धार्मिकता और नैतिकता से ही मिलेगा स्वार्थ का समाधान

डॉ.अरविन्द जैन
भोपाल(मध्यप्रदेश)
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यदि मनुष्य सामाजिक और सांसारिक प्राणी है,तो उसमें हिंसा आदि का होना लाजिमी है,क्योंकि मानव हमेशा मोह के वश हर समय या तो राग करता है या द्वेषl राग-द्वेष के कारण हिंसादि पापों का होना अनिवार्य हैl यदि वह धार्मिक होता है तो कुछ क्षण के लिए उसमें शुद्ध भाव आते हैं-जैसे वर्षा ऋतु में जब बिजली कड़कती है और विलीन हो जाती हैl हिंसादि के अंतर्गत हिंसा,झूठ,चोरी, कुशील और परिग्रह ये पाप के साथ चार प्रकार के कषायों को भी स्वीकारता हैl वे हैं क्रोध,मान,माया लोभ इस प्रकार से मनुष्य हिंसाजन्य प्रवृत्ति को धारण करता है और इसका इलाज़ अहिंसा,सत्य, अचौर्य,ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह हैं। विश्व के अंदर जितने भी राष्ट्र हैं उनको एक कतार में खड़ा कर दिया जाए तो कानून की पुस्तकें कश्मीर से कन्याकुमारी तक हो जाएंगी,जो मात्र पंच पापों के लिए बने हैं,पर उनमें सुधार की सुविधा नहीं बताई गई है, या रोकथाम कैसे करें। जैसे आयुर्वेद शास्त्र में सिद्धांत हैं कि,स्वस्थ्य
व्यक्ति स्वस्थ्य कैसे रहे एवं आतुर (रोगी) को रोगमुक्त कैसे करें। चिकित्सा विज्ञान में सबसे पहले शरीर रचना,क्रिया सामान्य और फिर विकृति विज्ञान में विकृति बताई जाती है। इसी प्रकार वर्तमान में जितनी भी हिंसादि घटनाएं हो रही हैं,उसके बारे में समझें,तब हम रोकथाम पर विचार कर सकते हैंl बिना कारण के कोई कार्य नहीं होता हैl
आज हिंसा और विलासिता के कारण हमने जो भौतिक सम्पदा प्राप्त कर उन्नति का भवन बनाया है,वह बहुत दिनों तक नहीं टिकेगाl यहाँ यह भी स्मरण रखना होगा कि,जीव हिंसा और मांस विक्रय द्वारा शासन जितना भी धन कमाता है,वह भीषण नदियों की बाढ़,अनावृष्टि और प्राकृतिक प्रकोपों के द्वारा क्षण भर में समाप्त हो जाता हैl पाप द्वारा सम्पत्ति,शांति और सौमनस्य का विनाश हो जाता हैl
`त्यागेन अम्रतत्वं आनशु:` त्याग द्वारा अमृतत्व की प्राप्ति होती हैl सुकरात ने कहा-जितनी जरूरतों को तुम कम कर सकोगे,उतना ही तुम परमात्मा के सदृश्य बनोगेl बाज़ार में जाकर देखकर सोचता था इनमें से किन-किन पदार्थों के बिना मेरा काम चल सकता है ? समाज में त्यागी पुरुषों में वृद्धि होगी,तब राष्ट्र उन्नत होता हैl आज त्यागियों का स्थान स्वार्थी लोगों ने ग्रहण किया है,वे स्वार्थी लोग मछली बेचने का काम करने लगे हैं यानी `सेल-फिश`l इस देश में हिंसा के कारण जनता दुखी हैl यह बड़ी
विचित्र बात है कि,हम जितने अहिंसक के रूप में जाने जाते हैं, उतने हिंसक हैंl जैसे कोई दुबला मनुष्य मोटा होने के लिए शरीर में सूजन आने से मोटा महसूस करता है,उससे दुबला अच्छाl जितना हम भौतिक विकास से सुखी हो रहे होते हैं तो उसका अनुभव हमें क्यों नहीं हो रहा है ? हर कोई चिंताग्रस्त हैl
आज मंहगाई का ज्वालामुखी इतना अधिक धधक रहा है कि-
`देश हुआ आजाद अब कीमत भी आजाद,
जी भर बढ़ने दो उनसे क्यों करते हो फरियादl`

मनुष्य भोग विलास की ओर कदम बढ़ाता है,तो कुछ समय के बाद पतन को प्राप्त होता हैl जो जीतता है उसे हारने का भय सताता हैl `विलासपुरी` का निवासी `विकासपुरी` से दूर होता हुआ `विनाशपुर` के निकट पहुँचता हैl
विजय जनित आनंद कृत्रिम है,-
`हैं बहारे बाग़ दुनिया चंद रोज,
देख लो इसका तमाशा चंद रोजl`

आज हम देख रहे हैं कि,किसी भवन की नींव में मुर्दा डाला जाए और ऊपर से दया के देवता का मंदिर बनाया जाए तो क्या उस स्थान पर भगवती अहिंसा का निवास होगाl दया के देवता के मंदिर की नींव में रक्त नहीं,प्रेम का अमृत सींचा जाना चाहिएl असली आनंद का भण्डार बड़े भवनों के भौतिक विकास केंद्रों में नहीं हैl आत्मा को महान बनाने में व्यक्ति और राष्ट्र का हित हैl शासन,नागरिकों के घरों की छतों को ऊँचा करने में राष्ट्र की उतनी सेवा नहीं कर सकते,जितनी उनकी आत्मा को विशाल बनाकर कर सकते हैंl
जो जितना संग्रह करता है उसकी उतनी अधिक बैचेनी होती है-
`चाह घाटी चिंता हटी,मनुआ बेपरवाह,
जिन्हें कछु नहीं चाहिए,वे शाहनपति के शाहl`

