पर्यावरण-शतक

बाबूलाल शर्मा
सिकंदरा(राजस्थान)
*************************************************

धरा गगन सब जग बना,पर्यावरण विकार।
मर्त्य कर्म अकर्म से,विपदा विविध प्रकारll

पर्यावरणन गंदगी,होय जगत में रोज।
बल विद्या कम हो रही,घटता जावे ओजll

पेड़ लगाने की प्रथा,चलती आई देश।
पर्यावरण सदा रहे,शोभित निर्मल वेशll

बड़े सयाने लोग हैं,पेड़ न मही लगाय।
गमले पौधे रोप कर,पर्यावरण बचायll

हरित हार हर गाँव में,पौधारोपण होय।
हरि हरिजन हर जीव भी,पर्यावरण सँजोयll

पर्यावरणन स्वच्छता,खोजत हैं सब लोग।
साफ स्वच्छ फैलाव के,सदा करें उपयोगll

डीजल-पैट्रोल से बना,पर्यावरण खराब।
गैस गंध ध्वनि कर रहे,उल्टे पड़े जवाबll

ईंधन सदा जलाय सब,चलें न कोई पांव।
पर्यावरण जो न रहे,शहर बचे नत गांवll

कहे सभी करते तनिक,पर्यावरणी बात।
सभी चेत जाएँ सखे,फिर कैसे हो घातll

पर्यावरण बचाव की,करते हैं सब बात।
काम करन के फेर में,सभी दिखावें जाll

पर्यावरण बचाव से,मानवता बचि जाय।
जीव जगत जंगम सभी,धरा धरा रहि जायll

पर्यावरण बचाइए,छोड़ भेद अरु बैर।
इसके बिन संसार में,नहीं किसी की खैरll

जीव शिकारी मारते,पेड़ काटि मक्कार।
पर्यावरण विनाश के,हैं ऐसे अय्यारll

पर्यावरण कैसे रहे,पेड़ रहे जो काट।
मानवता को भी सभी,यहां रहे हैं बांटll

नीर-धीर धीरज रखे,अभी मिटाता प्यास।
बचे नहीं पर्यावरण,फिर काहे करि आसl

पर्यावरण सँवार कर,राखो जग में नीर।
वरना इस संसार की,बदलेगी तसवीरll

घर का कचरा राह में,पथ में फैंके गंद।
समझ नहीं पर्यावरण,कैसे जन मतिमंदll

नित्य गंदगी बढ़ रही,कैसे लोगे सांस।
पर्यावरण सताय कर,कहां बचेगी आसll

चरागाह,जंगल सभी,कीन्हे मटिया मेट।
गंगे,गैया,गोमती,पर्यावरण चपेटll

जंगल को रक्षित करो,नहीं लगाना आग।
पर्यावरण के वास्ते,हे नर जल्दी जागll

धरती पर ही स्वर्ग है,पर्यावरण प्रकाश।
धानी साड़ी धरा की,हरियल धरा विकासll

पर्यावरणन धरा का,जो अच्छा हो जाय।
हरियाली के संग में,स्वर्गिक धरा कहायll

जगमग पर्यावरण हो,जगे जागृति विशेष।
कर्मठ जन चेतन करे,देश और परदेशll

सफल सहज सादर बने,पर्यावरणक योग।
कष्ट पीड़ जग की मिटे,बचे न कोई रोगll

प्रति मानव दो पेड़ हो,बने जगत संविधान।
साफ-सफाई स्वच्छता,पर्यावरण विधानll

पर्यावरण विधान को,जग में सदा सिखाय।
हरे पेड़ को काटकर,अच्छा समय न आयll

हम दो हमारे दो हो, तनय पेड़ प्रति साल।
पर्यावरण प्रबोधनी ,नीति नियम प्रतिपाल।।

पर्यावरणक नाम पर,कम से कम दो पेड़।
रोप करे हरियालियाँ,मत फितरत को छेड़ll

पालीथिन को बंद कर,कपड़े थैले लेय।
गाय धरा तटनी बचे,पर्यावरणन देयll

कचरा कम कर साधिये,स्वच्छ रखो घर-बार।
पर्यावरणन नाम पर,कर्म करो हर बारll

प्यासे कौवे की कथा,चल प्राचीने काल।
नर की अरु नल नीर की,पर्यावरणी चालll

जल का सदउपयोग हो,व्यर्थ न कोइ बहाव।
पर्यावरणक नाम में,नहि हो कभी रिसावll

आकाशी पर्यावरण,आभासी प्रतिबिम्ब।
यान विमान प्रतिबंधन,पावन पीपल निम्बll

पर्यावरण अमोल है,इसके बिना न कोय।
पेड़ों के संरक्षणन,कर ले सोइ उपायll

करके नग्न पहाड़ को,खनिज किए महिभाग।
बारूदी पर्यावरण,हर तन-मन हिय आगll

