नदी का दर्द…

विजयसिंह चौहान
इन्दौर(मध्यप्रदेश)
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मैंने पल-पल सींचा अपने इस शहर को। पशु-पक्षी हो या इंसान, सभी के सूखे कण्ठ की प्यास बुझाई है मैंने…l एक समय था जब राजा-महाराजा,साधु-सन्त,छोटा हो या बड़ा सभी श्रद्धा से सिर झुकाते तो कभी राजबाड़ा अपना चेहरा मेरे निर्मल जल में निहारता था। पक्षियों का कलरव,हरियाली-खुशहाली के बीच सुहानी शाम में लोग `सुकून` पाते थे…। समय क्या बदला,लोग बदले और समय के साथ मैं भी बदल गई। आचमन योग्य मेरा जल,अब पूरी तरह से बदल चुका है। समय था जब मैं सुन्दर नदी के रूप में बहती थी,मेरा निर्मल जल शीतल था,जीवन की पनाहगाह थी मेरी कोख। प्राणदायिनी,शीतलप्रिये तथा शहर की जीवनरेखा कहलाने वाली मैं अब महज रेखा हो गई। मैं हूँ आपकी अपनी…नदी,जिसे आप सभी अपने-अपने नाम से पुकारते हैंl कोई मुझे खान नदी,कोई सरस्वती,तो कोई क्षिप्रा-नर्मदा कहकर पुकारता है।  
शहर के धूल-धुंए के बीच आपने कई बार मेरी ओर नजर डाली होगी,कहीं काला तो कहीं सफेद झाग लिए मैं आज भी रेंगती हूंl  तुम्हारे बीच,कूड़ा-करकट तो कभी मरघट की राख लिए अब मेरा मूलस्वरूप परिवर्तित हो चला। मैं तो तुम्हारे कारण बदल गई, किंतु अब तुम्हारी नजरों में वो पहले वाला प्यार नहीं रहा। एक पल के लिए भी क्या आपका मन नहीं हुआ कि,इस प्राणदायिनी के प्राणों के हालचाल पूछें ?….शायद नहीं। मैं रोज आज भी पहले ही की तरह अपने नित्य समय पर बहती हूं। मेरी बूढ़ी हो चुकी निगाहें आज भी ढूंढती है,ऐसा कोई शख्स जो मेरी इस उम्र में फिक्र करे। दवा…इलाज…करा सके। अब मेरी धमनियों में वह निर्मल जल कहां,जो मुझे स्फूर्ति दे सके। शायद,इसलिए मैं भी तुमको सुकून भी नहीं दे पाती। क्या करूं,अब न जल शीतल है और न मन निर्मल,पर क्या इसके लिए भी तुम्हीं जिम्मेदार नहीं हो ? शहर के बच्चों ने इतना मल बहाया कि,अर्न्तात्मा तक मलिन हो चुकी है। ऐसा कोई कचरा नहीं बचा,जो मुझमें नहीं मिलाया। मन में ढेरों गाद लिए आज मैं आंसू भी नहीं बहा सकती, क्योंकि बूढ़ी माँ के आंसू पोंछने वाले ऐसे बच्चे अब कहाँ ? मेरे सारे बच्चे अपने-अपने कामों में इतने मशगूल हैं कि उन्हें मुझे निहारने,देखने,यहां तक कि बच्चों से मिलवाने की फुर्सत भी नहीं बची,और तो और अपने द्वारा फैलाए गए संक्रमण के कारण बच्चों को मेरे पास आने से भी रोकते रहे। बच्चों….हो सके तो एक बार जरूर आना। मत हालचाल पूछना,न ही गले लगाना। दूर ही से सही तुम्हें खड़े-खड़े देख तो लूंगी। सोनू-बबली,भैय्यू-मेघा सभी आना,साथ में काका को भी ले आना,मां जो ठहरी….।
मेरे दामन में पले बच्चों में आज कई जनप्रतिनिधि हैं,तो कई बड़े अफसर बने। शक्ति से भरपूर मेरे इन बच्चों ने भी कभी मेरी सुध नहीं ली। मुसाफिर कहते हैं…..`नीर बहुत था नदिया में पर,रीती है मेरी दिल की गगरिया,हाथ न अब कोई शीश पे रखता,कहां गए ऐसे बड़े जिगरियाl` इतने सुन्दर घाट,चौड़ा झूला पुल,बड़े-बड़े झाड़,छतरियाँ आज भी इन्तजार की बाट जोह रहे हैं कि कोई आएगा जो मां के आंसू पोंछेगा। इस वृद्धाश्रम से निकालकर अपने आंगन में घूमने की आजादी दिलाएगा। मैं भी विश्वास दिलाती हूँ कि मैं फिर जी उठूंगी। स्वच्छ निर्मल जल मेरे हृदय से बहेगा। नख से शिखर तक मेरा रोम-रोम पुलकित हो उठेगा,तो मैं फिर मुस्कुराऊंगी। `मालवा की शाम` लौट आएगी। गौरैया,चिड़िया, कबूतर और मिट्ठू की टोलियां आएंगी और चहचहाहट के गीत सुनाएंगी। मैं भी गाऊंगी,बच्चों तुम भी गुनगुनाना। एक बार संकल्प करके देखो। स्वच्छता अभियान में हाथ बंटाकर देखो, ठान लो…मुझे गंदा नहीं करोगे। कचरा मुझमें नहीं,बल्कि डस्टबिन में डालोगे। न मल डालना और न मलाल डालना,अगर डालना ही है तो,बस प्यार की फुहार डालना। मैं किनारे से बह लूंगी,क्योंकि मैं तुम्हारी अपनी नदी हूं….l
परिचय : विजयसिंह चौहान की जन्मतिथि ५ दिसम्बर १९७० और जन्मस्थान इन्दौर(मध्यप्रदेश) हैl वर्तमान में इन्दौर में ही बसे हुए हैंl इसी शहर से आपने वाणिज्य में स्नातकोत्तर के साथ विधि और पत्रकारिता विषय की पढ़ाई की,तथा वकालात में कार्यक्षेत्र इन्दौर ही हैl श्री चौहान सामाजिक क्षेत्र में गतिविधियों में सक्रिय हैं,तो स्वतंत्र लेखन,सामाजिक जागरूकता,तथा संस्थाओं-वकालात के माध्यम से सेवा भी करते हैंl लेखन में आपकी विधा-काव्य,व्यंग्य,लघुकथा और लेख हैl आपकी उपलब्धि यही है कि,उच्च न्यायालय(इन्दौर) में अभिभाषक के रूप में सतत कार्य तथा स्वतंत्र पत्रकारिता जारी हैl
 

