पर्यावरण और वानिकी

प्रज्ञा गौतम ‘वर्तिका’
कोटा(राजस्थान)
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पर्यावरण दिवस विशेष……………………………….
वन प्रकृति प्रदत्त अनमोल संपदा है। भारतीय जन-मानस में वनों का पर्यावरणीय ही नहीं,अपितु धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व भी रहा है। आजादी के बाद हुए त्वरित विकास ने वनों को
अत्यधिक क्षति पहुँचाई है। आजादी के पूर्व लगभग ४० प्रतिशत भूमि वनाच्छादित थी,जो अब मात्र २१.३४ प्रतिशत रह गई है। इंडियन स्टेट ऑफ़ फारेस्ट रिपोर्ट (आईएसएफआर )२०१५ के अनुसार एक अच्छी खबर यह है कि पिछले दो वर्षों में वन क्षेत्र में ५०८१ वर्ग किमी की वृद्धि हुई है। भारत भूमि के कुल ७,०१,६७३ वर्ग किमी क्षेत्रफल पर वन हैं। सबसे अधिक वन-क्षेत्र मध्यप्रदेश में ७७,४६२ वर्ग किमी है जो कुल भूमि का ३०.७१ प्रतिशत है। अरुणाचल प्रदेश
दूसरे स्थान पर ६७,२४८ वर्ग किमी वन-क्षेत्र के साथ है। उड़ीसा,छत्तीसगढ़, मिजोरम,नागालैंड भी वन-संपदा की दृष्टि से समृद्ध राज्य हैं। राजस्थान में ४.७ प्रतिशत,पंजाब और हरियाणा में मात्र ३.५ प्रतिशत भूमि पर वन हैं।
भारत में प्रमुख रूप से छः प्रकार के वन पाए जाते हैं-
# उष्ण कटिबंधिय सदा बहार वन-
२०० से.मी. से अधिक वर्षा वाले,अत्यधिक आर्द्र और उष्ण
भागों में पाए जाते हैं। ये ऊँचे वृक्षों वाले सघन वन हैं। पूर्वोत्तर भारत,अंडमान, मलाबार आदि में पाए जाते हैं। यहाँ मुख्य रूप से रबर,महोगनी,एबोनी,
नारियल,बाँस,बैंत आदि पाए जाते हैं।
# उष्ण कटिबंधिय आर्द्र पर्णपाती वन-
१००-२०० से. मी वर्षा वाले भागों में पाए जाते हैं। वृक्ष ग्रीष्म के प्रारंभ में पत्तियां गिरा देते हैं। सागवान,साल,चंदन,पीपल, शहतूत आदि वृक्ष पाए जाते हैं।मध्यप्रदेश,कर्नाटक,उत्तर प्रदेश आदि क्षेत्र हैं।
# उष्ण कटिबंधिय शुष्क पर्णपाती वन-
७०-१०० से.मी. वर्षा वाले क्षेत्रों में पाए जाते हैं। उत्तर प्रदेश,आंध्रप्रदेश,महाराष्ट्र, प.बिहार,प.मध्यप्रदेश आदि में मिलते हैं। प्रमुख रूप से खेर,तेंदू,बेल,पलास आदि वृक्ष हैं।
# कँटीले वन-
७० से.मी. से कम वर्षा वाले क्षेत्रों में गुजरात,राजस्थान,पंजाब आदि राज्य शामिल हैं। कैर,बबूल,खेजड़ी आदि वृक्ष,ऊँची घास,झाड़ियाँ,नागफनी पाए जाते हैं।
# पर्वतीय वन-
ये वन पर्वतीय क्षेत्रों जैसे हिमालय, नीलगिरि,अन्नामलाई में पाए जाते हैं। समुद्र तल से ऊँचाई के अनुसार ये पेटियों के रूप में व्यवस्थित रहते हैं। प्रमुख रूप से चीड़,सिल्वर,फर,स्प्रूस आदि वृक्ष पाए जाते हैं।
# मेंग्रोव वन
ये वन दलदलों में,तटीय लैगून,गंगा-ब्रह्मपुत्र,महानदी-गोदावरी,कृष्णा-कावेरी आदि नदियों के डेल्टा में पाए जाते हैं। गंगा-ब्रह्मपुत्र के डेल्टा में सुन्दरी नामक वृक्ष पाया जाता है,जिसकी जड़ें दलदल से बाहर ऊपर वृद्धि करती हैं और श्वसन क्रिया करती हैं। इस वृक्ष के कारण यह वन सुंदर वन कहलाता है।

