परत-दर-परत उधेड़ती `कस्तूरी कुंडल बसे`

डॉ.विभा माधवी
खगड़िया(बिहार)

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पुस्तक समीक्षा……………………….

‘कस्तूरी कुंडल बसे’ अभियंता अवधेश कुमार ‘आशुतोष’ की कुंडलियों की पहली पुस्तक है,जिसे हिंदी राजभाषा विभाग से अनुदान मिला है। इससे पहले वे दोहों की एक पुस्तक लिख चुके हैं। यह पुस्तक आधुनिक काल के हिंदी साहित्य से भिन्न है,क्योंकि इसमें युग-चेतना और जन-शिक्षा कुंडलियों की राह पकड़कर आई है। ‘आशुतोष’ ने रीतिकालीन कवि गिरधर कविराय की पर्याय बन चुकी कुंडलियों के माध्यम से कठिन युग सत्य को कहने की कोशिश की है। जिस प्रकार रीतिकालीन हवा में जब श्रृंगार का सुरुर था,तब गिरधर कविराय ने कुंडलिया पेश कर श्रृंगार की शराब परोसने वालों का प्रभाव फीका कर दिया था। उसी तर्ज पर ‘आशुतोष’ ने कविता की छंदमुक्त बयार में कुंडलियां लिखकर कविता का स्वाद ही बदल दिया। इनकी कुण्डलियाँ समाज में घट रही घटनाओं का जीवन्त चित्रण है। हर सम-सामयिक घटनाओं पर इनकी पैनी नजर है। वर्तमान परिपेक्ष्य में इनकी कुंडलियाँ सामाजिक एवं राजनीतिक घटनाओं की परत-दर-परत उधेड़ती है। इन्होंने पुस्तक की शुरुआत गणपति वंदना से की है। महासमर का बिगुल फूंकने से पहले इन्होंने गणपति से इस अभियान को सफल करने का निवेदन किया है,तथा सारी बाधा-विघ्न हरने की प्रार्थना की है।

“गजमुख बंधन पदकमल,धरता तेरा ध्यान।
महासमर पर चल पड़ा,सफल करें अभियान॥
सफल करें अभियान,हटे सब बाधा झंझट।
फैले यश संसार,न आए कोई संकट॥
आशुतोष कविराय,तुम्हीं हो दाता सब सुख।
जीतें रण निर्विघ्न,करूँ अभिनंदन गजमुख॥

(पृष्ठ -१५)

इसके बाद विद्या एवं ज्ञान की अधिष्ठात्री माँ शारदे एवं संपूर्ण जगत के हलाहल विष का पान करने वाले शिव की आराधना करते हुए वे आगे बढ़ते हैं। देश की एकता एवं अखंडता पर इनकी कुंडलिया अदभुत मिसाल पैदा करती है।
हिंदू,ईसा,मुसलमाँ,सिक्ख पंखुड़ी फूल।
इक टूटी जो पंखुड़ी,मिटे फूल के मूल॥
मिटे फूल के मूल,न तोड़ो डंठल पत्ता।
सींचो दे निज खून,हिले ना इसकी सत्ता॥
आशुतोष कविराय,रहे सभी भाई-बंधु।
हो कोई भी धर्म,मुसलमाँ,ईसा,हिंदू॥

(पृष्ठ-१७)

