न छेड़ो बेटी की गृहस्थी

वीना सक्सेना
इंदौर(मध्यप्रदेश)
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परिवर्तन हर वस्तु का मूल अधिकार है,हर वस्तु परिवर्तित होती हैl नन्हीं-सी कली खिल का फूल बन जाती है,छोटी-सी इल्ली खूबसूरत तितली बन जाती है। उसी प्रकार छोटी-सी प्यारी-सी तितली आपकी प्यारी बिटिया जो आपके घर-आँगन में उड़ती फिरती थी,वह किसी के घर की बहू बन जाती है,जो उस घर की शोभा होती है मान मर्यादा होती है।
याद आता है वह समय,जब मायके वाले अपनी लाड़ली को विदा करते समय से सीख दिया करते थे कि,बिटिया अब वही तुम्हारा घर हैl वहां की मान-मर्यादा का ध्यान रखना,कोई ऐसा कदम मत उठाना,जिससे हमारा नाम बदनाम होl बड़ों की इज्जत करना,छोटों को प्यार देना और बराबरी वालों से अपनापन बनाए रखना,परंतु समय परिवर्तनशील हैl हर वस्तु का स्वरूप बदल गया है तो रिश्तों में भी बदलाव आया हैl आजकल तो लड़कियां स्वतंत्र रूप से जीना चाहती हैंl ससुराल में कदम रखने के पूर्व ही अलग होने की जुगाड़ बिठाने लगती हैं,छोटी-छोटी बातों पर झगड़ना-रूठना,रूठकर मायके आ बैठना तो एक आम बात हो गई हैl उस पर करेला और नीम चढ़ा कहावत तो तब सच होती है,जब मायके वाले अपनी बिटिया को अच्छी सीख देकर समझाने के बजाए उल्टा उसे गुमराह करते हैं। वह नहीं समझते कि उनकी बच्ची अभी अपरिपक्व मस्तिष्क की है ,छोटी है,नादानी कर सकती है,परंतु वे स्वयं तो समझदार हैं ,परिपक्व हैंl उन्होंने तो दुनिया देखी है,बेटी को समझाएं सही राह दिखाएं।
आज के समय के अभिभावक दो तरफा रुख अपनाए हुए हैंl बेटे के लिए बहू ऐसी चाहेंगे,जो संयुक्त परिवार को निभा लेl खूब कामकाजी हो,मेहमानों को देखकर खुश होती हो परंतु बिटिया एकल परिवार में देंगे,जहां काम का बोझ कम होl बेटी स्वतंत्र रूप से जी सके,मनमानी कर सके।
आज के समय में परिवार सीमित हो गए हैंl घर-गृहस्थी के कार्य सरल हो गए हैं। इसलिए,माँ का सारा ध्यान अपने बच्चों में लगा रहता हैl अक्सर तो यह भी देखने में आता है कि,माताएं अपनी गृहस्थी से ज्यादा अपनी पुत्री की गृहस्थी में दिलचस्पी लेती हैं,बगैर यह सोचे कि उनकी इस हरकत से उनके दामाद या बेटी के ससुराल पर इसका क्या असर हो रहा होगाl वह यह भी भूल जाते हैं कि जो उनकी लाड़ली थी,अब वह किसी की भाभी- चाची-मामी बन गई है,और उसके ऊपर इन दायित्व को निभाने की जिम्मेदारी हैl मायके वालों को चाहिए कि अपनी लड़की को इन जिम्मेदारियों को निभाने में मदद करें,ना कि बीच में अड़ंगा लगाएंl छोटी-छोटी-सी बात पर लड़की को मायके बुलाना या फिर बार-बार उसकी ससुराल जा धमकना और अपनी संपन्नता का दिखावा करना यह व्यवहार उचित नहीं है। कभी-कभी उनके इस व्यवहार से उनकी अपनी लाड़ली को भी दुखी होना पड़ता है।
एक बेटी को अच्छे संस्कार उसके मायके रूपी कक्षा में मिलते हैं,जिसका व्यवहारीकरण-प्रायोगिक वह ससुराल में करके अपना व अपने मायके का नाम रोशन करती है। ससुराल उसका अपना घर होता है,अगर वह थोड़ी सूझ-बूझ,थोड़ी सहनशीलता का परिचय देगी तो दोनों घरों का नाम रोशन करेगी और स्वयं भी सुखी रहेगी। ससुराल की बात मायके में,और मायके की बड़ाई ससुराल में नहीं करना चाहिए। पुत्र घर का दीपक है, जिससे एक घर आलोकित होता है,जबकि पुत्री तो वह दीपक है ,जो अपने व्यवहार से दो घरों को आलोकित करती है।

परिचय : श्रीमती वीना सक्सेना की पहचान इंदौर से मध्यप्रदेश तक में लेखिका और समाजसेविका की है।जन्मतिथि-२३ अक्टूबर एवं जन्म स्थान-सिकंदराराऊ (उत्तरप्रदेश)है। वर्तमान में इंदौर में ही रहती हैं। आप प्रदेश के अलावा अन्य प्रान्तों में भी २० से अधिक वर्ष से समाजसेवा में सक्रिय हैं। मन के भावों को कलम से अभिव्यक्ति देने में माहिर श्रीमती सक्सेना को कैदी महिलाओं औऱ फुटपाथी बच्चों को संस्कार शिक्षा देने के लिए राष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है। आपने कई पत्रिकाओं का सम्पादन भी किया है।आपकी रचनाएं अनेक पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुक़ी हैं। आप अच्छी साहित्यकार के साथ ही विश्वविद्यालय स्तर पर टेनिस टूर्नामेंट में चैम्पियन भी रही हैं। `कायस्थ गौरव` और `कायस्थ प्रतिभा` सम्मान से विशेष रूप से अंलकृत श्रीमती सक्सेना के कार्यक्रम आकाशवाणी एवं दूरदर्शन पर भी प्रसारित हुए हैं। कई पत्र-पत्रिकाओं में अनेक लेख प्रकाशित हो चुके हैंl आपका कार्यक्षेत्र-समाजसेवा है तथा सामजिक गतिविधि के तहत महिला समाज की कई इकाइयों में विभिन्न पदों पर कार्यरत हैंl उत्कृष्ट मंच संचालक होने के साथ ही बीएसएनएल, महिला उत्पीड़न समिति की सदस्य भी हैंl आपकी लेखन विधा खास तौर से लघुकथा हैl आपकी लेखनी का उद्देश्य-मन के भावों को अभिव्यक्ति देना हैl

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