हम वनों पर निर्भर हैं-

प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से हम वनो पर ही आश्रित हैं। वनों से बहुमूल्य इमारती लकड़ी,जलावन लकड़ी,उद्योगों जैसे कागज,दियासलाई,रेशम,कत्था,रबर, बीड़ी आदि के लिए कच्चा माल, औषधियाँ और लाख आदि प्राप्त होते हैं। आदिवासियों की जीविका तो वनोत्पादों जैसे आँवला,गोंद,शहद,लाख और तेंदू
पत्ता आदि पर ही निर्भर है। वन मृदा का निर्माण करते हैं। पेड़ों से झड़ने वाली पत्तियां सड़-गलकर मृदा की ऊपरी परत बनाती हैं। वन मृदा के अपरदन को रोकते हैं। ये वायु में कार्बन-डाइऑक्साइड के स्तर को कम करके पर्यावरण को शुद्ध करते हैं। बादलों को आकृष्ट करके वर्षा लाते हैं और वातावरण में नमी बनाए रखते हैं। वन
अनेक जीवों को आश्रय प्रदान करते हैं।

वनोन्मूलन कारण एवं प्रभाव-
घर के बुजुर्ग बताया करते हैं कि अभी जहाँ शहर की पॉश कॉलोनियां बसी हैं,वहाँ कभी घने जंगल थे। निरंतर शहरों का कलेवर फैलता है और इनकी सीमाएं निकटवर्ती गाँवों को स्पर्श कर जाती हैं। बीच में आने वाले वृक्ष धीरे-धीरे कटते जाते हैं। नवीन आवासीय योजनाएं हों या बहुमंजिला इमारतों का निर्माण,
बलि वृक्षों की ही चढ़ती है। शहरीकरण के अतिरिक्त विकास के इस दौर में बड़े बाँधों के निर्माण, बिजली उत्पादन,खनन ,रेलवे ट्रैक बिछाने का कार्य,सड़कों और राजमार्गों के निर्माण और औद्योगिक परियोजनाओं को क्रियान्वित करने के लिए वनों का सफाया कर दिया जाता है।
कृषि भूमि के विस्तार के लिए भी वनों को काट दिया जाता है। निचले पर्वतीय क्षेत्रों में रहने वाले लोग कृषि के लिए वनों को जलाकर नष्ट कर देते हैं। यह कृषि का आदिम प्रकार है,इसे झूमिंग कृषि कहते हैं। इस प्रक्रिया में भूमि बंजर हो जाती है।
आजादी के बाद पिछले ६०-७० वर्षों में हम विकास के कई पायदान चढ़े हैं परन्तु उतनी ही हमने पर्यावरण को हानि पहुँचाई है। प्राकृतिक संसाधनों के असंयमित दोहन से वनों का विनाश, प्रदूषण,भू-जल स्तर में कमी,मौसम में असामान्य बदलाव और तापमान में बढ़ोतरी जैसी गंभीर समस्याएं उत्पन्न हो गई हैं। विकास और पर्यावरण एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। इन्हें एक-दूसरे से अलग नहीं किया जा सकता। पर्यावरण के प्रति संवेदनशील रहते हुए विकास ही समग्र विकास कहलाता है।
विकास और औद्योगिक परियोजनाओं के कारण पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभाव का आकलन करने हेतु ‘पर्यावरण प्रभाव आकलन विभाग (ईआईए)’ का गठन किया गया है। कोई भी इस प्रकार का निर्माण करने से पहले जनसुनवाई की जाती है। विशेषज्ञ समिति निर्माण से संबधित दस्तावेजों का आकलन करने के पश्चात ही निर्माण को हरी झंडी देती है, पर इस प्रक्रिया में इतना भ्रष्टाचार
है कि अधिकांश परियोजनाओं को पर्यावरणीय हितों को अनदेखा
करके मंजूरी दे दी जाती है।

