नैन्सी

सीमा व्यास 
इंदौर(मध्यप्रदेश)

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एक प्रकाशक होने के नाते पत्र व्यवहार मेरी दैनिक दिनचर्या का अभिन्न अंग है। रोज की डाक स्वयं खोलना और पढ़ना मेरा प्रिय शगल भी है। कार्यालय आते ही मैं सबसे पहले डाक मंगवाता हूं और अपने पसंदीदा काम में व्यस्त हो जाता हूं। डाक में अधिकांश पत्र पुस्तक विक्रेताओं के होते हैं,जो पुस्तकें मंगवाने के संदर्भ में रहते हैं। कुछ पत्र लेखकों के होते हैं और कुछेक पुस्तकों की प्रशंसा के। अब तो मुझे सभी प्रकार के पत्रों की भाषा भी लगभग एक-सी लगने लगी है। आरंभ की दो पंक्ति पढ़कर ही अनुमान लगा लेता हूं कि पत्र का मजमून क्या होगा। फिर दो या तीन महत्वपूर्ण पत्रों के उत्तर मैं स्वयं लिखता हूं और शेष अपने पुत्र आशीष को यथासमय अनुपालन करने के लिए इंगित कर देता हूं।
इसके विपरीत किसी से फोन पर बात करने में और चाही गई जानकारी देने में मुझे बहुत कोफ्त होती है। मेरा ऐसा मानना है कि,फोन पर संवाद की संप्रेषणीयता प्रभावित होती है। न फोन करनेवाले के मन का पता होता है, न फोन सुननेवाले के इरादे का..,तो प्रायः फोन सुनने का जिम्मा आशीष का ही है। उसे भी बहुत जरूरी होने पर ही मुझे फोन पर बुलाने की हिदायत दे रखी है मैंने। सच कहूं,तो मुझे फोन की ‘ट्रिन-ट्रिन’ घंटी सुनकर ही बहुत झुंझलाहट होती है सो,उससे बचने का प्रयास करता हूं।
उस दिन भी मैं रोजमर्रा की तरह कार्यालय आकर अपने पसंदीदा कार्य में मशगूल था। तभी डाक में आए एक पत्र की लिखावट ने सहसा मेरा ध्यान खींचा। पीले लिफाफे पर नीली स्याही से बड़े ही सुंदर अक्षरों में मेरे नाम सहित पता लिखा था। संस्थान के नाम और पते वाले पत्रों से ज्यादा मुझे वे पत्र भाते हैं जिनमें मेरा नाम भी लिखा होता है। क्या रखा है नाम में ? नाम तो अमूमन माता-पिता रखते हैं। बच्चे की पसंद का नहीं,अपनी पसंद का। फिर व्यक्ति को अपने नाम से इतना मोह क्यों हो जाता है ? कई बार सोचता हूं कि यह मोह नाम से ज्यादा होता है या उस नाम से मिली ख्याति से ? उत्तर हर बार ही नदारद रहता है। उस नाम की ख्याति की खातिर व्यक्ति कितने ही कष्ट सहता है,नाम डूबने या नाम खराब होने की चिन्ता भी उसे सताती रहती है। गोया कि नाम एक शब्द ही नहीं,पहचान भी है।
खैर,मैं अपने नाम को सुंदर अक्षरों में लिखा देख अभिभूत था। इस बार मैंने ध्यान से अपने संस्थान का पता भी देखा। मन ही मन पत्र लेखक के बारे में कयास लगाते हुए मैंने आहिस्ता से लिफाफा फाड़ा। पत्र नैन्सी नाम की महिला का था। लिफाफे पर प्रेषक के स्थान पर केरल के किसी गांव का नाम लिखा था। भीतर भी सुंदर लिखावट यथावत थी और मुझे सादर संबोधन भी दिया गया था।
मैंने पूरे पत्र को गौर से पढ़ा। नैन्सी नर्सिंग की छात्रा रही थी जिसने हमारे संस्थान से प्रकाशित पुस्तकों से अपनी पढ़ाई की थी। पत्र में उसने पाठ्यक्रम की पुस्तकों की प्रशंसा के बाद उनमें कुछ संशोधन करने की इच्छा जाहिर की थी। और आश्चर्य की बात यह कि,उसने स्वयं संशोधित पुस्तक लिखने में रूचि दिखाई थी। एक छात्रा का पुस्तक में कमी निकालना तो मैं स्वीकार कर सकता था, परंतु संशोधन के योग्य स्वयं को मानना, मुझे सही नहीं लगा। पत्र को पढ़ने के बाद मैंने उसे आशीष को दिखाया। उसने मेरी तरह प्रतिक्रिया न देते हुए उस छात्रा की पहल की तारीफ की। फिर पूछा,-‘तो क्या उत्तर देना है इसे ?‘
