धाराप्रवाह बोल पाना कठिन

योगेन्द्र जोशी
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सेवानिवृत्त विश्वविद्यालय शिक्षक होने के नाते मेरी एक-दो शंकाएं हैं। हमारे देश की शिक्षा व्यवस्था लगभग पूरी तरह अंग्रेजी भाषा पर आधारित है। हिन्दी अथवा अन्य प्रादेशिक भाषा-माध्यमों की स्थिति प्रायः सर्वत्र दयनीय है। संबंधित विद्यालयों के विद्यार्थी चिकित्सा-विषयक संस्थानों तक पहुंच भी पाते हैं,इसमें मुझे संशय है। आज के समय में चिकित्सा संस्थानों के पास प्राय सभी छात्र अंग्रेजी माध्यम से पहुंचे होते हैं और वही कालान्तर में वहां शिक्षक भी बनते हैं। ये लोग अन्य क्षेत्रों के विशेषज्ञों की भांति सामान्य बोलचाल में भी हिन्दी नहीं बोल पाते,तब कक्षा कार्य हिन्दी में कैसे कर पाएंगे,यह प्रश्न मेरे सामने है। क्या वे एवं उनके छात्र ‘हिन्दी’ सीखने को तैयार होंगें और हिन्दी में पढ़ेंगे-पढ़ाएंगे ?
मुद्दा हिन्दी में चिकित्सा पढ़ाई का
दूसरा सवाल तकनीकी पारिभाषिक शब्दोंं का है। जो शब्द सरकारी शब्दावली आयोग ने सुझाए हैं,उनका प्रयोग करता कौन है ? अब तो आम मरीज तक अतिसामान्य शब्दों को भूलते जा रहे हैं,यथा बुखार (टेम्प्रेचर ),वजन (वेट),ऊंचाई-लंबाई (हाइट),यकृत-जिगर (लिवर)आदि।
हिन्दी में किताब लिखना आसान है,किंतु कक्षा में करीब-करीब धाराप्रवाह बोल पाना हम हिन्दी-भाषियों (?) के लिए आसान नहीं है। संकल्प का अभाव स्थिति को और भी गंभीर बना देता है।
(सौजन्य:वैश्विक हिन्दी सम्मेलन, मुम्बई)

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