नारी सशक्तिकरण जरुरी

रूपेश कुमार
सिवान(बिहार) 
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आज हमारा समाज जिस दौर से गुजर रहा है,उसमें भारतीय नारी का महत्वपूर्ण योगदान हैl कभी वह समय था जब नारी का क्षेत्र शिक्षिका या नर्स बन जाने तक सीमित था,किन्तु अब वह हर क्षेत्र में सक्रिय हैl वह अपने घर-परिवार के साथ-साथ समाज एवं राष्ट्र के प्रति भी अपने दायित्व को निभाने में पूर्णतया सजग हैl इतना सब होने पर भी चिंता का विषय यह है कि,देश का तथाकथित प्रगतिशील पुरूष वर्ग नारी के प्रति अपने परम्परागत दृष्टिकोण को बदल नहीं पाया हैl वह आज भी उसे भोग्या ही समझता हैl उसकी कोमलता से अनुचित लाभ उठाने का प्रयास करता हैl आज आवश्यकता इस बात की है कि,पुरूष वर्ग नारी को मुक्तभाव से निर्भय होकर कार्य करने का अवसर प्रदान करेl पुरूष को सदैव से शक्तिशाली माना जाता रहा है और स्त्री को अबला नारीl आज के युग में नारी को कोई सम्मान नहीं मिलता हैl महिला उत्पीड़न का मूल कारण उसकी शारीरिक स्थिति और सामाजिक मापदंड हैl पति द्वारा पत्नी की पिटाई,युवतियों का बलात्कार,दहेज के लिए की गई बहू की हत्या और बाल विवाह आदि इसके कुछ ज्वलंत उदाहरण हैंl घरेलू कार्यों का अधिकतर बोझ उन्हीं के कंधों पर रहता हैl लड़कियों की शिक्षा पर कम ध्यान दिया जाता थाl
कई महिलाओं को उनके पुरूष सहकर्मी भी कम परेशान नहीं करते हैंl प्राकृतिक तथ्य है कि,नारी कोमलकांता होने के साथ- साथ अपने स्वभाव में अधिक कर्मठ एवं सहनशील होती हैl धैर्य भावना भी उसमें अधिक होती है,इसलिए राष्ट्र निर्माण के कार्यों में वह पुरूषों की अपेक्षा अधिक सहायक सिद्ध होने में समर्थ हैl आज आवश्यकता इस बात की है कि,नारी शिक्षा का अधिकाधिक विकास कर उसकी क्षमता को विकसित किया जाए,ताकि राष्ट्र निर्माण के कार्य में वह पुरूषों से ज्यादा सिद्ध हो सकेl
स्त्रियों पर लग रहे अंकुश से समाज में २०१२ में दिल्ली में हुए `दामिनी` सामूहिक दुष्कर्म से महिलाओं की स्वतंत्रता पर सवाल उठ रहे हैंl इसके विरोध में पुरूषों एवं महिलाओं द्वारा कठोर कानून बनाने के लिए धरना एवं प्रदर्शन किया गया थाl इस तरह का मामला अब न हो,इसके लिए हमें अपनी सोच बदलनी होगीl

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