मैंने अगले पत्र के बारे में कुछ कार्य बताते हुए कहा,_‘हर पत्र का उत्तर देना जरूरी नहीं होता। इसे तुम फाइल में रखवा दो’।
इस घटना के कुछ माह पश्चात नैन्सी का एक पत्र और आया। उसी सुंदर लिखावट में,पत्र में उसने पूर्वानुसार ही पुस्तक में संशोधन का अनुरोध किया था। इस बार आशीष ने साहस कर मुझसे नैन्सी को एक मौका देने का कहा। उसकी बात से मैं इस शर्त पर सहमत हुआ कि नैन्सी से पत्र व्यवहार तुम ही करोगे। दरअसल मैं नहीं चाहता था कि कोई मेरी शर्तों पर न कहे। आशीष के उत्साहपूर्वक सहमति देने पर मुझे थोड़ा आश्चर्य हुआ। पत्र उसके हाथ में देते हुए मैंने पूछ ही लिया,- ‘तुम नैन्सी को जानते हो क्या’ ?
हल्की-सी मुस्कुराहट के साथ वह बोला, -‘उतना ही,जितना आप जानते हैं’।
‘फिर तुम उसकी पैरवी क्यों कर रहे हो ? मेरे कहने का मतलब है,तुम उस छात्रा को पुस्तक लिखने जैसी बड़ी जिम्मेदारी कैसे दे सकते हो’ ?
‘पापा,वह छात्रा नहीं है,पढ़ाई पूरी हो चुकी है उसकी। अब वह एक अस्पताल में नर्स है,लिखा है उसने। नए लेखक को एक बार मौका देने में क्या हर्ज है ? और हम उसकी पुस्तक प्रकाशित कहां कर रहे हैं ? अभी तो सिर्फ पटकथा भेजने के लिए लिखेंगे। पसंद न आई तो हम उसे वापस कर देंगे’ ।
आशीष ने पहली बार मुझसे किसी बात पर तर्क किया था। मैंने बिना कुछ कहे इशारों में सहमति दे दी। फिर नैन्सी को मेरे बेटे ने क्या और कब प्रत्युत्तर दिया मुझे नहीं पता। हां,करीब दो माह बाद कोरियर से एक बड़ा पैकेट आया। उस पर सुंदर अक्षरों में अपना नाम देख मुझे पहचानने में देर नहीं लगी कि,यह नैन्सी द्वारा भेजी गई पटकथा ही है।
नैन्सी की पटकथा को मैंने आद्योपांत पढ़ा। बहुत प्रभावित हुआ मैं। उसने न सिर्फ नए विषयों पर बेहद स्तरीय भाषा में लिखा था,वरन अपने अनुभवों को उसमें शामिल कर जानकारी को रोचक बना दिया था। चाहकर भी मैं उस पटकथा में तत्काल कोई कमी नहीं निकाल पाया। मैंने आशीष को बुलाकर पटकथा पढ़ने और उस पर अपनी प्रतिक्रिया देने का कहा। आमतौर पर इस तरह के काम में उसे हफ्ते दो हफ्ते लग जाते हैं पर इसको उसने महज दो दिन में पढ़कर मेरे सामने रख दिया। कहना न होगा कि उसने नैन्सी की तारीफ करने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी। मैं बहुत जल्दी उससे सहमत नहीं हुआ। मैंने उस पटकथा में दो-तीन अध्याय और शामिल करने की सलाह दे डाली। साथ ही चित्रों के लिए निर्देशित न करने पर थोड़ा नाराज भी हुआ। फिर कहा,-उसे यह पटकथा वापस भेज दो ताकि वह चित्रों के लिए निर्देशित कर दे और साथ ही नए अध्याय भी लिख दे।
आशीष ने उसी रात नैन्सी को पत्र लिखकर मेरी प्रतिक्रिया से उसे अवगत करा दिया और जल्द ही शेष अध्याय लिखकर भेजने का अनुरोध करते हुए पटकथा भेज दी। वह तो अन्य कार्यों में व्यस्त हो गया पर अगले हफ्ते से मैं नैन्सी की लिखावट वाले लिफाफे का रोज इंतजार करने लगा। दस-पंद्रह दिन बाद भी कोई लिफाफा न आने पर मैंने बैचेनी से बेटे को कहा,-‘इतना समय क्यों लग रहा है नैन्सी को दो-तीन अध्याय भेजने में। ज्यादा तो लिखना नहीं था उसे। कोई फोन नम्बर दिया था उसने पत्र में’ ?
