धरती की वेदना     

हेमलता पालीवाल ‘हेमा’
उदयपुर (राजस्थान )
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अपनी गोद में बसी,
एक सुन्दर दुनिया
देख धरती माँ,
हर्षित व खुश हुई।
पालूँगी सदा मैं इनको,
पोषण मैं नित्य करूँगी
अपनी ममता-करूणा को,
मैं इन पर सदा वार दूँगी।
आँधी-तूफानों से डटकर,
रक्षा इनकी हरदम करूँगी
अन्न-जल की न होगी कमी,
हरी-भरी सदैव रहूँगी।
सूरज की तेज तपन को,
अपने आँचल से ढंक लूँगी
अपनी नरम माटी से तो,
उसका ताप सोंख लूँगी।
बाढ़ क्या बहा ले जाएगी इनको,
चट्टान बन में राह रोक लूँगी
मैं धरती माँ हूँ इनकी,
हर पल रक्षा करती रहूँगी।
पर अफसोस …,
धरती की गोद में बैठकर,
धरती को ही रौंद डाला।
हरा-भरा आँचल उसका,
तेज तपन से बचाता था
पत्ता-पत्ता पेड़ का आज,
जड़ से ही उखाड़ डाला।
रोक लेती थी तेज बाढ़ को,
उस चट्टान को ही तोड़ डाला
रोक लेते थे सुरज की गर्मी को,
उन हरे-भरे से पेड़ों को ही काट डाला।
वीराना-सा लगता है जहाँ,
मरघट इसे तुमने बना डाला
जिसने प्यार रखा गोद में,
उस गोद को ही रौंद डाल।
धरती की करूणा को तुमने,
स्वार्थी बनकर भुला डाला॥
परिचय – हेमलता पालीवाल का साहित्यिक उपनाम – हेमा है। जन्म तिथि -२६ अप्रैल १९६९ तथा जन्म स्थान – उदयपुर है। आप वर्तमान में सेक्टर-१४, उदयपुर (राजस्थान ) में रहती हैं। आपने एम.ए.और बी.एड.की शिक्षा हासिल की है। कार्यक्षेत्र-अध्यापन का है। लेखन विधा-कविता तथा व्यंग्य है। आपकी लेखनी का उद्देश्य-  साहित्यिक व सामाजिक सेवा है। 

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