नारी जिद

संजय जैन 
मुम्बई(महाराष्ट्र)

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 आज एक ऐसा विषय लेकर आया हूँ,जिस पर हर इंसान एकदम से बौना हो जाता हैl उसे अच्छे-बुरे का ज्ञान होते हुए भी वह असहाय-सा दिखता हैl ये विषय है नारी की जिदl बड़े-बड़े विद्वान लोग भी इस विषय पर अपनी प्रतिक्रिया देने से कतराते हैं,क्योंकि उन्हें भी नहीं पता कि इस विषय के सन्दर्भ में क्या-कुछ हो सकता हैl
इसका सही उत्तर हमारे माँ-बाप और घर के बड़े-बूढ़े बड़ी ही सरलता से देकर इस समस्या को सुलझा देते हैंl तभी तो एकल परिवार की प्रथा हमारे हिंदुस्तान में कायम नहीं रहीl  समय के साथ लोग पढ़-लिखकर आधुनिकता की आंधी में तो बहते चले गए,परन्तु व्यवहारिक और सामाजिक ज्ञान को छोड़ते गए, क्योंकि ये सब बात हमारे वर्तमान पाठ्यक्रमों में नहीं हैl ये सब समस्याएं तो अनुभव और समाज में रहते हुए अनपढ़ लोग भी बहुत ही अच्छे तरीके से सुलझा लेते हैं,परन्तु आज की पीढ़ी ये सब नहीं सुलझा पाती,और वो पत्नी की हर जिद को बिना सोचे-समझे पूरी करते रहते हैंl क्या हम ऐसे लोगों को शिक्षित कहेंगे या उनको जिन्होंने बड़े-बड़े विश्वविद्यालयों से कोई भी उपाधियाँ नहीं ली…,परन्तु हर समस्या का समाधान उनके पास होता थाl  
इसे स्पष्ट करने के लिए एक परिवार की छोटी-सी घटना बताना चाह रहा हूँ-अनपढ़ माँ ने अपने बेटे को उसके बाप का साया सिर पर न होते हुए भी तमाम कष्टों को सहते हुए पढ़ाया-लिखाया और इस काबिल बनाया कि लोग उसे बहुत ही इज्जत और आदर की नजरों से देखने लगेl बेटे ने भी अपनी माँ को देखते हुए मेहनत-लगन से उच्च शिक्षा ग्रहण करके अपनी माँ को समाज और अपने गांव में सम्मान दिलाया,  परन्तु इस हँसते परिवार में तब उथल-पुथल मच गई,जब बेटे ने अपनी पसंद की उच्च शिक्षित लड़की से शादी का प्रस्ताव माँ के सामने रखाl माँ ने स्वीकृति दे दी और दोनों की शादी हो गईl बेटा अपनी माँ को बहुत पूजता था,और हर बात उनसे साझा करता था,कि आज आफिस में क्या-कुछ हुआ और माँ भी उसे सत्य-असत्य की परिभाषा समझा देती थी,ताकि वो कभी गलत दिशा में न भटकेl अब जब घर में एक नया सदस्य शामिल हुआ तो उसे भी इस मंत्रणा में माँ ने शामिल होने के लिए कहा, परन्तु उच्च शिक्षित बहु को ये सब पसंद नहीं आता था,और वो अपने मनोरंजन के दूसरे साधनों में अपने-आपको व्यस्त रखती थी,परन्तु माँ-बेटा अपनी आदत के अनुसार ही रोज चर्चा करते रहेl ये बात बहू को अब चुभने लगी,क्योंकि वो इसमें शामिल नहीं होती थीl एक दिन घर में खाना खाते समय पत्नी ने एक सवाल पति से किया कि,मानो कि-“एक नदी में और माँ डूब रहे हैं,तो तुम किसको पहले बचाओगे ?” पति ने इस प्रश्न को हँसी में टाल दिया,परन्तु नारी की जिद तो जिद होती है नl  इस प्रश्न का उत्तर न देने के कारण हँसते-खिल-खिलाते परिवार में कलह होने लगी,पर बेटा इस प्रश्न का उत्तर क्या दे ? माँ अनपढ़ होते हुए भी बहुत समझदार थी,जबकि उसे तैरना नहीं आता था,परन्तु घर की कलह को मिटने के लिए माँ ने ६० साल की उम्र में तैराकी सीखना शुरू किया और १५ दिन में सीख गईl बेटे को अब समझ में आ गया कि माँ ने ऐसा क्यों किया ?
इधर पत्नी अपनी जिद पर अड़ी हुई थी और बार-बार उत्तर देने को कहतीl आखिर एक दिन पति ने उत्तर दिया,जो सुनकर आप अचंभित रह जाओगेl बेटे ने कहा-“देखो प्रिये,जब इस तरह की परिस्थिति आएगी तो माँ तो तैरकर नदी से निकल जाएगी, और मुझे और तुम्हें तैरना नहीं आता है तो तुम्हारा हाल क्या होगा,ये तुम…समझ सकती होl ये सुनकर बहु की जो हालत हुई,उसके बाद उसने कभी भी अपने परिवार में कोई भी ऐसा काम नहीं किया और रोज की बातचीत में अपने को भी शामिल करके अपनी आधुनिकता वाली आदत को बदलकर एक सभ्य और अच्छी पत्नी तथा बहु का फर्ज अदा कियाl 
इसलिए,हमारे ऊपर बड़े-बूढ़ों का हाथ यदि रहेगा तो कभी भी परिवार टूट नहीं सकते हैं,न ही बिखर सकते हैंl वो कहते हैं न -“बंद मुट्ठी लाख की और यदि खुल गई तो खाक कीl” इसलिए, सभी माँ-बाप से अनुरोध है कि अपने बच्चों को शिक्षा के साथ संस्कार और व्यवाहरिक ज्ञान भी दें,ताकि वो अपने जीवन में कभी भी गलत दिशा में न भटकेंl 
परिचय-संजय जैन बीना (जिला सागर, मध्यप्रदेश) के रहने वाले हैं। वर्तमान में मुम्बई में कार्यरत हैं। आपकी जन्म तारीख १९ नवम्बर १९६५ और जन्मस्थल भी बीना ही है। करीब २५ साल से बम्बई में निजी संस्थान में व्यवसायिक प्रबंधक के पद पर कार्यरत हैं। आपकी शिक्षा वाणिज्य में स्नातकोत्तर के साथ ही निर्यात प्रबंधन की भी शैक्षणिक योग्यता है। संजय जैन को बचपन से ही लिखना-पढ़ने का बहुत शौक था,इसलिए लेखन में सक्रिय हैं। आपकी रचनाएं बहुत सारे अखबारों-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रहती हैं। अपनी लेखनी का कमाल कई मंचों पर भी दिखाने के करण कई सामाजिक संस्थाओं द्वारा इनको सम्मानित किया जा चुका है। मुम्बई के एक प्रसिद्ध अखबार में ब्लॉग भी लिखते हैं। लिखने के शौक के कारण आप सामाजिक गतिविधियों और संस्थाओं में भी हमेशा सक्रिय हैं। लिखने का उद्देश्य मन का शौक और हिंदी को प्रचारित करना है।

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