आज सब अरब-खरबपति बनने की होड़ में लगे हैं और कुछ लोगों के पास दुनिया की आधी दौलत है,तो कई आज भी विकास के नाम पर दो जून की रोटी और सर पर छत के लिए तरस रहे हैंl
`अमल में जिंदगी बनती है,जन्नत भी जहन्नुम है,
ये खाकी अपनी फितरत में,न नूरी है न नारी हैl`

यदि मानव सिर्फ अपना मानव धरम अपना ले तो दानवीय प्रवृत्ति पर अंकुश लग सकता है,पर आज समाज में या मानव की सोच-मानसिकता में इतना बदलाव आ गया है कि,उसने अपनी दूषित वृत्ति को अपनाकर स्वयं अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारी हैl
आर्थिक दौड़ के पीछे मनुष्य इतना भाग रहा है,जिस कारण नैतिक-अनैतिक कार्यों का कोई भान नहींl इस कारण आज कुछ भी करने को तैयार हैl इस एक पाप के कारण सब पाप करता हैl इस धन के लालच में किसी की भी हत्या करना आम बात हो गई,उसके कारण झूठ का प्रचलन इतना अधिक हो गया कि, मोबाइल क्रांति ने इसका दिग्दर्शन बहुलता से कराया हैl आज अपने निजीयों से भी वह छल-कपट करने से नहीं चूकता हैl चोरी, डकैती,राहजनी,नकबजनी,धोखाधड़ी का बोलबाला चल रहा हैl आज से नहीं,सनातनी मानवीय दुर्बलता यौन अपराधों की
रही है,पर आज चलायमान(मोबाइल),अंतरजाल(इंटरनेट) और मीडिया के कारण प्रचुरता से प्रसार-प्रचार होता हैl यह अपराध अब अमानवीय हो चुका हैl इसने संबंधों को तार-तार कर दिया हैl वर्तमान में यह संक्रमण रोग होता जा रहा है,जो असाध्यता
की ओर जा रहा हैl आज जमाखोरी,अधिक संचय की प्रवृत्ति के कारण हम इतने अमर्यादित होते जा रहे हैं कि,हर शख्स दुनिया की दौलत अपने पास रखना चाहता है,पर यह उसे अपने पुण्य के आधार पर मिलती हैl
इन पापों का समाधान हमारे पास हैl जितने-जितने हम अपने-आप में नैतिक-धार्मिक होंगे,उतने हम सुरक्षित होंगेl धरम व्यक्तिगत होता है,न कि सामूहिक,पर हम इसे सामूहिक मानकर कुछ भी करने को तैयार हैंl हमें राजनीति में विशेष रूप से स्वच्छ आचरण की जरुरत है,सिर्फ बातों से नहीं,पर चारित्र मेंl वैसे ये सब बातें आज के समय में अर्थहीन हैं,पर समाधान
धार्मिकता और नैतिकता से ही मिलेगाl
`सुखी रहें सब जीव जगत के,कोई कभी न घबरावे,
बैर-पाप अभिमान छोड़ जग,नित्य नए मंगल गावेl
ईति भीति व्यापे नहीं जग में,वृष्टि समय पर हुआ करे,
धर्मनिष्ठ होकर राजा भी न्याय प्रजा का किया करेl
रोग,मरी,दुर्भिक्ष न फैले प्रजा शांति से जिया करे,
परम अहिंसा धरम जगत में फ़ैल सर्वहित किया करेl
जैसा खाएंगे अन्न वैसा होगा मन,जैसा पियेंगे पानी वैसी होंगी वाणी,
नीम बोएंगे और इक्षु कहाँ से पाएंगेl
हिंसा जनित जीवन से सुख कहाँ से पाएंगे,
त्यागों इन पापों को,अपनाओ धरम धुरा कोll`

परिचय- डॉ.अरविन्द जैन का जन्म १४ मार्च १९५१ को हुआ है। वर्तमान में आप होशंगाबाद रोड भोपाल में रहते हैं। मध्यप्रदेश के राजाओं वाले शहर भोपाल निवासी डॉ.जैन की शिक्षा बीएएमएस(स्वर्ण पदक ) एम.ए.एम.एस. है। कार्य क्षेत्र में आप सेवानिवृत्त उप संचालक(आयुर्वेद)हैं। सामाजिक गतिविधियों में शाकाहार परिषद् के वर्ष १९८५ से संस्थापक हैं। साथ ही एनआईएमए और हिंदी भवन,हिंदी साहित्य अकादमी सहित कई संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। आपकी लेखन विधा-उपन्यास, स्तम्भ तथा लेख की है। प्रकाशन में आपके खाते में-आनंद,कही अनकही,चार इमली,चौपाल तथा चतुर्भुज आदि हैं। बतौर पुरस्कार लगभग १२ सम्मान-तुलसी साहित्य अकादमी,श्री अम्बिकाप्रसाद दिव्य,वरिष्ठ साहित्कार,उत्कृष्ट चिकित्सक,पूर्वोत्तर साहित्य अकादमी() आदि हैं। आपके लेखन का उद्देश्य-अपनी अभिव्यक्ति द्वारा सामाजिक चेतना लाना और आत्म संतुष्टि है।

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