राष्ट्रीय वन नीति-
राष्ट्रीय वन नीति १८९४ में बनाई गई। इसे सन १९५२ और फिर १९८८ में संशोधित किया गया। इसका प्रमुख उद्देश्य वनों का
रक्षण,संरक्षण और विकास है। विशेषज्ञों के अनुसार कुल भू-भाग के ३३.४
प्रतिशत भाग पर वन होने चाहिए।
राष्ट्रीय वन नीति के प्रमुख उद्देश्य हैं- पर्यावरण संरक्षण और रखरखाव, प्राकृतिक विरासत का संरक्षण,भूमि के कटाव और मरूस्थल के विस्तार को रोकना। वन क्षेत्र के विकास में जन
सहभागिता।

भारतीय वन अधिनियम १९२७
यह अधिनियम वनों के प्रबंधन के लिए कानूनी ढाँचा प्रदान करता है। वर्तमान परिस्तिथियों को देखते हुए इसमें संशोधन की आवश्यकता है।

राष्ट्रीय वन आयोग
इसका गठन ७ फरवरी २००३ में हुआ। इसके कार्य हैं-वन और वन्य जीव क्षेत्र की समीक्षा,नागरिक आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु वन प्रशासन की वर्तमान स्थिति और वानिकी संस्थानों का परीक्षण,वन, वन्य जीव और जैव-विविधता संरक्षण के लिए अनुशंसा करना।

पर्यावरण,वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय,भारत की पर्यावरण और वानिकी सम्बंधी नीतियों और कार्यक्रमों के कार्यन्वयन नियोजन,संवर्धन,समन्वय और निगरानी के लिए केन्द्र सरकार के प्रशासनिक ढाँचे के अंतर्गत एक नोडल एजेंसी है।
इसका प्रमुख दायित्व वनों,वन्य जीवों और जैव-विविधता का संरक्षण,देश की नदियों और झीलों का संरक्षण है। इसके
अतिरिक्त इसका कार्य है-पशु कल्याण एवं प्रदूषण निवारण।

प्रतिपूरक वनीकरण निधि विधेयक
हाल ही में नरेन्द्र मोदी सरकार द्वारा यह विधेयक लाया गया है। प्रति पूरक वनीकरण निधि (सीएफ ) विधेयक वर्ष २०१६ के मानसूत्र सत्र में पारित हो गया है। इसमें प्रदूषण और वन पारितंत्र को हानि पहुँचाने की क्षतिपूर्ति के रूप में भुगतान लिया जाएगा। अर्थात प्रदूषण फैलाने वाले को इसकी कीमत चुकानी पड़ेगी। इस निधि का उपयोग पारितंत्र को पुर्नजीवित करने,उसका संवर्धन करने और सुदूर क्षेत्रों में रहने वाले वनाश्रित समुदायों के उन्नयन में किया जाएगा। सरकार का यह विधेयक स्वागत योग्य है। इससे जहाँ पर्यावरण को हानि पहुँचाने वालों को दण्ड मिलेगा,वहीं
आदिवासियों का कल्याण भी होगा।

