पण्डित जी का हिन्दी अभियान

अरुण अर्णव खरे
भोपाल (मध्यप्रदेश)
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विलक्षण प्रतिभा के धनी प्रकाण्ड हिन्दी प्रेमी प्रेम प्रकाश पण्डित मुझे उस दिन अहाते में टकरा गए। मुझे घोर आश्चर्य हुआ कि पण्डित जी यहाँ कैसे। क्या बाबा योग गुरु की स्वदेशी अपनाओ की सीख उन्हें यहाँ खींच लाई है,या कुछ और बात है। मैंने उन्हें सदा विशुद्ध हिन्दी बोलते ही सुना था लेकिन दारू सदा वह अंग्रेज़ी ही पीते रहे हैं। उनके इस पाला-पलट चक्कर की असलियत जानने के लिए मेरा मन उतावला हुआ जा रहा था।
पिछले वर्ष जबसे उन्होंने विश्व हिन्दी सम्मेलन में भागीदारी की थी,तभी से उन्होंने स्वयँ को पूर्णतया हिन्दी को समर्पित कर देने का निर्णय कर लिया था। वह केवल अब हिन्दी ही बोलेंगे और लोगों को भी हिन्दी अपनाने की प्रेरणा देंगे। मुझे उनके इस हिन्दी प्रेम ने बहुत प्रभावित किया,लेकिन मेरे मन में कुछ शंकाएँ भी थी। मैंने अपनी दुविधा को उनके सामने प्रकट भी किया था- “आपका हिन्दी प्रेम अतुलनीय है पण्डित जी,लेकिन आप जिस रूप में आगे बढ़ रहे हैं उससे आप अपना यह प्रण पूर्ण-रूपेण निभा नहीं सकेगें।”
पण्डित जी नाराज़ हो गए,बोले-“तुम हिन्दी विरोधी हो,तुम स्वयँ तो कुछ करोगे नहीं और दूसरों को भी हतोत्साहित करोगे।”
मैंने विनम्रतापूर्वक कहा-“पण्डित जी,आप मेरा आशय ठीक से नहीं समझे। मैं भी हिन्दी का अदना-सा लेखक हूँ और हिन्दी के प्रति असीम श्रद्धा भाव रखता हूँ। मेरा आशय केवल इतना था कि हमारी बोलचाल में अन्य भाषाओं के बहुत से शब्द इस तरह धुल-मिल गए हैं कि वे अब हिन्दी के ही प्रतीत होते हैं। उन शब्दों का प्रयोग भी आप बन्द कर देंगे तो आपको अनेक अवसरों पर असहज स्थिति का सामना करना पड़ेगा।” मैंने बोलना चालू रखा-“आप जानते हैं हर वर्ष अंग्रेज़ी में सैकड़ों शब्द दुनिया की अन्यान्य भाषाओं से लिए जाते हैं। हिन्दी के भी सैकड़ों शब्द अंग्रेज़ी में हैं। इससे अंग्रेज़ी समृद्ध हुई है और उसकी व्यापकता बढ़ी है। हमें भी अन्य भाषाओं के शब्दों के प्रति ऐसी ही सौजन्यता दिखानी चाहिए।”
यह सुनकर वह बिफर गए-“तुमसे तो बात करना ही व्यर्थ है। तुम जैसे लोगों के कारण ही देश में हिन्दी की यह दशा है-अंग्रेजी में तो रिश्तों तक के लिए उपयुक्त शब्द नहीं है। क्या तुम समधी व ससुराल के अंग्रेज़ी शब्द बता सकते हो-नहीं ना। अब मैं तुम्हारी और बकवास सुनना नहीं चाहता,चुपचाप बढ़ लो यहाँ से।”
वह और कुछ बोलें,इससे पहले ही मैंने घुटने टेक दिए,पर जाते-जाते उनसे यह कहने का लोभ संवरण नहीं कर सका-“पण्डित जी मैं जा रहा हूँ लेकिन एक बार फिर से आप सोच लीजिए। आप कहीं अपनी इस हठधर्मिता के कारण हँसी के पात्र न बनें। रेल के लिए यदि आप ‘लोह पथ गामिनी या सिगरेट के लिए ‘धूम्रपान दण्डिका’ शब्द बोलेंगे तो लोग आप पर हँसेंगे। इसी तरह एसी,फ्रिज,पेन,पॉलिश या गैस सिलेण्डर के लिए भी शब्द खोजना मुश्किल होगा। बिजली अथवा दूरभाष के बिलों के लिए आप कौन से शब्द प्रयोग करेंगे। मैं अंग्रेजी का क़तई समर्थक नहीं हूँ-वह भी पूर्ण भाषा नहीं है,लेकिन उसकी दूसरी भाषाओं के शब्द ग्रहण करने की पहल प्रशंसनीय है।”
उन्होंने मुझे घूरकर देखा। मैंने वहाँ से चुपचाप खिसक लेना ही उचित समझा। उस दिन के बाद आज वह मुझे यहाँ टकराए थे,यद्यपि उनकी तथाकथित उपलब्धियों से मैं अपडेट रहता था।
जिस अमरनाथ सेलून से पण्डित जी बाल कटवाते थे,वहीं से उन्होंने अपने हिन्दी अपनाओ अभियान की शुरुआत की थी। उसके मालिक के जूँ जान-चक्षु उन्होंने अपने वाक्-चातुर्य से खोलने में सफलता पा ली थी और उसके सेलून का नामकरण अमरनाथ केश करतानालय करवा दिया। अगले चरण में उनके प्रयत्नों से गोकुल स्वीट हॉउस “गोकुल मिष्ठान भण्डार” हो गया। सलूजा आई हॉस्पिटल को “सलूजा नेत्रालय” और रत्ना मेडिकल स्टोर को “रत्ना दवा भण्डार” में बदलने में भी उन्हें सफलता मिल गई। इन छोटी-छोटी सफलताओं ने भी पण्डित जी को ख़ासा उत्साहित किया। यद्यपि अपने बेटे अमित इण्टरनेट सेन्टर को अमित अन्तर्जाल केन्द्र करवाकर वह उसके ग्राहकों के मन में भ्रम की स्थिति निर्मित कर चुके थे।

