पर्वत

ओम अग्रवाल ‘बबुआ’
मुंबई(महाराष्ट्र)
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जिसे चाँद की आभा से,अभिषेक कराया जाता हो,
और दिवाकर प्रथम किरण का,जिसको तिलक लगाता हो।
पाहन की है काया जिसकी,हिम से ढकी शिलाएँ हों,
और उसी से निकली सारी,नदियों की धाराएँ हों॥
जिन पर्वत के नेह स्नेह का,जीवन सहज पिपासु हो,
नदियों की धाराएं जिसके,नेह नयन का आँसू हो।
पंछी के कलरव भी जिसका,सत्य सदा गुणगान करें,
और धरा का कण-कण सारा,जिस पर सत्य गुमान करे॥
महादेव की तपोभूमि है,पुण्य धरोहर अम्बे की,
शरणागत की शरणगाह ये,थाती है जगदम्बे की।
पर्वत का हर शिखर धरा का,ताज कहाया जाता है,
छिपा हुआ जीवन का इनमें,राज बताया जाता है॥
विषयवस्तु है जाने कितने,वेद पुराणों ग्रंथों की,
सत्य साधना की वेदी ये,साधु संत-महंतों की।
पुण्य धरा पर कुदरत की इस,पुण्य धरोहर को देखो,
देख सको तो मानस के तुम,मानसरोवर को देखो॥
खड़ा सजग प्रहरी के जैसा,रक्षक है रखवाला है,
शाँत भाव से खड़ा है जिसका,दर्शन भोला भाला है।
आओ अपना मन मंथन हम,आज इसी के नाम करें,
और लेखनी से गिरिकुल को,आओ सत्य प्रणाम करें॥
परिचय-ओमप्रकाश अग्रवाल का साहित्यिक उपनाम ‘बबुआ’ है।आप लगभग सभी विधाओं (गीत, ग़ज़ल, दोहा, चौपाई, छंद आदि) में लिखते हैं,परन्तु काव्य सृजन के साहित्यिक व्याकरण की न कभी औपचारिक शिक्षा ली,न ही मात्रा विधान आदि का तकनीकी ज्ञान है।आप वर्तमान में मुंबई में स्थाई रूप से सपरिवार निवासरत हैं ,पर बैंगलोर  में भी  निवास है। आप संस्कार,परम्परा और मानवीय मूल्यों के प्रति सजग व आस्थावान तथा देश-धरा से अपने प्राणों से ज्यादा प्यार है। आपका मूल तो राजस्थान का झूंझनू जिला और मारवाड़ी वैश्य है,परन्तु लगभग ७० वर्ष पूर्व परिवार उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले में आकर बस गया था। आपका जन्म १ जुलाई को १९६२ में प्रतापगढ़ में और शिक्षा दीक्षा-बी.कॉम.भी वहीं हुई है। आप ४० वर्ष से सतत लिख रहे हैं।काव्य आपका शौक है,पेशा नहीं,इसलिए यदा-कदा ही कवि मित्रों के विशेष अनुरोध पर मंचों पर जाते हैं। लगभग २००० से अधिक रचनाएं आपने लिखी होंगी,जिसमें से लगभग ७०० का शीघ्र ही पाँच खण्डों मे प्रकाशन होगा। स्थानीय स्तर पर आप कई बार सम्मानित और पुरस्कृत होते रहे हैं। आप आजीविका की दृष्टि से बैंगलोर की निजी बड़ी कम्पनी में विपणन प्रबंधक (वरिष्ठ) के पद पर कार्यरत हैं। कर्नाटक राज्य के बैंगलोर निवासी श्री  अग्रवाल की रचनाएं प्रायः पत्र-पत्रिकाओं और काव्य पुस्तकों में  प्रकाशित होती रहती हैं। आपकी लेखनी का उद्देश्य-जनचेतना है।     

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