षा एम.ए. और पी- एच.डी. है। आपका कार्यक्षेत्र आमंत्रित  वक्ता एवं लेखिका का है। लेखन विधा के अंतर्गत आप कविता,ग़ज़ल एवं कहानी लेखन करती हैं। हिन्दी भाषा की सेवा और इसे मातृभाषा बनाने को तत्पर डॉ.पाल की रचनाएं एक प्रकाशन में  प्रतिवर्ष छपती हैं,जबकि स्वाध्याय पुस्तिका और व्याकरण की कई पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। आपने ब्लॉग के जरिए भी लेखनी का उद्देश्य-हिंदी की सेवा को बना रखा है। 

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