                 उनके सामने उस दिन विचित्र स्थिति उत्पन्न हो गई,जब वह अपने सूट में इस्त्री (प्रेस) कराने ड्रायक्लीनर की दुकान पर गए। वह पण्डित जी और उनके अभियान से परिचित था,अतएव मज़े लेने के दृष्टिकोण से बोला-“सर,आप प्रेस के लिए तो इस्त्री बोलते हैं फिर सूट क्यों बोलते हैं।”
पण्डित जी ने कुछ नहीं कहा और बिना इस्त्री कराए ही सूट लेकर वापस आ गए। इसके बाद उन्हें किसी ने सूट पहिने नहीं देखा। सूट क्या उन्होंने पैंट-शर्ट पहिनना ही छोड़ दिया। अब वह कुर्ते-पाजामे में या धोती-कुर्ते में ही दिखते थे। इसके कुछ दिन बाद ही एक घटना और घटी,जिसने उन्हें पैदल ही कर दिया। दरअसल,उनकी मोपेड पंचर हो गई थी जिसे ठीक कराने वह कॉलोनी के बाहर स्थित दुकान तक ठेलते हुए ले गए थे। पंचर बनाने वाले भैया ने उनसे मोपेड और पंचर की हिन्दी पूछ ली। पंडित जी को एकाएक कुछ नहीं सूझा तो वह मोपेड वहीं खड़ी करके लौट आए,जिसे बाद में उनका बेटा लेकर आया। इसके बाद से वह अब पैदल ही कहीं आते जाते हैं।
आज जब वह मुझे अहाते में टकराए तो मैंने उन्हें प्रणाम कर पूछ ही लिया-“पण्डित जी,कैसा चल रहा है आपका अभियान?”
मेरा प्रश्न सुनकर वह ज़रा भी नाराज़ नहीं हुए। मुझे सुखद अनुभूति हुई कि उन्होंने मेरी बात को व्यंग्य नहीं समझा,बोले-“तुम सही कहते थे बड़ा कठिन है यह काम,हिन्दी की भलाई के लिए हमें दुराग्रह त्यागने ही होंगे,तथा अन्य भाषाओं के बोल-चाल के शब्दों को मान्य करने से हिन्दी का भला ही होगा। दुरूह शब्दों के निर्माण से लय बाधित होती है। मैं बहुत आगे निकल आया हूँ,मेरे लिए वहाँ से लौट पाना आसान नहीं है। लोग मेरा मज़ाक़ बनाएँगे और अब तक जो काम मैंने किया है,उस पर पानी फिर जाएगा। लोग तो यहाँ तक कहते हैं कि मैं यहाँ इसीलिए आता हूँ कि इस जगह का नाम बिना किसी की प्रेरणा के पूर्ण रूपेण हिन्दी में लिखा गया है-देशी दारू की दुकान,है ना ओछी बात। तुमसे अपेक्षा है कि तुम तर्क के आधार पर मेरे काम को आगे बढ़ाओ और हिन्दी को विश्व भाषा बनाने की दिशा में काम करो।”
अब उनका दर्द या तो मैं समझता था या फिर ढक्कन खुलने के बाद सर पर चढ़कर बोलने वाली बिचारी अंगूरी…।
परिचय:अरुण अर्णव खरे का जन्म २४ मई १९५६ को अजयगढ़,पन्ना (म.प्र.) में हुआ है। होशंगाबाद रोड (म.प्र.), भोपाल में आपका घरौंदा है। आपने भोपाल विश्वविद्यालय से मैकेनिकल इंजीनियरिंग में स्नातक की शिक्षा प्राप्त की है। आप लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग में मुख्य अभियंता पद से सेवानिवृत हैं। कहानी और व्यंग्य लेखन के साथ कविता में भी रुचि है। कहानियों और व्यंग्य आलेखों का नियमित रूप से देश की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं सहित विभिन्न वेब पत्रिकाओं में भी प्रकाशन जारी है। श्री खरे का १ व्यंग्य संग्रह और १ कहानी संग्रह सहित २ काव्य कृतियाँ-“मेरा चाँद और गुनगुनी धूप” तथा “रात अभी स्याह नहीं” प्रकाशित है। कुछ सांझा संकलनों में भी कहानियों तथा व्यंग्य आलेखों का प्रकाशन हुआ है। कहानी संग्रह-“भास्कर राव इंजीनियर” व व्यंग्य संग्रह-“हैश,टैग और मैं” प्रकाशित है। कहानी स्पर्धा में आपकी कहानी ‘मकान’ पुरस्कृत हो चुकी है। गुफ़्तगू सम्मान सहित दस-बारह सम्मान आपके खाते में हैं। इसके अलावा खेलों पर भी ६ पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं। भारतीय खेलों पर एक वेबसाइट का संपादन आपके दायित्व में है। आकाशवाणी एवं दूरदर्शन पर भी वार्ताओं का प्रसारण हुआ है। आप मध्यप्रदेश में कुछ प्रमुख पत्रिकाओं से भी जुड़े हुए हैं। अमेरिका में भी काव्यपाठ कर चुके हैं। 

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