आशीष ने मेरी अकुलाहट को भांपकर भी सामान्य रहने की चेष्टा करते हुए कहा,-‘जी, कोई फोन नम्बर तो नहीं दिया था उसने। वैसे इतना अधिक समय भी नहीं हुआ है। कुछ दिन और इंतजार कर लेते हैं,फिर एक पत्र लिखकर पता कर लेंगे’।
मैंने लापरवाही से कहा,-‘हां,वैसे भी हमें कौन-सी जल्दी है। मौजूद संस्करण तो है ही हमारे पास’। मैं आशीष के चेहरे की प्रतिक्रिया देख पाता इससे पहले ही वह चला गया।
करीब एक हफ्ते बाद नैन्सी द्वारा भेजा बड़ा-सा लिफाफा मेरे हाथ में था। घोर आश्चर्य की बात थी कि नैन्सी ने अपनी पटकथा में मेरे सुझावों के अनुसार परिवर्तन करने के स्थान पर पूरी पटकथा को दोबारा लिखा था। चित्रों को इंगित किया था और नए अध्याय भी शामिल कर दिए थे। सारे पृष्ठों पर वैसी ही सुंदर लिखावट देख मैं उसकी मेहनत का कायल हो गया। साथ में एक धन्यवाद का पत्र भी था मेरे नाम से। मैंने तुरंत आशीष को बुलाकर उसे पटकथा को कम्पोज करवाने का आदेश दिया।
मैंने गौर किया,आशीष अन्य पुस्तकों से ज्यादा नैन्सी की पुस्तक के प्रकाशन में रूचि ले रहा था,पर अब मुझे उससे कोई शिकायत नहीं थी। पुस्तक प्रकाशित होकर आई तो सच में मुख्य पृष्ठ,आकार और मुद्रण हर दृष्टि से आकर्षक लग रही थी। मुझे किसी आवश्यक कार्य से शहर से बाहर जाना पड़ा। आशीष ने स्वप्रेरणा से प्रकाशित पुस्तक की दो-दो प्रतियां देशभर में फैले हमारे नियमित पुस्तक विक्रेताओं और नर्सिंग विद्यालयों तक पहुंचा दी। परिणाम यह हुआ कि मेरे आने के बाद तो नैन्सी की पुस्तक के आदेशों का अम्बार लग गया। हमारे संस्थान के इतिहास में पहली बार किसी पुस्तक के आदेश इतनी ज्यादा मात्रा में आए थे। मैंने सगर्व अपने बेटे को बताया और कहा,-‘हमें विक्रेताओं को किताबेंं भिजवाने से पहले नैन्सी को लेखकीय प्रतियां और मानदेय भिजवाना चाहिए’। ‘जी पापा, बिलकुल। मैं भी यही कहने वाला था आपसे’। आशीष का उत्साह अब भी बरकरार था। ‘कितना मानदेय भेजें’ ? उसने तुरंत एक प्रश्न मेरी ओर किया। उसे पूरी अपेक्षा थी कि,मैं नैन्सी को विशेष लेखक मानते हुए कुछ ज्यादा राषि का आदेश दूंगा। मैंने सहजता से कहा,-‘उतना ही,जितना सब लेखकों को दिया जाता है’।
नर्सिंग के कई विद्यालयों ने उस पुस्तक को अपने पाठ्यक्रम में शामिल किया। अगले साल तो आदेश इतने बढ़ गए कि हमें उस पुस्तक का दूसरा संस्करण निकालना पड़ा। हर साल मार्च माह में हमारे संस्थान द्वारा सभी लेखकों को रॉयल्टी भिजवाई जाती है। रॉयल्टी के चेक दस्तखत करते समय देखा कि, नैन्सी को रॉयल्टी के नाम पर एक बड़ी राशि हमारे संस्थान द्वारा भिजवाई जा रही थी। मैंने आशीष से कहा,-‘इतना बड़ा चेक तो नैन्सी को जिंदगी में पहली बार मिल रहा होगा। चेक देखकर उसके पैर जमीं पर नहीं पड़ेंगे। हवा में उड़ने लगेगी वो। पता नहीं,इस राशि से वो कौन-कौन से सपने साकार कर लेगी’।
प्रत्युत्तर में उसने कहा,-‘हां पापा,बहुत खुश हो जाएगी वो चेक देखकर’।
