पिता का इन्तजार

सुजीत कुमार 
गढ़वा(झारखंड)
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‘खत्म हो गई थी स्याही तेरी तकदीर लिखने को,
तेरे हिस्से में ताउम्र के लिए बस इन्तजार लिख दिया।’

मेरा घर शहर से दूर एक गांव में है। मैं अपने माँ और दादाजी के साथ रहता हूँ। मेरे पापा भी हैं,पर वो हमारे साथ नहीं रहते। माँ कहती हैं कि वो फौज में काम करते हैं,पर ऐसा भी क्या काम है जो वो कभी घर नहीं आते। मैं ६ साल का हो गया हूँ और अब शाला भी जाने लगा हूँ। शाला में मेरे कई सारे दोस्त भी बन गए
हैं और उन सबके पापा अपनी गाड़ी से उन्हें छोड़ने आते हैं पर मैं शाला बस से आता हूँ। मुझे मेरी माँ भी छोड़ने नहीं आती,वो हमेशा घर या खेतों के काम में व्यस्त होती हैं। मेरे दादाजी को दिखाई नहीं देता,तो उनकी देखभाल भी वही करती हैं। हमारा घर खेतों के बीच में है। घर के चारों ओर हरियाली ही हरियाली है। उन खेतों में अधिकांश खेत हमारे हैं, जो दादाजी ने लिए थे। माँ अकेले उन खेतों की बुआई करती है। घर के पास बहुत सारे पेड़ भी हैं,जिनमें बरगद, आम,केला और नीम्बू भी है। दादाजी हमेशा बरगद के पेड़ के पास खाट लगाकर सोते हैं। केले के पेड़ के पास एक कुआं भी है,जिसके पानी से खेतों की सिंचाई होती है। हमारे घर में गाय भी है। उसके गोबर के कोपले अक्सर घर की दिवार पर होते थे। माँ इतने सारे काम करके थक जाती थी,वो हमें प्यार भी नहीं कर पाती थी। हमें हर शाम पापा की बहुत याद आती थी। मैं हर शाम घर की छत पर चढ़ जाता तथा चारों ओर फैली खेतों की हरियाली को देखता। हमारे घर से एक पगडंडी खेतों के बीच होती
हुई सामने के हाई-वे से मिलती थी। उस हाई-वे से बहुत-सी गाड़ियां शहर जाती और शाम को उसमें से बहुत लौट आती थी। मैं उनको आता-जाता देखता और घंटों देखता,जब तक मां या दादा जी बुला नहीं लेते। मैं सोचता,मेरे पापा भी इन गाड़ियों की तरह लौट आएंगे। मैं रात को अपने पापा का पदक गले में पहनकर सोता। मेरी माँ मेरी हालत को अच्छी तरह समझती थी,वो बस प्यार से हमारे सर पर हाथ फेर देती।
वो कहती-‘अबकी दिवाली तुम्हारे पापा को छुट्टी मिलेगी तो जरुर घर आएंगे।’
‘आप तो हर बार यही कहती हैं,पर पापा कभी घर नहीं आते।’
‘तुम्हारे पापा बहुत बड़ा काम करते हैं, उन्हें फुरसत नहीं मिलती।’
मैंने पूछा-‘राहुल के पापा से भी बड़ा काम ? उनसे मिलने के लिए तो लोगों की लाईन लगी होती है,वो तो यहाँ के विधायक हैं। उनके पास बहुत गाड़ियां भी है। राहुल रोज नई गाड़ी से शाला जाता है। उसके तो बहुत सारे दोस्त भी हैं।’
‘तुम्हारे पापा उनसे भी बड़ा काम करते हैं। इस देश के हर इंसान को तुम्हारे पापा की जरूरत पड़ती है। तुम और तुम्हारा राहुल शाला जाते हो और लौटते हो तो पापा की वजह से।’
‘सच में…. तो हमारे पास भी गाड़ी क्यों नहीं है ?’
‘है न,पापा उससे काम पर गए हैं। आएंगे तो लेते आएंगे।
