`पकौड़े’ नहीं,रोजगार दीजिए

अजय जैन ‘विकल्प

इंदौर(मध्यप्रदेश)

विशेष वरिष्ठ संवाददाता-(दैनिक स्वदेश समाचार-पत्र, इंदौर)
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कई दिन से देशभर में एक ही विषय चल रहा है कि,प्रधानमंत्री के ख़ास और भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने सभी युवाओं को `पकौड़ा` बनाने का रोजगार देने की हिमायत की है,जबकि उनको अन्य कार्य उपलब्ध कराना थाl बात तो सही है कि,जब कोई भी मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री बनता है यानी चुनाव में खड़ा होता है तो वह युवा वर्ग के लिए किसी-न-किसी रोजगार नीति को लेकर आता हैl इतना ही नहीं,अब तो विधानसभा चुनाव लड़ने वाले भी अपने क्षेत्र के लिए रोजगार के वादे करने लगे हैं,ऐसे में नरेन्द्र मोदी जैसे प्रधानमंत्री के ख़ास सिपाहसालार श्री शाह ने ऐसी बात कही है तो बात को समझने की जरूरत हैl बात करते हैं उस शिक्षा की जो आपको स्नातक या स्नातकोत्तर के बाद किसी काम करने के लायक बनाती है,तो मजे की बात यह है कि,आज भी यानी आजादी के इतने सालों बाद भी अपने यहां निकली हुई सरकारी भर्तियों पर सालों तक नियुक्तियां नहीं हो पाती है,ये बात भी किसी पकौड़े से कम रोचक नहीं हैl ऐसे ही दूरदराज तो ठीक,शहर के ही कई कॉलेजों में में पढ़ाने वाले शिक्षक नही हैं,या फिर कोर्स,बाजार और स्थानीय उद्योगों की जरूरतों में कोई तालमेल नहीं हैl ये केवल सवाल नहीं है,वरन गंभीर मसला है,जिस पर उस हर प्रबुद्धजन को सोचना होगा,जो देश का भला चाहता हैl यकीनन पकौड़े बेचना बुरा कम नहीं है,और अपराध भी नहीं,किन्तु हर बार चाय-पकौड़े बेचने की ही बात करना स्वरोजगार भी नहीं कहा जा सकता है,क्योंकि हर पढ़े-लिखे युवा ने भाजपा को इसलिए ही मत नहीं दिया था कि,उस दल का अध्यक्ष ऐसी बात को ही सही ठहराएl अरे,आज चिन्तन ही नहीं,गहन कार्य तो इस बात पर होना चाहिए कि,आखिर सरकार को पकोड़ा पुराण गाना ही क्यों पड़ेl माना कि,आप सक्षम-सम्पन्न हैं और सरकार में भी हैं तो क्या पकौड़े के सिवाय और कोई बात नहीं कर सकते थे,या क्या यह जरुरी है कि राजनीति के लिए आप उस विपक्ष को जवाब देंगे ही,जो संख्या बल में आपके सामने बेहद कम हैl आपको यानी भाजपा को अच्छे से मालूम है कि,बोलने से क्या होता हैl कभी-कभी तो इन सब फालतू की बातों पर इतना अचरज होता है कि,आखिर संसद जैसी महती जगह पर ये नेता ऐसे कैसे हंस लेते हैंl जब देश में अनेक समस्याएं हैं और सालों बाद भी उनके हल नहीं खोजे जा सके हैं,तब यदि विपक्ष ने आपको `चायवाला` कह भी दिया तो क्या आपके स्तर से उसे उत्तर देना और वह भी `पकौड़े` तक का देना ठीक लगता है? यकीनन राजनीति कीजिए,क्योंकि आप नेता हैं,पर इस बीच यह भी मत भूलिए कि,आप जिम्मेदार जनप्रतिनिधि भी हैंl करोड़ों आमजन की आपसे कई सकारात्मक आशाएं और ख़ासतौर से युवाओं को भविष्य के लिए अनेक चिंताओं को पूरी करने की उम्मीदें हैं,ऐसे में आपकी पकौड़े जैसे बात कहीं-न-कहीं उनको तोड़ती हैl चलिए मान भी लेते हैं कि,आप सबको पकौड़े ही बेचने के लिए नहीं कह रहे हैं और रोजगार देंगे तो फिर ऐसा कहकर कमजोर विपक्ष को पकौड़े की तरह उबलने का ये मौका क्यों दे रहे हैंl यह मानकर चलिए कि,कमजोर विपक्ष तो आपको किसी-न-किसी मुद्दे पर उलझाकर देशभर को यह बताना ही चाहता है कि,ये सरकार युवाओं को रोजगार दने की परीक्षा में भी अनुत्तीर्ण हो गई है,इसलिए २०१९ में बदलनी हैl बिना