धरती जल पर्यावरण,स्वच्छ जगत में होय।
तन-मन-धन सब पाक़ हो,नरतन कभी न रोयll

संभव होय सँवार ले,बिगड़ गए जो काज।
पर्यावरणी सोच ले,समझे राज समाजll

पर्यावरण सँवाार के,होवत हर दिन काम।
पर्यावरण बिगाड़ के,जग है आठों यामll

नाम करे वे और ही,काम करे वे और।
पर्यावरणी नाम पर,माल बटोरे चोरll

पर्यावरण जगाव के,जग में हैं कई लोग।
इसी नाम पे चलत है,जग में कई उद्योगll

ईश देव दातार हैं,देते हर वरदान।
पर्यावरण विकास हित,सबै निभावे मानll

हरियाली में होत है,पर्यावरण कमान।
ईश्वर से इंसान को,मिला अमिट वरदानll

जीवन जीते वनज भी,अप्रतिम उपहार।
पर्यावरण सँवारते,करते भल उपकारll

जग में जीवन जीव का,पर्यावरण अधार।
अन्न नीर ईंधन पवन,धन देवत भरमारll

मरे साँप को कंठ में,क्यों कर डाले कोय।
विपदा पर्यावरण की,साँप छछोंदर होयll

पर्यावरणन सम्पदा,सदा जगत में आय।
पर्यावरण बिगाड़ जग,विपदा गले लगायll

मानव कृत आपद बड़ी,धरती पर जो होय।
पर्यावरणन हानि पर,नौ नौ आँसव रोयll

पर्यावरणक कोप से,कोई नहि बच पाय।
प्रलय भयंकर क्यों चहे,धरती काय नसायll

मनवा सोच विचार ले,कर्म फर्ज सत कर्म।
पर्यावरणन हित करें,सदा निभाएँ धर्मll

अब भी मर्त्य सँवार ले,जग में अपना कर्म।
पैरों पर आरी चले,पर्यावरणन शर्मll

पर्यावरण सँवारिये,सब मिल मानव जात।
वरना सबको ही मिले,तन-मन के आघातll

पर्यावरण स्वच्छ रहे,तन-मन और विचार।
सत संयम प्राणी जगत,बरते सद आचारll

पेड़ धरा पर घने हो,पर्यावरण प्रचार।
नदी नाव ज्यों ही रहे,जंगल जन आधारll

पर्यावरण की सोच लें,पेड़ लगे घर-बार।
बिना पेड़ खाली धरा,जंगल देहरि द्वार॥

धानी वस्त्र धरा के,पर्यावरण बखान।
तभी ईश मंदिर भले,तभी भले हि अजान॥

पेट्रोल बढ़ती खपत,बिजली खपती और।
जलि कोयले रसायनी,पर्यावरण न ठौर॥

जल-जंगल सीमित रहे,कंक्रीटन के जाल।
जंगम जीव जगत में,पर्यावरण निढाल॥

जनसंख्या नित बढ़ रही,संसाधन कम जोरि।
अतिदोहन की वजह से,पर्यावरण मरोरि॥

अतिदोहन,जल का किए,जल स्तर घट जाय
पर्यावरण हानि करे,कहीं बाढ़ आ जाय॥

वर्षा की असमानता,पिछड़े खेत किसान।
गँदला पर्यावरण हो,पथ भटके इंसान॥

बांध बनाकर सरित को,रोक बहाव अपार।
संकट पर्यावरण के,आमंत्रित करि यार॥

तापमान धरती बढ़े,बर्फ पिघलती जाय।
खतरे पर्यावरण है,जल सागर बढ़ि आय॥

जीव वन्य जंगल विकल,वनस्पति भी जान।
पर्यावरणी चेतना,अब तो नर पहचान॥

नीम खेजड़ी पीपली,बरगद शीशम आम।
दो तरफा हित लाभ है,पर्यावरण सकाम॥

हाथी शेर हिरण सब,है जंगल की शान।
पर्यावरण संरक्षण,मान सके तो मान॥

रेगिस्तानी जहाज है,राजस्थानी ऊँट।
पर्यावरणी जीव है,मिटता है रण रूट॥

खतरनाक गैसें बनी,त्रासदि तब भोपाल।
अब तक जहरीला असर,पर्यावरण बिहाल॥

पेड़ लगा लें हम सभी,सौ-सौ अपने हाथ।
पर्यावरण रक्षक बन,रहें धरा तन साथ॥

पालन-पोषण पेड़ का,करिए तनय समान।
पर्यावरण मीत बने,पेड़ तनय अरमान॥

गौ सेवा गोरस मिले,पंचगव्य भी साथ।
पर्यावरण सँवार लो,पुण्य हाथ के हाथ॥

धरा स्वरक्षा राखिए,पर्यावरण प्रचार।
प्राक्रत जीवन वनस्पति,रखिए सभी प्रकार॥

संगत पर्यावरण हो,जीव और निरजीव।
पपिहा,कोयल मोर भी,सभी पियारे पीव॥