इस कुंडलियां में आशुतोष जी ने हिंदू,ईशा, मुसलमान,सिख को फूल की पंखुड़ियों के माध्यम से एक सूत्र में पिरोया है। आज की राजनीति में जाति-पाति,हिंदू, मुस्लिम,सिख,इसाई का इस्तेमाल नेताओं द्वारा अपने स्वार्थ के लिए किया जा रहा है। जिस प्रकार कई पंखुड़ियां मिलकर फूल बनती है,उसी प्रकार सभी जाति एवं धर्म के लोग मिलकर हिंदुस्तान की पहचान बनाते हैं। एक पंखुड़ी के टूट जाने से जिस प्रकार फूल का अस्तित्व मिट जाता है,उसी प्रकार हमारे समाज में जाति एवं मजहब की पंखुड़ी टूट जाने से हिंदुस्तान का अस्तित्व मिट जाएगा। आज के राजनीतिक माहौल में कवि की कुण्डलियां पथ प्रदर्शक का काम कर रही है। यदि हमारे देश का हर इंसान कवि की तरह सोचने लगे तो,हमारा देश जाति-मजहब की भावना से ऊपर उठकर एक ऐसा देश होगा,जिसकी एकता एवं अखंडता अक्षुण्ण होगी। कवि की यह रचना देश में जागृति का नया सबेरा लाएगा और एक स्वस्थ समाज के निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान निभाएगा।
आशुतोष जी देश को एक सूत्र में पिरोने की कोशिश करते हैं। हमें इस पौधे को अपने खून-पसीने से सींचना होगा। जिससे विविधता में एकता वाले देश भारत का मूल स्वरूप बना रहे,और हिंदुस्तान रूपी बगिया में हर धर्म और जाति के फूल मुस्कुराते रहें।
आशुतोष जी कहते हैं कि मंदिर-मस्जिद तोड़ने से क्या फायदा ? नेता इस पर अपनी स्वार्थ की रोटी सेकते हैं,तथा आम जनता का चैन छीनते हैं। इन फालतू बातों से ऊपर उठकर हमें अपना समाज सुरभित करना चाहिए,न कि मंदिर-मस्जिद तोड़ने में अपनी शक्ति बर्बाद करनी चाहिए।
हमारी आजादी देश के अनगिनत वीरों ने अपना खून देकर मोल लिया है,यह बहुत ही कीमती है। अतः हमें इस अनमोल धरोहर को सहेज कर रखना होगा।
हमारे देश में अमन-चैन और एकता स्थापित करते हुए अवधेश जी आगे बढ़ते हैं और राजनीति,काला धन,कानून और संविधान,शिक्षा और साजिश,न्याय व्यवस्था और पुलिस तंत्र,भ्रष्टाचार आदि समसामयिक विषयों पर कुण्डलियां लिखते हुए सबों की अच्छी खबर लेते हैं। यह एक सजग,सचेष्ट कवि हैं और समाज में घट रही घटनाओं के प्रति बहुत संवेदनशील है। ये हमारे देश के नेताओं के चरित्र पर से पर्दा हटाते हुए समाज के सामने रखते हैं कि किस तरह नेता चुनाव के समय जनता से झूठे वादे करते हैंl चुनाव जीतने के बाद जनता को फिर उसी कठिनाई का सामना करने के लिए छोड़ देते हैं। अपना स्वार्थ सिद्ध करने के लिए नेता आतंकियों का भी साथ देते हैं,तथा जनता में नफरत और हिंसा बांटते हैं। धर्म के नाम पर आतंक फैलाते हैं। जनता को धोखा देने के लिए कभी चोटी काटते हैं,तो कभी दाढ़ी-मूँछ तो कभी टोपी पहनते हैं। वे अपने स्वार्थ के लिए देश की सभ्यता-संस्कृति और धरोहर को भी गिरवी रखने से नहीं चूकते हैं। अपना मत बैंक बढ़ाने के लिए दुश्मन को भी सरहद में घुसाने से नहीं हिचकिचाते हैं। जिन नेताओं का वेतन भत्ता लाखों में हो वह गरीबों के दु:ख-दर्द को कैसे समझ पाएंगे ?
कोसे नेता हिंद को,फैलाए आतंक।
क्या छोड़े निज धर्म को,मिटे धर्म के पंकll
मिटे धर्म के पंक,कहो क्या काटें चोटी।
रखें दाढ़ी,मूँछ,कहो क्या फेकें धोतीll
आशुतोष कविराय,साँप को क्यों तू पोसे।
याद दिलाया आज,कभी ना अब तू कोसेll

बनती नित दिन योजना,सभी आय के द्वार।
जाए जनता भाड़ में,अपना घर भर यारll
अपना घर भर यार,माल है यह फोकट का।
खोज योजना फंड,पुराना हो या टटकाll
आशुतोष कविराय,सभी से गाड़ी छनती।
जोड़े लाख-करोड़,कमीशन सबकी बनतीll

(पृष्ठ-२०)

