नागरी लिपि के सम्मुख उत्पन्न चुनौतियों का सामना करने की तैयारी

डॉ. एम.एल. गुप्ता ‘आदित्य’
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एक समय था जब महात्मा गांधी और विनोबा भावे जैसे स्वतंत्रता सेनानी राष्ट्रीय एकता की दृष्टि से राष्ट्रभाषा के रूप में हिंदी और राष्ट्रीय लिपि के रूप में देवनागरी लिपि को स्थापित करने के लिए प्रयासरत थे। यहाँ तक कि, शहीदे आज़म भगतसिंह ने भी अपनी मातृभाषा पंजाबी के लिए गुरुमुखी के बजाए वैज्ञानिकता के चलते देवनागरी को अपनाने की बात कही थी। उनका प्रयास था कि देश के जिन हिस्सों में देनवागरी प्रचलित नहीं हैं, वहाँ भी जन-जन तक देवनागरी लिपि पहुंचाई जाए। इसलिए महात्मा गांधी व विनोबा भावे द्वारा हिंदी के साथ-साथ देवनागरी लिपि के लिए अनेक संस्थाएँ खड़ी की थी,लेकिन जिस प्रकार की नीतियाँ अपनाई गई उसके चलते परिणाम उद्देश्य के विपरीत आते रहे। आगे बढ़ने के बजाए हम पीछे की ओर बढ़ते गए। इसके कारणों की मीमांसा अलग से की जा सकती है। अब स्थिति यह है कि हिंदी भाषी क्षेत्रों में भी देवनागरी की जगह रोमन लिपि लेती जा रही है। पहले जिन क्षेत्रों में देवनागरी लिपि प्रचलित नहीं थी,वहाँ देवनागरी लिपि को बढ़ाने की बात थी,अब देवनागरी लिपि को बचाने की स्थिति आ गई है। सिनेमा से मेरा मतलब है कि हिंदी की खानेवाला और हिंदी की बजानेवाला हिंदी सिनेमा, जहाँ एक अर्से से कलाकार हिंदी बोलने में शर्म अनुभव करते थे,अब वे देवनागरी लिपि को अलविदा कह चुके हैं। हिंदी के पटकथा लेखक भले ही देवनागरी लिपि को पसंद करते हों,हिंदी सिनेमा के कलाकारों की अंग्रेजियत के चलते पटकथा,संवाद आदि रोमन लिपि में लिखते हैं। अगर हिंदी में बात करें और देवनागरी में पढ़ें तो अंग्रेजियत का मुलम्मा न उतर जाएगा।
इस समय देवनागरी लिपि के सामने गंभीर चुनौतियां हैं। अगर यूँ कहा जाए कि,देवनागरी लिपि के अस्तित्व को खतरा उत्पन्न हो रहा है तो अनुचित न होगा। किसी भी भाषा की पत्र-पत्रिकाओं की अपनी भाषा को बढ़ाने की जिम्मेदारी होती है। अभिव्यक्ति के लिए नए शब्द,शैली,प्रयोग आदि के माध्यम से भाषा आगे बढ़ती है,लेकिन हिंदी में तो ऐसा लगता है कि पराजित भाव से हिंदी पत्रकारिता ने अंग्रेजी के साम्राज्यवाद के सामने घुटने टेक दिए हैं और उनके सिपाही बन कर चुन-चुनकर अपनी भाषा के जीते-जागते, चलते-फिरते सशक्त शब्दों की पीठ में छुरा घोंपकर उसकी जगह अंग्रेजी शब्दों को स्थापित कर रहे हैं। यहाँ तक कि ये हिंदी के ये समाचार-पत्र अब विश्व की सर्वाधिक वैज्ञानिक लिपि और अपनी भाषा की लिपि अर्थात देवनागरी लिपि के अपदस्थ करते हुए उसके स्थान पर रोमन लिपि को स्थापित करने में जुटे हैं। ऐसा भी कह सकते हैं कि अपनी पत्रकारिता की अपनी भाषा के ही सिपाही निर्ममता से अपनी लिपि को भी कुचलते जा रहे हैं। हो सकता है कि उनकी पीठ पर बैठे प्रबंधन के अंग्रेजीदां सिपाहसालार उन्हें ऐसा करने को विवश कर रहे हैं।
जो भी हो,अंग्रेजी माध्यम की सुनामी में एक के बाद एक भाषा के शब्द,मुहावरे ,लोकोक्ति,प्रयुक्ति और उसकी लिपि बहती जा रही है। हालात तो ऐसे बनते जा रहे हैं कि हिंदी भाषी क्षेत्रों में भी हिंदी भाषियों के बच्चे देवनागरी लिपि को पढ़ने में कठिनाई महसूस करने लगे हैं। उनके लिए देवनागरी में लिखना तो और भी मुश्किल होता जा रहा है। और हाँ,इन हालात के लिए हम सब जो भले ही स्वयं को हिंदीसेवी कहते हों, कम जिम्मेवार नहीं,जो पत्रकार,साहित्यकार, लेखक,शिक्षक,प्रकाशक, राजभाषाकर्मी, अकादमियों के कर्णधार, कलाकार,विज्ञापन जगत के दृष्टा आदि बनकर किसी न किसी रुप में हिंदी को दुह रहे हैं। भारत को छोड़कर ऐसा दुनिया में कहाँ होता है,मुझे तो नहीं पता। तर्क भले ही जो भी दें,सच तो यह है कि जिस थाली में खा रहे हैं,हम उसी में छेद बना रहे हैं।