हर घर में बगिया खिले,स्वच्छ आचरण धार।
पर्यावरण बचा रहे,तब ही जीवन सार॥

खान-पान ईमान हो,सत मन सत आचार।
पर्यावरणी सोच हो,होवे बेड़ा पार॥

सड़क शहर विकास में,मत कर पेड़ विनाश।
तिगने पेड़ लगाइए,पर्यावरण प्रकाश॥

धरा गंदगी हो रही,संगत जल थल होय।
पर्यावरण विचारिए,तभी सृजन नव होय॥

जल पवन गंदे हुए,मृदा गंदगी जाग।
पर्यावरण चेतन रखो,पीछे क्यों कर भाग॥

पेड़ काट पापी बने,वृक्ष लगाय महान।
पर्यावरण सँभाल ले,धरा न कर शमशान॥

अनावृष्टि अतिवृष्टि भी,इंसानी करामात।
पर्यावरण बिगाड़ के,विपदा लई अभाँत॥

पेड़ सरीखे मीत नहि,जे समझे मन माहि।
पर्यावरण सँवारते,रीत-प्रीत दे ताहि॥

खेजड़ली के हित दिए,प्राण अनेक स्वजान।
पर्यावरणन वीर जन,उनका करते मान॥

गैस हवा को कम करो,साफ नगर देहात।
पर्यावरण हित चेतना,करो सभी सन बात॥

गंगा गौ गिरि राखिए,पर्यावरण सभाँति।
गंद गदल गैसें करी,इनसे भली न भाँति॥

सागर सरिता शैल से,रखो रीत की प्रीत।
पर्यावरण संरक्षण,हित यह सच्चे मीत॥

खेत किसानी काम में,देशी खाद उपाय।
रसायनिक मत काम लो,पर्यावरण बचाय॥

बिजली डीजल के करो,सीमित ही उपभोग।
पर्यावरण बचा रहे,सही जोग-संजोग॥

कदम-कदम पर पेड़ हो,पंछी कलरव गान।
चहक उठे पर्यावरण,बनी रहे महि शान॥

गंदे नाले शहर के,झीलों तक न जाय।
जल स्रोतों को साफ रख,पर्यावरण बचाय॥

बचे परत ओजोन तो,धरती पर समताप।
पर्यावरण हित में रहे,यज्ञ हवन नित जाप॥

गाड़ी मोटर कार का,कम कर ले उपयोग।
पर्यावरणी सोच हो,योग करे निःरोग॥

पर्यावरण सँभालिए,सागर नदी सँभारि।
गौचारण हित महि रहे,जंगल वनज उबारि॥

गिद्ध चील है लापता,गायब चीता शेर।
पर्यावरण संकट बने,मोर गोड़वण ढेर॥

कचरे पालीथिन से,धरती गाय बचाव।
पर्यावरण बना रहे,स्वच्छ नीति अपनाव॥

घर बया के नष्ट है,विकिरण का आघात।
मदमक्खी भी कम हुई,पर्यावरण थकात॥

झीलों की नगरी बड़ी,उदयपोर की बात।
पर्यावरण सचेत से,देश विदेशों ख्यात॥

बड़ पीपल है देवता,पाल तनय की भाँति।
प्रहरी पर्यावरण के,लम्बी वय तरु जाति॥

जल जंगल जग में रहे,जंगम जीव हमेश।
पर्यावरण बचाव हित,करो उपाय विशेष॥

वन्य वनज वन में रहे,उनको मत कर हानि।
पर्यावरणन हित करे,वर्षा हवा प्रमानि॥

साफ-सफाई संयमी,तन-मन घर के पास।
पर्यावरण स्वच्छ रहे,श्वाँस-श्वाँस की आस॥

पंचवटी त्रेता कहे,द्वापर कदम करील।
‘बाबू’ पर्यावरण को,खोजें छाया चील॥

परिचय : बाबूलाल शर्मा का साहित्यिक उपनाम-बौहरा हैl आपकी जन्मतिथि-१ मई १९६९ तथा जन्म स्थान-सिकन्दरा (दौसा) हैl वर्तमान में सिकन्दरा में ही आपका आशियाना हैl राजस्थान राज्य के सिकन्दरा शहर से रिश्ता रखने वाले श्री शर्मा की शिक्षा-एम.ए. और बी.एड. हैl आपका कार्यक्षेत्र-अध्यापन(राजकीय सेवा) का हैl सामाजिक क्षेत्र में आप `बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ` अभियान एवं सामाजिक सुधार के लिए सक्रिय रहते हैंl लेखन विधा में कविता,कहानी तथा उपन्यास लिखते हैंl शिक्षा एवं साक्षरता के क्षेत्र में आपको पुरस्कृत किया गया हैl आपकी नजर में लेखन का उद्देश्य-विद्यार्थी-बेटियों के हितार्थ,हिन्दी सेवा एवं स्वान्तः सुखायः हैl

Hits: 7

आपकी प्रतिक्रिया दें.