सामाजिक वानिकी
यह कार्यक्रम सन् १९८० में प्रारम्भ हुआ। इसे छठी पंचवर्षीय योजना के २० सूत्रीय कार्यक्रम के सूत्र संख्या १२ में स्थान दिया गया। इसके अन्तर्गत तीन प्रमुख कार्यक्रम हैं-
# बंजर भूमि में मिश्रित बागान लगाना।
# विनष्ट वनों में पुनः वनारोपण।
# सुरक्षा पेटियाँ बनाना।
वास्तव में इस कार्यक्रम का उद्देश्य था वानिकी में जनसहभागिता और ग्रामीणों को सुगमता से लकड़ी उपलब्ध कराना। गोबर का उपयोग ईंधन के बजाय खाद के रूप में करना,रक्षित वनों में
पशुचारण रोकना। ऐसे पौधों का विकास जिनसे उपयोगी लकड़ी प्राप्त हो सके। सामाजिक वानिकी को तीन प्रमुख भागों में बाँटा जाता है-
# कृषि वानिकी-
इसके अन्तर्गत किसानों को प्रोत्साहित किया जाता है कि वे मुख्य फसल के साथ फलदार वृक्ष लगाएं। बागान लगाना,सब्जियाँ और औषधीय पादप लगाना कृषि वानिकी में शामिल
हैं।
# शहरी वानिकी-
शहरी वानिकी का उद्देश्य है-हर घर के दरवाजे पर छायादार वृक्ष। पार्कों में पेड़ लगाए जाएं। हरीतिमा पट्टिकाओं का विकास हो।
# ग्रामीण वानिकी-
इसके अन्तर्गत खाली पड़ी हुई बंजर भूमि पर वृक्षारोपण,सड़कों और रेलवे लाइनों के किनारे-किनारे वृक्ष लगाना और गाँवों में सामुदायिक भूमि और पंचायत भूमि पर वृक्षारोपण शामिल है।
सामाजिक वानिकी कार्यक्रम अपने उद्देश्य से भटक गया। इसके अन्तर्गत लगाए गए वृक्षों की लकड़ी का उपयोग औद्योगिक परियोजना में हुआ। इसका लाभ ग्रामीणों को नहीं मिल सका।

 पर्यावरण शिक्षा और जन सहभागिता-
सरकारी नीतियों,आयोगों और नए-नये विधेयकों के बावजूद हमारे वृक्षारोपण कार्यक्रम और पर्यावरण स्वच्छता अभियान असफल हो जाते हैं। भ्रष्टाचार हर जगह अपने पैर पसार चुका है। उच्च राजमार्ग बनते समय आँखों के सामने सैंकड़ों वृक्ष कट जाते हैं। उनके बदले में नए वृक्ष नहीं लगाए जाते या लगाए जाते हैं तो रख-रखाव के अभाव में नष्ट हो जाते हैं। जन-साधारण में पर्यावरण के प्रति जागरूकता ही नहीं है।
ताजा उदाहरण सामने है-शहर की कॉलोनी के बीच,छोटे से पार्क में स्थित ३-४ पेड़ों को कटवाकर लोग वहाँ सीमेंट टाइल्स लगवाकर कार पार्किंग बनवाना चाहते थे। क्षेत्र के जनप्रतिनिधियों ने भी इस कार्य में सहयोग दिया और पार्क की कच्ची जमीन पर टाइल्स लगा दी गई। बहुत विरोध करने पर पेड़ों को कटने से बचाया जा सका। पर्याप्त बड़ा घर होने के बावजूद लोग नए निर्माण के लिए घर के अहाते में स्थित पेड़ों को और घर के बाहर स्थित पेड़ को बेदर्दी से कटवा देते हैं। खाली पड़ी जमीन पर लोग पौधारोपण करने के बजाय कचरा डालकर वहाँ कचराघर बना देते हैं। अधिकांश भारतीय शहरों में कचरे के निस्तारण की समुचित व्यवस्था ही नहीं है। काला धुँआ उगलते वाहन सड़कों पर बखौफ दौड़ते हैं। लोग अपनी मर्जी से कहीं भी कचरा फैलाने के लिए स्वतंत्र हैं। बड़ा दुख होता है,पर्यावरण को हानि पहुँचाने वाले लोगों के लिए कोई दंड नहीं है।
आजकल शहरों में,कॉलोनियों में स्थित सड़कों के दोनों ओर स्थित कच्ची जगह (फुटपाथ) और घरों के सामने छूटी कच्ची जगह पर सीमेंटेड टाइल्स लगवाई जा रही हैं,तर्क यह है कि इनसे सड़क जल्दी नहीं उखड़ेगी परन्तु यह विचार किसी ने नहीं किया कि सब जगह कांक्रीट बिछ जाएगा तो भूमि में जल कैसे समाएगा ?
आज जन-साधारण में पर्यावरण के प्रति हृदय से जुड़ाव होना बहुत आवश्यक है। उच्च प्राथमिक एवं माघ्यमिक स्तर पर विज्ञान की पुस्तकों में पर्यावरण संरक्षण से सम्बधित २-३ अध्याय जोड़े गए
हैं। अध्यापकों को ये अध्याय यंत्रवत पढ़ाकर अपने कर्तव्य की इतिश्री नहीं करनी चाहिए। बालकों को भावनात्मक रूप से पर्यावरण से जोड़ना चाहिए। विद्यालय प्रांगण में उनसे पौधारोपण और उनकी देखभाल भी उनसे करवाएं। इन अध्यायों का अध्यापन तभी सार्थक होगा। छोटे बालकों में ही स्वच्छता की आदतें विकसित करें,उन्हें प्राकृतिक संसाधनों का महत्व समझाएं,तभी वे जिम्मेदार नागरिक बन सकेगें।
पर्यावरण से संबधित कानून कठोर होने चाहिए। प्रदूषण फैलाने वालों और पर्यावरण को किसी भी तरह क्षति पहुँचाने वालों को कठोर दंड मिलना चाहिए। याद रहे कि-
‘पेड़ जिंदा हैं,
तो हम जिंदा हैं।
तपती दुपहरी,
अम्बर से आग बरसी।
टुकड़ा भर छाया को,
आँखें तरसी।
उखड़ती साँसें,
सूखा हलक
कोई पेड़ नहीं,
दूर तलक।
सड़क किनारे,
बाँहें पसारे,
खड़ा वह वटवृक्ष,
याद आया बरबस।
अति पीड़ा से,
सूखी आँखें छलक गईं,
हुई निष्प्राण देह
पिघले डामर पर लुढ़क गई।
वटवृक्ष!
तुम्हारी हत्या पर शर्मिंदा हैं।
पेड़ हैं,तो हम जिंदा हैं॥’