इन खतरों और चुनौतियों से निपटने के लिए जिस प्रकार की सक्रियता और तैयारी की आवश्यकता है वह अभी दूर-दूर तक कहीं दिखाई नहीं दे रही। अगर सीमा पर दुश्मन आगे बढ़ रहा हो और हमारे सैनिक दुश्मन का मुकाबला करने के बजाए वहाँ देश-प्रेम के गीतों पर झूमने लगें,गीत- संगीत,कविता,कहानी शुरू कर दें तो क्या होगा ? भाषा के क्षेत्र में भाषा के हमारे सिपाही क्या कर रहे हैं ? यही तो कर रहे हैं। छोटे-छोटे गाँवों तक अंग्रेजी माध्यम के विद्यालयों का हमला हो चुका है। हर क्षेत्र में अंग्रेजी का साम्राज्य स्थापित होता जा रहा है,और हम कहानी,कविता,कवि सम्मेलनों की चुटकुले बाजी,हिंदी पखवाड़ों और हिंदी के नाम पर चलने वाले नाटक-नौटंकी में लगे हैं। इससे तो कुछ बचने वाला नहीं। जब हिंदी और देवनागरी लिपि न बचेंगी तो हिंदी का साहित्य,गीत-संगीत,संगीत-नाटक, आदि कैसे बचेगा ? जो हम रच रहे हैं,उसे कौन पढ़ेगा ?
आवश्यक है कि,नागरी लिपि को आगे बढ़ाने के लिए बनी संस्थाओं सहित सभी भाषायी संस्थाएँ इसके लिए सुनियोजित ढंग से ऐसी योजनाएँ बनाए जिससे कि इन चुनौतियों का सामना किया जा सके। यह भी कि इस कार्य के लिए सक्रिय अन्य संस्थाओं का भी परस्पर सहयोग लेकर आगे ब़ढ़ा जाए। हम केवल याचक की मुद्रा में ही क्यों खड़े रहें। हिंदी के पत्र-पत्रिकाओं और चैनलों को भी झिंझोड़ा जाए। संविधान के अनुच्छेद ३४३ के संदर्भ में सरकार को भी ऐसे दिशा-निर्देश जारी करने के लिए कहा जाए कि हिंदी के समाचार पत्र-पत्रिकाएं हिंदी के लिए देवनागरी लिपि का ही प्रयोग करें,रोमन लिपि का नहीं। संविधान के अनुच्छेद ३५१ में संघ को इस संबंध में निदेश दिए गए हैं। मैंने ११वें विश्व हिंदी सम्मेलन में यह सुझाव भी दिया था कि प्रेस-परिषद जैसी संस्थाओं के अंतर्गत मीडिया की भाषा को नियंत्रित करने के लिए एक नियामक संस्था गठित की जाए या ऐसी ही कोई अन्य विधिक व्यवस्था की जाए ताकि अपनी भाषाओं को अंग्रेजी व रोमन लिपि की सुनामी से बचाया जा सके।
सबसे बड़ा और जरूरी काम तो शिक्षा के क्षेत्र में किया जाना है जिसे हमने निजी क्षेत्र के हाथ में है, जहाँ भारतीयों को काला अंग्रेज बनाने और भारतीयता से दूर ले जाने के लिए कड़ी मेहनत की जाती है। अंग्रेजी के इन ठिकानों से मातृभाषा, राष्ट्रभाषा,देवनागरी लिपि वगैरह के फूल तो नहीं खिलने वाले। जो बो रहे हैं वही काट रहे हैं। भाषा और लिपि का चोली-दोमन का साथ है। शिक्षा जगत में इनके बीजारोपण से ही बात बनेगी और कोई उपाय नहीं। इस कार्य के लिए उत्सवधर्मिता के बजाए गांधी और विनोबा जैसी प्रतिबद्धता चाहिए।
हम से ज्यादा बड़े हिंदी-सेवी तो वे हैं जो प्रौद्योगिकी की रोटी खा कर हिंदी व भारतीय भाषा के लिए प्रौद्योगिकी विकास करते हुए इंटरनेट और सोशल मीडिया के युग में हिंदी की लिपि यानी नागरी लिपि को बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। हिंदी व अन्य भारतीय भाषाओं के शिक्षअ के लिए प्रौद्योगिकी विकसित कर रहे हैं। मशीनी अनुवाद पर कार्य कर रहे हैं। देश का काम हिंदी सहित देश की भाषाओं में हो सके,इसके लिए विभिन्न कार्यों हेतु बनाई गई प्रणालियों में आवश्यक व्यवस्थाएँ कर रहे हैं। ऐसे प्रौद्योगिकीविदों को नमन।
यदि लिपि रूपी नींव खिसकी तो जर्जर होती जा रही भाषा की इमारत ढहते भी देर न लगेगी। देवनागरी लिपि के सामने उत्पन्न चुनौतियाँ गंभीर भी हैं और जटिल भी। समय रहते अब भी अगर हम न जागे तो बचाने को कुछ न होगा। आने वाला इतिहास हमसे सवाल तो पूछेगा कि विश्व की श्रेष्ठतम भाषा और लिपि को बचाने के बजाए आक्रमक विदेशी भाषा की दासता को स्वीकारने वाले वे कौन-से भाषाई सिपाही थे,स्वार्थ सिद्धि या कायरता के चलते जिन्होंने अपनी भाषा-लिपि की दीवार को गिरने दिया,जिससे कारण इस देश की समृद्ध संस्कृति,साहित्य,ज्ञान-विज्ञान सब नष्ट हो गया।

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1 Comment

  1. Firstly I am very sorry as I am writing my opinion in English. My submission- only to oppose a language may not serve the purpose. There is need of solving the issues like indexing of hindi alphabets no database in the language no thesaurus no ocr advanced search engines etc. I worked a lot without support currently developing an online thesaurus of hindi words. Only sloganing lectures can’t improve it’s condition please do some concrete work and encouragement those who are doing something for it.

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