इस घटना को करीब पांच साल बीत गए। हर साल हम नियमित रूप से नैन्सी को रॉयल्टी का चेक भेजते रहे। हर साल उसकी पुस्तक को अच्छा प्रतिसाद मिल रहा था। निश्चित ही इससे हमारे संस्थान की साख बढ़ी।
इस साल मार्च-अप्रैल के बाद काम से थोड़ी राहत मिलते ही मैंने सपरिवार कहीं घूमने जाने का कार्यक्रम बनाया। सबसे सलाह के बाद तय हुआ कि हम केरल जाएंगे। केरल के प्रमुख स्थानों को चिन्हित कर हम अपना वाहन लेकर रवाना हुए। केरल के प्राकृतिक सौंदर्य का आनंद लेते हुए जा रहे थे कि,रास्ते पर लगे एक बोर्ड को देखकर आशीष ने चालक को गाड़ी रोकने का कहा। मैंने कारण पूछा तो उसने बहुत उत्साह से कहा,-‘पापा, देखिए बोर्ड पर। यह तो नैन्सी के गांव का नाम है’।
मैंने अपनी याददाश्त पर जोर डाला। मुझे उसका पता जरा भी याद नहीं आ रहा था। मैंने कहा,-‘तुम्हें ठीक से याद तो है ? यही नाम लिखते हो उसके पते पर’ ?
वह तुरंत बोला,-‘हां हां पापा,अच्छी तरह से याद है मुझे। कई बार लिखा है मैंने उसके पते पर इस गांव का नाम’।
बेटे ने एक बार नैन्सी से मिलने की इच्छा जाहिर की तो सबने सहमति दे दी। मिलना तो मैं भी चाहता था उससे। गाड़ी गांव के भीतर दाखिल हो रही थी। मैंने आशीष से कहा,-‘नैन्सी ने तो अच्छा खासा बंगला बना लिया होगा रॉयल्टी के पैसों से। हो सकता है गाड़ी भी खरीद ली हो। नहीं क्या’ ?
मेरी बात का जवाब दिए बिना आषीष गांव के छोटे-छोटे मकानों में नैन्सी की नाम पट्टिका तलाश रहा था। गाड़ी बहुत धीरे-धीरे चल रही थी। उसने गाड़ी रोककर एक बच्चे से पूछा,-‘नैन्सी के घर जाना है। जानते हो उसे ? कहां रहती है वो’ ?
बच्चे के चेहरे से लगा वह हमारी भाषा नहीं समझ पा रहा है। फिर शायद नाम से कुछ कयास लगाकर उसने मुंह में अंगुली लेते हुए पूछा,-‘नर्स’ ?
हमारे एकसाथ हां-हां कहते ही कुछ क्षण रूककर उसने सामने टेकरी पर बने अस्पताल की ओर इशारा किया। हमारी गाड़ी रूकते ही एक लड़के ने आकर हमसे बात की। नैन्सी से मिलने की इच्छा जाहिर करते ही वह हमें अस्पताल के पास बने एक कमरे की ओर ले गया। भीतर बैठी युवती को देखते ही मैं पहचान गया। यह सौम्य,सांवली-सी मुस्कुराती युवती नैन्सी ही होगी। हमने अपना परिचय दिया तो उसकी खुशी का पारावार न रहा। हमारे स्वागत के लिए वह खड़ी हुई तो हम सभी स्तब्ध रह गए। नैन्सी के एक पैर में पोलियो था। सच में हवा में लहरा रहा था उसका पैर। मुझे अपने शब्द याद आ रहे थे…चेक पाकर उसके पैर जमीं पर नहीं टिक रहे होंगे… आज मुझे लग रहा था मेरे शब्द हवा में तैर रहे हैं,मैंने उस दिन बिना किसी आधार के जो कह दिए थे। जब वह बैसाखी के सहारे खड़ी होकर,दोनों हाथ जोड़कर पुस्तक प्रकाशित करने के लिए हमारा धन्यवाद अदा कर रही थी तो उसकी आंखों से आंसू गिर रहे थे। हमें देखकर उसे लग रहा था मानो साक्षात भगवान उसके द्वार आ गए हों। मन ही मन आत्मग्लानि से भर उठा मैं।