परिचय-प्रज्ञा गौतम का उपनाम-वर्तिका है। इनकी जन्मतिथि १७ मई एवं जन्म स्थान-कोटा(राजस्थान)है। आपका बसेरा कोटा स्थित महावीर नगर में है। शिक्षा- एम.एस-सी.(वनस्पति विज्ञान)तथा बी.एड. है। प्रज्ञा गौतम का कार्य क्षेत्र-व्याख्याता(जीव विज्ञान) का है। सामाजिक गतिविधि में आप पर्यावरण चेतना का प्रसार करती रहती हैं। आपकी लेखन विधा-कविता,कहानी और आलेख है। पुस्तक प्रकाशन अभी प्रक्रिया में है। 
अनेक प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में कहानियां, कविताएं और लेख प्रकाशित हुए हैं। बात आपको मिले सम्मान की हो तो जिला स्तरीय सर्वश्रेष्ठ शिक्षक सम्मान- २००६ सहित काव्य विभूति सम्मान(महू) प्रमुख हैं। इधर उपलब्धि-दो वर्षीय अल्प काल में विज्ञान लेखिका के रुप में पहचान कायम होना है। प्रज्ञा जी की लेखनी का उद्देश्य-संदेशपरक एवं सार्थक लेखन करते रहना है। विशेषज्ञता विज्ञान कथा और बाल कथा लेखन में है। जीवन में प्रेरणा पुंज-पिता के.एम.गौतम तथा  गुरुजन सर्वश्री आर.सी. चित्तौड़ा, के.एम.भटनागर और पूर्व राष्ट्रपति- वैज्ञानिक डॉ. ए. पी.जे.अब्दुल कलाम हैं। स्वयं की अनेक रचनाओं में से ‘एक खेत की कहानी’ खुद को बहुत पसंद है।

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