आज हमारा देश कई जटिल समस्याओं में उलझा हुआ है,जिसमें राजनीति कोढ़ के ऊपर खाज की तरह है। राजनेता कैसे-कैसे वादे जनता से करते हैं,इसका एक उदाहरण देखिए-

सत्ता में तो लाइए,सब होंगे खुशहाल।
ज्यों गद्दी पर बैठते,करते आप निहालll
करते आप निहाल,साथ में चमचा मोटे।
पिसता है दिन-रात,मध्य औ’ निबला छोटेll
सोते भूखे पेट,दीन तन पर ना लत्ता।
क्या देखेंगे लोग,इन्हें लालच है सत्ताll

(पृष्ठ-२१)

आशुतोष जी कानून व संविधान की लचर व्यवस्था की ओर जनता का ध्यान आकर्षित करते हुए कहते हैं-

सुंदर है साकी हसीं,बड़ा निराला रूप।
चिकना-चुपड़ा गाल है,सेवा करती भूपll
सेवा करती भूप,पिलाती नित दिन हाला।
है मन के अनुरूप,जपे सब उसकी मालाll
आशुतोष कविराय,बाँटती है मधु हँसकर।
मनमोहक मुस्कान,बड़ी मधुबाला सुंदरll

(पृष्ठ-२१)

आज संविधान तथा न्याय व्यवस्था पैसेवालों के अनुरूप चलता है तथा उनकी सेवा करता है।
आज हमारी शिक्षा व्यवस्था की रीढ़ टूट गई है और वह पंगु हो गया है। बिहार में शाला शिक्षा एक प्रदर्शनी है, साइकिल,पोशाक और खिचड़ी की प्रदर्शनी। यहां की शिक्षा व्यवस्था को देखते हुए कवि की लेखनी व्यंग्यात्मक हो जाती है और वे कहते है-

टूटा साजिश का कहर,रोए शिक्षक वाट।
लील गया पांडित्य को,भूल गए हर पाठll
भूल गए हर पाठ,पढ़ाए खअ से कौआ।
खिचड़ी में है मूस,पिलाए जबरन पौआll
आशुतोष कविराय,तंत्र नेता ने लूटाl
हुक-हुक शिक्षा साँस,अंग है सारा टूटाll

(पृष्ठ-२५)

आज हमारी शिक्षा मत बैंक की राजनीति की भेंट चढ़ गई है,और शिक्षा का मंदिर साजिश का शिकार हो गया है। बच्चों को शिक्षित नहीं करके सिर्फ साक्षर करने की साजिश रची गई गई है,ताकि हमारी नई पीढ़ी बुद्धिजीवी बनकर न उभरे,औऱ नेताओं की चालबाजी को समझ नहीं सके तथा नेता जनता की आँखों में धूल झोंकते रहे। हमारी न्याय व्यवस्था और पुलिस तंत्र का पोल खोलती हुई आशुतोष जी की कुंडलियों का रसास्वादन कीजिए-

डाका बस डलता रहा,पहुँचे घंटे बाद।
हमको ना इसकी खबर,सबका है अपवादll
सबका है अपवाद,बचा क्या कोई इससे।
ताला करो इजाद,नहीं चोरी हो जिससेll
आशुतोष कविराय,हुक्म हो मेरे आका।
क्या है मेरा दोष,चोर ने डाला डाकाll

(पृष्ठ-२७)

हमारी न्याय व्यवस्था की एक झलक तो देखिए-

धर्मराज दरबार है,आज हुआ नीलाम।
सत् की है लटकी तुला,क्यों करते बदनामll
क्यों करते बदनाम,धर्म के इस जंतर को।
थोड़ा तो दो वक्त,न्याय के इस मंदिर कोll
आशुतोष कविराय,रोता है न्याय पुकार।
कुछ तो करो लिहाज,है धर्मराज दरबारll

(पृष्ठ-२८)

हमारे देश में भ्रष्टाचार अपनी चरम सीमा लांघ चुका है-

बनते हैं पुल आजकल,लाखों जन फरियाद।
बालूमय दीवार छत,टूटे दस दिन बादll
टूटे दस दिन बाद,पड़े सीमेंट ना सरिया।
जो भी ठेकेदार,बहाए पैसा दरियाll
आशुतोष कविराय,नोट सब असली गिनते।
लगते खोटा माल,सेतु बस नकली बनतेll