मैं जब भी सोने की कोशिश करता तो मेरी मिटती यादों से एक धुंधली छाया मेरे पापा की आने लगती। लगता,वो मुझे गोद में लेकर झुला रहे हैं,प्यार कर रहे हैं। मैं दौड़ रहा हूँ,वो मुझे पकड़ने की कोशिश कर रहे हैं। मैं हंस रहा हूँ,वो मुझे पकड़ नहीं पा रहे हैं। कितनी खूबसूरत यादें थी मेरी पापा के साथ,वो दोबारा कब आएंगे। त्योहारों में सबके पापा साथ होते थे। मैं भी पापा के आने का इन्तजार करता। जब बाहर किसी गाड़ी की आवाज आती,मैं दौड़कर बाहर आ जाता । मुझे लगता मेरे पापा आए हैं,पर वो कोई ओर होते। मैं उदास हो जाता,मेरे चेहरे पर रोने का भाव आ जाता,मैं अन्दर ही अन्दर घुटन महसूस करता। मेरी ये हालत देख माँ मुझे गले से लगा लेती। उनकी आखों में आंसू आ जाते,पर वो हमेशा छुपाकर उन आँसूओं को पोंछ लेती।
आज दिवाली थी,पूरे गांव में दिवाली मनाने की तैयारी चल रही थी। मैं और माँ दरवाजे पर बैठे थे,तभी डाकिया चिट्ठी लेकर आया। उसे पढ़कर मां रोने लगी, मुझे समझ नहीं आ रहा था क्या हुआ। उसमें लिखा था-पत्थरबाजों के आक्रोश में दो जवान शहीद। उनमें से एक मेरे पापा का नाम था।
ये बात धीरे-धीरे गांव में फैल गई। लोग मां को देखने आने लगे,कुछ ही देर में भीड़ लग गई,ये सब देख मैं भी रोने लगा।
पाप का शव सेना की गाड़ी से शाम को घर आया। साथ में पूरी पलटन थी। पूरे गाजे-बाजे के साथ उन्हें बन्दूकों की सलामी दी गई। धूमधाम से उनकी शव यात्रा निकाली गई। मेरी मां का रो-रोकर बुरा हाल था। मां को देख मेरी भी हालत खराब हो रही थी,पर हम इतने भी बड़े नहीं थे जो समझ आती। मुझे तो ये सब त्योहार जैसा लग रहा था। पूरा गांव शोकाकुल था। मैंने इन्हीं नन्हें हाथों से पिता को अग्नि दी थी।
पिता को गुजरे कुछ दिन हो गए थे। मां की हालत सुधर रही थी,पर वो हमेशा गुमसुम रहती थी,हमसे भी बात नहीं करती थी।
आज मैं पापा की तस्वार देख रहा था, पास पड़े पदक को उठाकर पहन लिया और खुद को आईने में देखकर बोला-मां मैं भी पापा की तरह बड़ा आदमी बनूंगा।
मां जोर से चीखकर बोली नहीं….’तू चोर- डकैत कुछ भी बन जाना,पर पापा की तरह कभी मत बनना…’ और उन्होंने गले का पदक उतारकर दूर फेंक दिया।
वो मुझे गले लगाकर रोने लगी,बोली-‘बेटा इन सत्ताधारी भेड़ियों ने सत्ता के लालच में तुम्हारे पिताजी को मरवा दिया। पूरे देश की रक्षा करने वाले तुम्हारे पिता इतने भी कमजोर नहीं थे,जो खुद की रक्षा न कर सके। उन्हें गोली तो दी,पर उन कुत्तों पर गोली चलाने की इजाजत नहीं दी। अपनी जान बचाने के लिए उन पर गोली चलाना कैसे मानवाधिकार का हनन हो रहा था,और खुद की जान गंवाने से कौन-सी रक्षा हो। कोई मां कलेजे के टुकड़े को,कोई पत्नी अपने सुहाग को फोकट में मरने को नहीं भेजती…’ आंसू पोंछते हुए बोली-तू पढ़-लिखकर बड़ा आदमी बनेगा,पर पापा जैसा नहीं बनेगा। हम तुम्हें पढा़ने शहर लेकर जाएंगे’..,वो मेरे गालों से आंसू पोंछ रही थी। उनकी आवाज में पति के खोने के दुख से ज्यादा बेटे के खो जाने का डर था।
मैंने पापा की तस्वीर की ओर देखा,मेरे अन्दर एक खामोशी-सी छा गई थी..अन्दर से आवाज निकली-मैं आपको प्यार करता हूँ पापा…मुझे आप पर गर्व है।

परिचय-सुजीत कुमार की उम्र करीब १८ वर्ष है। इनका बसेरा झारखंड राज्य के गढ़वा में है। कला विषय में स्नातक तक शिक्षित सुजीत कुमार की लेखन विधा- कविता,कहानी,लघुकथा,उपन्यास,निबंध, संस्मरण इत्यादि है। कुछ वेबसाईट पर आपकी रचनाओं का प्रकाशन हुआ है। ब्लॉग और सोशल मीडिया पर भी लिखते रहते हैं।

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