`नौकरी’ नहीं,’स्वरोजगार’ अपनाएं..

शुभम कुमार जायसवाल
पटना(बिहार)
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आज देश की कुछ प्रमुख समस्याओं में ‘बेरोजगारी’ भी एक है। हर वर्ष करोड़ों छात्र-छात्राएं प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में जुटते हैं,लेकिन उसमें से कुछ को ही नौकरी मिल पाती है। बिहार जैसे राज्य से हर वर्ष लाखों मजदूर रोजगार के लिए दूसरे राज्यों में पलायन करते हैं,न सिर्फ बिहार बल्कि पूरे देश में बेरोजगारी अपने चरम पर है।
सबसे पहले हमें समझना होगा कि,आखिर ये बेरोजगारी क्यों है? क्या सरकार द्वारा कम नौकरी निकाली जाना इसका कारण है,क्या वर्तमान शिक्षा व्यवस्था इसका कारण है ? ऐसे ढेरों सवाल हैं जिसे गहराई से जानना बेहद जरूरी है।
बेरोजगारी का सबसे बड़ा कारण है ‘यहाँ की शिक्षा व्यवस्था’। आज देश में ज्यादातर लोग रोजगार का अर्थ नौकरी समझते हैं। छात्र नौकरी पाने के लिए जी-तोड़ मेहनत करते हैं। सरकारी नौकरी के एक-एक पद पर हजारों दावेदार रहते हैं। चपरासी जैसी नौकरी के लिए बीए,एमए और बीटेक जैसी उच्च उपाधिधारक लोग आवेदन करते हैं। हाल ही में रेलवे के लगभग १ लाख खाली पदों के लिए २.५ करोड़ से अधिक लोगों ने आवेदन किया है। स्थिति ये है कि,सरकार खाली पदों से दुगुनी नौकरी निकाले,तब भी हर किसी को नौकरी मिलना संभव नहीं है। कुछ दिन पहले एप्पल संस्थान के सह-संस्थापक वॉरेन वोजनियाक ने भारतीय शिक्षा व्यवस्था पर टिप्पणी करते हुए कहा कि-`भारतीयों की तरक्की का अर्थ ही अलग है। अच्छी पढ़ाई करो,फिर नौकरी लो,शादी करो और ज्यादा से ज्यादा एक मर्सडीज गाड़ी खरीद लो,बस यही उनकी तरक्की का पैमाना है।` इसके साथ ही उन्होंने ये भी कहा कि-`इंडिया में इनोवेशन हो ही नहीं सकता।` कई लोगों ने उनके इस बयान पर विरोध जताया लेकिन हमें ये सोचने की जरूरत है आखिर उन्होंने ऐसा क्यों कहा। हर नई खोज हजारों-लाखों नौकरी को जन्म देती है, लेकिन नौकरी की मानसिकता के कारण हमारे देश की प्रतिभाएं नए अविष्कार या प्रयोग के बजाय नौकरी में बर्बाद हो रही है,जिससे बेरोजगारी बढ़ती जा रही है।
इस बेरोजगारी को खत्म करने का का सबसे बड़ा और कारगर उपाय है `स्वरोजगार`। लोगों को ये समझना होगा कि शिक्षा जरूरी है,लेकिन शिक्षा का एकमात्र उद्देश्य नौकरी हो,ये ही जरूरी नहीं। सबसे पहले देश की वर्तमान शिक्षा प्रणाली में थोड़ा परिवर्तन करना होगा। सरकार को सामान्य शिक्षा के साथ-साथ रोजगारपरक शिक्षा व तकनीकी शिक्षा को और भी बढ़ावा देना होगा,जिससे नौकरी न मिल पाने की स्थिति में लोग बेरोजगार रहने के बजाय खुद कुछ काम कर सकें। युवाओं में स्वाबलंबन की भावना को जागृत करना होगा।
कुछ महीनों पहले देश में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के बयान पर ‘पकौड़ा’ राजनीति हो रही थी और आजकल कुछ दिनों से त्रिपुरा के मुख्यमंत्री बिप्लब देब के बयान पर ‘पान दुकान’ की राजनीति हो रही है। निष्पक्ष रूप से देखा जाए तो दोनों ही बयानों के पीछे एक ही अर्थ छुपा है,वो है ‘स्वरोजगार’। बेरोजगार रहने से अच्छा है पकौड़ा या पान बेचना और इसमें कुछ भी गलत नहीं है। आज बहुत-सी ऐसे कारखाने या संस्थान हैं जो भुजिया,चिप्स,कैंडी जैसी चीजों को बेचकर करोड़ों-अरबों रूपए कमा रहे हैं।
वर्तमान सरकार स्वरोजगार व नए उद्योगों के लिए स्टार्ट-अप योजना,मुद्रा योजना जैसी बहुत-सी योजनाएं लाई है,जिससे आम जनता सीधे लाभान्वित हो सकती है। हाँ, मानता हूँ इसमें थोड़ी कठनाईयाँ हैं,लेकिन इसे दूर करने के लिए सरकार प्रयासरत है।
अंत में बस यही कहना चाहूंगा कि,देश के युवा नौकरी लेने के बजाय नौकरी देने के बारे में सोचें,यही सोच बेरोजगारी को खत्म कर सकती है।

परिचय-५ जुलाई २००० को अजमाबाद (भागलपुर,बिहार) में जन्मे शुभम कुमार जायसवाल राजनीति शास्त्र से स्नातक (प्रथम वर्ष)में अध्ययनरत हैं। आपका साहित्यिक उपनाम शुभम ‘श्रेष्ठ’ हैl वर्तमान निवास पटना(बिहार)स्थित बाजार समिति में,जबकि स्थाई बसेरा ग्राम-अजमाबाद जिला भागलपुर हैl आप छोटी कक्षा से ही छोटी-छोटी कविताएं लिखते रहे हैं। विभिन्न समाचार पत्रों में कई कविताएँ प्रकाशित और दसवीं की परीक्षा में उत्कृष्ट प्रदर्शन के लिए दो दैनिक पत्रों द्वारा आपको सम्मानित किया गया है। शुभम कुमार को सामाजिक क्षेत्र में कार्य के लिए पटना में विधायक द्वारा भी सम्मानित किया गया है। शुभम ‘श्रेष्ठ’ को सामाजिक कार्यों के लिए सम्मानित करने के साथ हाल ही में निजी रेडियो द्वारा उच्च-५ लेख में इनके लेख का चयन किया गया है। सामाजिक गतिविधि के लिए खुद ने सामाजिक संस्था की स्थापना की है,जिसके जरिए गरीबों को यथा संभव कम्बल वितरण,पाठ्य सामग्री वितरण और सफाई आदि काम करते हैं। इनकी लेखन विधा कविता,कहानी व लेख हैl इनकी रचनाएं कुछ अंतरजाल पर भी पृष्ठ पर भी हुई हैंl इनके प्रेरणापुंज शिक्षक हैंl श्री जायसवाल के लेखन का उद्देश्य-समाज का विकास,सबको जागरुक करना एवं मानसिक संतुष्टि है।

 

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