(पृष्ठ-३०)

पर्यावरण में चारों ओर बढ़ते प्रदूषण को देखकर कवि का मन दुखी होता है और वे कहते हैं-
गंगा बस धोती रही,दुनिया भर का पाप।
पुण्यवती अब झेलती,लाखों दु:ख संतापll
लाखों दुख संताप,फँसा शासन का पचड़ा।
समझे नाली देश,गिरे कोटिक टन कचराll
आशुतोष कविराय,बसे लोटा मन चंगा।
होगा यह इतिहास,कभी ना लौटे गंगाll

(पृष्ठ-३२)

कवि ने बेटी को एक खूबसूरत उपहार माना है वे कहते हैं-

बेटी एक उपहार है,ईश्वर का वरदान।
इससे ही संसार है,कन्यादान महानll
कन्यादान महान,चले इससे जग सारा।
घर की शोभा शान,खिले आँगन चौबाराll
आशुतोष कविराय,भरे घर कोठी पेटी।
दे शिक्षा सम्मान,फर्क ना बेटा-बेटीll

(पृष्ठ-३४)

हमारे समाज में अनेक कुरीतियां है,जिसके ऊपर से आशुतोष जी पर्दा उठाते हैं। इस संग्रह में केवल राजनीति, सामाजिक विडंबना,आक्रोश,अत्याचार,प्रतिरोध की कुंडलियां नहीं है,बल्कि इसमें कोमल भावनाओं की भी अभिव्यक्ति है, जो हमें मखमली एहसास प्रदान करती है। आइये,कुछ देर कवि के साथ प्रकृति सुषमा में विश्राम करते हुए श्रृंगार रस में गोते लगाते हैं।

नील सरोरुह पंक में,मुख पर है मुस्कान।
प्राप्त कमल शोभा बड़ी,भर दे मन में प्राणll

कवि हमेशा मन में आशा का दीपक जलाकर रखने का संदेश देते हैंl आशुतोष जी जिंदगी की धूप,वर्षा,आंधी से टकराते हैं,और सबसे बड़ी बात यह है कि ये एक बेहतर शब्द समाज का ख्वाब अपनी आंखों में बसाए हुए हैं। कवि समाज में फैली हुई कुरीतियां,जीवन के कठोर पहलू,नारी प्रताड़ना, दुख जैसे विषय पर कुंडलियाँ लिखते हैं। हमारे यहां आज भी कई नये जोड़े पुष्पित-पल्लवित होने से पहले ही दहेज की बलिवेदी पर चढ़कर कुम्हला जाते हैं-

दुल्हन गाड़ी माल की,ढोए धन उपहार।
लोभी की बेटी बहू,जले या डूबे धारll
जले या डूबे धार,न जाने कितनी नारी।
कब तक नारी संग,रहेगी यह लाचारीll
आशुतोष कविराय,बड़ी नारी मन उलझन।
कामधेनु-सी गाय,बनेगी कब यह दुल्हनll

(पृष्ठ-५०)

जिस कलेजे के टुकड़े को पाल-पोसकर ब़डा किया,पढ़ाया-लिखाया उसी पुत्र के विवाह के समय पिता की मानसिकता बदल जाती हैl

हमारे समाज में अनेक सामाजिक कुरीतियां हैं,उसके ऊपर से आशुतोष जी पर्दा उठाते हुए कहते हैंl

आशुतोष जी मच्छर जैसे सूक्ष्म से सूक्ष्म जीव की भी अवहेलना नहीं करते हैं,और वे भी उन्हें संवेदित करती हैl रामायण एवं महाभारत में भी कवि की अच्छी रुचि है, तथा इनके मन में भगवान कृष्ण और राम के प्रति अपार श्रद्धा भी हैl ये ५० से भी ज्यादा कुंडलियां भगवान राम एवं कृष्ण को समर्पित करते हैं-