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3 Comments

  1. समय के साथ इंसान की आवश्यकताएं व प्राथमिकताएं बदलती रहीं हैं | आज इंसान बिल्कुल matlabi हो गया है | अपनी आवश्यकताओ की पूर्ति हेतु इंसान ने प्रकृति का दोहन कर धरा की जो हालत कर दी है, उसे देख कर अब कुछ इंसान जागरूक हो रहे हैं | जंगल, नदी, सभी को संरक्षित करने के नाकाफ़ी प्रयास शुरू किये हैं | जब तक भागीरथी प्रयास नहीं किए जाते तब तक न जाने कितनी और नदियों की ऎसी स्थिति हो जाएगी |

    1. आदरणीय
      आपने सही फ़रमाया, धरती का जो तापमान बढा, असमय मौसम का हाल बिगड़ गया देखते ही देखते मालवा का मिजाज ही बदल गया।

      आभार आपका की आपको रचना पसन्द आई, आपकी टिप्पणी के लिए दिल से शुक्रिया।

    2. आदरणीय
      आपने सही फ़रमाया, धरती का जो तापमान बढा, असमय मौसम का हाल बिगड़ गया देखते ही देखते मालवा का मिजाज ही बदल गया।

      आभार आपका की आपको रचना पसन्द आई, आपकी टिप्पणी के लिए दिल से शुक्रिया।।

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