बात `पकौड़े` को पकड़कर सबने चर्चा के लिए मुद्दा बना रखा है,जिसमें सत्तापक्ष के समर्थक भी शामिल हैंl अरे चिन्तन तो इस बात पर किया जाना चाहिए कि,सरकार बनने के बाद से अब तक लक्ष्य के अनुरूप कितना रोजगार सृजित किया गया,और कितना काम आगे के लिए करना हैl यह मुद्दा है ही नहीं,फिर भी इतना हल्ला मचाया गया कि,पूरे देश को पता चल गया कि,भारत में युवाओं के लिए रोजगार के विषय पर बात हो रही हैl वास्तव में रोजगार और पकौंड़े को हलके ढंग से लिए जाने के अनुभव से तो ऐसा लगता है कि,वास्तव में न तो पिछली सरकारें गंभीर रही,और न अब वाली दिखती हैl किसी-न-किसी उम्मीद से लोग ही अपनी मेहनत एवं अपनी जमा पूंजी से दिमाग से अपना धंधा जमाते रहे हैं और जमाते रहेंगेl ज़रा सोचिए तो कि,जो युवक-युवती १० वीं के बाद करीब ८ साल तक अपने मां-बाप की अच्छी आर्थिक हालत होने-न होने पर भी बड़ा पैसा और पूरा ध्यान पढ़ाई पर लगाता है,पर जब उसको सालों तक भी नौकरी नहीं मिलती है तो क्या बीतती होगी पूरे घर पर…l जब सरकार ने कोर्स तय किया तथा पढ़ाने वाले भी उनके नियम वाले ही,तो आखिर क्या वजह है कि,बरसों तक पढ़ने पर नौकरी के योग्य हो जाने का प्रमाण-पत्र(अंकसूची) आ जाने के बाद भी काफी बेरोजगारी हैl रोजगार के मौके बनाने की व्यवस्था सरकार की ही जिम्मेदारी है,और इसमें अगर वह कामयाब नहीं है या मना करती है तो हर युवा को बताया जाए कि,यह काम किसका हैl यकीनन सरकार स्टार्ट-अप जैसे अनेक प्रयास कर रही है,जिससे युवा कई रोजगार की व्यवस्था स्वयं ही कर सकते हैं,पर अभी भी काफी काम करने की जरूरत है,ताकि युवा वर्ग को निराशा नहीं घेरेl पहले सबके लिए बेहतर रोजगार की भरपूर तैयारी ही नहीं की जाए,बल्कि उपलब्ध भी कराया जाए,तब कहीं `पकौड़े` जैसा रोजगार या मजाक करें तो अच्छा होगाl सरकार सिर्फ स्वरोजगार को बढ़ावा देने की कोशिश करके और इसे प्रचारित करके ही अपनी जिम्मेदारी से बाख नहीं सकती हैl मान लेते हैं कि,प्रधानमंत्री सहित अध्यक्ष का पकौड़े वाला उदाहरण इस दिशा में था कि,जनता सरकार द्वारा रोजगार दिए जाने वाले आंकड़ों को ही न देखे,बल्कि सरकार के उन कदमों पर भी नजर रखे,जिनमें स्वरोजगार को प्रोत्साहन मिल रहा है,तो भी कहना होगा कि,सरकार के ये प्रयास नाकाफी हैंl दरअसल जिस तेजी से बेरोजगारी बड़ी समस्या बन रही है,उसकी आधी तेजी भी अभी सरकारी स्तर पर रोजगार जुटाने में नहीं हैl इसमें निश्चित ही सरकारों का दोष है कि,वो एक पढ़े-लिखे युवा को कालेज छोड़ते ही काम नहीं दे पा रही हैl सरकार को समझना होगा कि,पकौड़े तो कोई भी-कभी भी और सरकार की सलाह के बिना भी बेच ही लेगा,पर अच्छा हो कि,उसे यहाँ तक आने को मजबूर नहीं किया जाकर रोजगार की उपलब्धता की जाए,वरना सरकार को भी चुनाव में युवा वर्ग पकौड़ा बनाने में पीछे नहीं रहेगा,क्योंकि राजनीति की पाठशाला में पकौड़े बनाने का पाठ
पढ़ाने से काम नहीं चलता हैl अगर ऐसा हो सकता तो करोड़ों मतदाता भाजपा को नहीं,इस बार भी कांग्रेस को ही चुनतेl यदि उन्होंने आपको काम करने के लिए बहुमत देकर भरोसा जताया है तो अपने सिद्धान्तों से भटकिए मतl आपको बुद्धिजीवियों की पार्टी माना जाता है,इसलिए रोजगार के नाम पर चाय या पकौड़े जैसी बात बिल्कुल मत कीजिएl बेहतर हो कि,सरकार ऐसी जुमलेबाजी से देश के लाखों बेरोजगारों के मन को आहत नहीं करे,बल्कि उन्हें समय पर और सही रोजगार देl

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