चोटी मैया बांध दो,है अब भी यह छोट।
रोज बहाना एक-सा,तेरे मन में खोटll
तेरे मन में खोट,रोज तुम दूध पिलाती।
करती कंघा रोज,दही से तुम नहलातीll
आशुतोष कविराय,न खाऊँ माखन रोटी।
बोलो सच बात,बढ़ेगी कब यह चोटीll
अंत में कवि यह पुस्तक पाठकों के हाथ में समर्पित करते हुए कहते हैं-

हूँ मैं क्या,मुझको पता,नहीं कर्म परिणाम।
अर्पित रचना ईश को,लाख करोड़ों श्यामll
लाख करोड़ों श्याम,करेंगे मिलकर निर्णय।
यदि उपयोगी श्रेष्ठ,करेंगे,इसका संचयll
हरिश्चंद्र जब स्वयं,नहीं छोड़े निज शैव्या।
ज्ञानी सुधी महान,कुशल सम्मुख हूँ मैं क्या ?

(पृष्ठ-९६)

इस प्रकार देखते हैं कि आशुतोष जी की कुंडलियाँ अपने समय से आंख मिलाकर देखती है,सोचती है,अनुभव करती है और जरूरत पड़ने पर जन विरोधी शक्तियों का मजाक भी उड़ाती है। कुंडलियां प्रायः सूक्ति परक लिखी जाती रही है, परंतु आशुतोष जी ने इसे तोड़कर विनोद एवं तथ्य विश्लेषण से जोड़ दिया है,इसलिए इनकी कुंडलियों में समाज,शासन और व्यक्ति जीवन की सच्चाइयाँ,व्यवस्था की जटिल बुनावट के भीतर से उभरती है। ये व्यवस्था में है पर उससे रागबद्ध नहीं है। तभी वह उसमें घुसकर उसकी कुरूपताओं को एक-एक कर सामने लाते हैं।
आज न तो भारतीय भारत है ना राष्ट्रीय राष्ट्र। धर्मनिरपेक्षता जैसे झूठे शब्द के निर्माण ने हमारी नैतिकता और कर्तव्य बोध को क्षत-विक्षत कर दिया है। असीम लालच ने देश को खोखला कर दिया है तो सुख-सुविधाओं की भोगवृत्ति ने इंसानियत को शैतानी दर्जे की भूख दी है। कवि आशुतोष जी अपनी कलम से इन सभी बुराइयों के साथ युद्ध कर रहे हैं।
मुझे आशा ही नहीं पूर्ण विश्वास है कि,आशुतोष जी की पुस्तक `कस्तूरी कुंडल बसे` पाठकों के लिए उपयोगी होगी तथा उन्हें बहुत पसंद आएगा। यह कवि की कुंडलियों की पहली पुस्तक है,इसलिए इसमें कहीं-कहीं कुछ त्रुटियां पाठकों को मिल सकती है,फिर भी पहली रचना के हिसाब से आशुतोष जी की रचना काफी प्रौढ़ है तथा समय के साथ नजर मिलाकर चलती है। मेरी शुभकामनाएं,वे इसी तरह निरंतर साहित्य के भंडार को समृद्ध करते रहें।

परिचय-डॉ.विभा माधवी की जन्म तारीख १७ मार्च १९७३ एवं जन्म स्थान-बरौनी है। आप बिहार के जिला खगड़िया स्थित ग्राम चंद्रनगर में रहती हैं,जबकि स्थाई बसेरा जमशेदपुर में है। भाषा ज्ञान हिंदी तथा अंग्रेजी का है। राज्य झारखंड की मूल निवासी डॉ.माधवी ने एम.ए.(हिंदी),बी.एड. सहित पी-एच.डी.एवं नेट (हिन्दी में उत्तीर्ण)की शिक्षा प्राप्त की है। कार्यक्षेत्र में विद्यालय में शिक्षिका हैं। सामाजिक गतिविधि के अन्तर्गत साहित्यिक गतिविधियों में भाग लेती रहती हैं। लेखन विधा-कविता, आलेख, संस्मरण,समीक्षा एवं गद्य की अन्य विधा है। रचना प्रकाशन कई पत्र-पत्रिकाओं में जारी है। लेखनी का उद्देश्य-साहित्य सेवा करना है। प्रेरणा पुंज-हिंदी की साहित्यिक पुस्तकें और विशेषज्ञता-हिंदी की गद्य विधा में लेखन है।

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