कुछ देर में माहौल सहज हुआ तो उसने हमारे चाय-नाश्ते का इंतजाम किया। फिर भावुक होकर बताने लगी,-‘सर,नर्स की पढ़ाई के दौरान ही मैंने तय कर लिया था,गरीबों की सेवा करूंगी। इलाज के अभाव में किसी गरीब को मरने नहीं दूंगी। अपने गांव के लोगों को समय पर इलाज मिले,ये सपना था मेरा,पर बिना पैसों के सपने कहां पूरे होते हैं ? और फिर मेरी ये कमजोरी। हार जाती मैं तो। आपके एहसानों के कारण ही मैं अपना सपना साकार कर सकी। आपके भेजे पैसों से ही ये छोटा-सा अस्पताल बनाया। यहां मरीजों को प्राथमिक उपचार दिया जाता है,ताकि रोग गंभीर न हो। हफ्ते में दो बार चिकित्सक भी आते हैं। गंभीर मरीजों को अस्पताल तक पहुंचाने में गांव के ही लोग मेरी मदद करते हैं और ये जो छोटे-छोटे बच्चे देख रहे हैं न आप, बचे पैसों से इनके लिए कुछ पौष्टिक आहार लाती हूं। नादान बच्चे गरीबी सहन कर सकते हैं पर पेट की भूख नहीं सह पाते। ये पेटभर खाते हैं तो मुझे मनभर खुशी होती है। सब कुछ आपका ही दिया है सर’। दोनों हाथ जोड़े वह कृतज्ञ हुए जा रही थी।
हम सभी स्तब्ध से नैन्सी की बातें सुन रहे थे। आज उम्र में छोटी नैन्सी मुझसे कहीं अधिक बड़ी लग रही थी। पहली बार मुझे अपनी हीन सोच पर ग्लानि हो रही थी। नैन्सी के कार्यों की सराहना कर,उसे ढेर सारी शुभकामनाएं देते हुए हमने विदा ली। वापसी के समय हम सभी मौन थे। क्यों ? इसका उत्तर तो सबके मन में था जो आंखों से झलक भी रहा था।
आगे की सीट से पीछे मुड़ते हुए मैंने बेटे की आंखों में देखते हुए कहा,-‘मुझे आज तुम्हारे निर्णय पर गर्व हो रहा है। सच बहुत गर्व हो रहा है नैन्सी पर और तुम पर भी। कुछ निर्णयों में छोटों की राय भी सकारात्मक परिणाम दे सकती है। आज मुझे उन बच्चों के चेहरों पर रॉयल्टी के सिक्कों की खनकती हंसी दिखाई दी। पहली बार लगा हमारे संस्थान को अपने लेखक पर, उसकी कृति पर और उसके कर्मों पर गर्व हो रहा है’।
लौटते समय हम सभी के मन में केरल के अप्रतिम प्राकृतिक सौंदर्य के साथ और भी यादें थी ता-उम्र जेहन में समेटे रखने के लिए।

परिचय-सीमा व्यास की शिक्षा स्नातकोत्तर (हिन्दी, समाजशास्त्र )है। आपको सभी स्तरों के प्रशिक्षण मेन्युअल का निर्माण व विभिन्न विभागों व संस्थाओं में प्रशिक्षक के रूप में कार्य का २४ वर्ष का अनुभव है। पुस्तक प्रकाशन में कहानी संग्रह-‘क्षितिज की ओर’ आपके नाम है तो राष्ट्रीय स्तर के पत्र-पत्रिकाओं में ३०० आलेख व कहानियों का प्रकाशन हो चुका है। ४२ पुस्तिकाओं का प्रकाशन,आकाशवाणी द्वारा रूपक,कहानियों व १२ नाटकों का प्रसारण,तीन पटकथाओं पर लघु फिल्मों का निर्माण,किशोर-किशोरियों हेतु विशेष लेखन व उस पर फिल्म निर्माण,सिंहस्थ पर जानकारी हेतु फिल्म का पटकथा लेखन,दूरदर्शन हेतु नुक्कड़ नाटक की पटकथा लेखन सहित एक धारावाहिक में ५२ कड़ियों में सहलेखक के रूप में कार्य भी आपके अनुभव-उपलब्धि में शामिल है। सीमा जी को पुरस्कार में उत्तर प्रदेश से २ कहानियाँ पुरस्कृत होना है। सम्प्रति से आप इंदौर में कार्यक्रम अधिकारी हैं। मध्यप्रदेश के इंदौर स्थित योजना क्र. १४० में आपका निवास है।

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