प्यासी धरती

राजेश गुप्ता ‘बादल’
मुरैना (मध्यप्रदेश)

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बूँद-बूँद को तरसता,ले व्याकुलता नयन।

श्वांस अटकती हलक में,सयन कहाँ है नयन॥

है आराम कहाँ तन-मन को,

जल बिन तरस रहे जीवन को।

कण-कण का जो लाले पड़ते,

कैसे कृषक उदर को भरते।

प्यासी धरती विकल है,जल बिन निष्प्राण।

मेघ सारे विलुप्त हैं,दांव लगी अब जान॥

है जो शब्द व्योम नीःरव हुआ,

उठता धरती छाती धुआँ।

तरसा रहे जलज पहर-पहर,

दिखे धरा तन-मन चिरा हुआ।

नव पल्लव उपजे नहीं,तरु उजड़े हैं पात।

शुष्क मृदा सारी भई,नर ये तेरे घात॥

हरे-भरे तरु भी विकल रहें,

कब आ जाए हमारी बार।

क्षण-क्षण बढ़ता क्रोध सूर का,

क्यूँ जान बूझ ले रहा रार।

सूख गई सरिता सभी,निर्झर प्राणविहीन।

तपे दोपहर फूस की,हुआ बसंत मलीन॥

झरने भी प्यासे-प्यासे हैं,

नदियाँ माँग रहीं प्राण दान।

क्रोधित हो जलधि उबलता है,

बिरवा माँग रहे अभयदान।

है उदर ये धँसा-धँसा,गुड़गुड़ा रही आँत।

अब जो बरखा न भई,कैसे पाऊँ शांत॥

कैसे पाऊँ शांत,अब शेष बस मरना है।

आ भी जाओ मेघ,प्यासी धरा सपना है॥

कहता बादल कवि,वृक्ष बिन जल कल्पना है।

जल बिना कहाँ खेत,तुझे भूखे चलना है॥

परिचय-राजेश कुमार गुप्ता का साहित्यिक नाम `बादल` है। इनकी जन्म तारीख-१९ मार्च १९७६ हैlआपका जन्म स्थान-गाँव जावरौल, सबलगढ़ (जिला मुरैना म.प्र.)है। आप वर्तमान में कोटा (राजस्थान) में बसे हुए हैं,जबकि स्थाई पता मुरैना ही है। गणित से स्नातक श्री गुप्ता का कार्यक्षेत्र बांरा (राज.)में निजी संस्थान में गुणवत्ता अधिकारी का है। आपकी लेखन विधा-दोहा,चौपाई, रोला,ग़ज़ल तथा मुक्तक एवं मुख्यतः स्वतंत्र विधा है। इनके लेखन का उद्देश्य- सामाजिक,राजनीतिक,पर्यावरण हितार्थ एवं आत्मिक संतुष्टि का है। आपके लिए प्रेरणा पुंज-सर्वश्री आदित्य शिवपुरी,राजवीर ‘भारती’,अखलेश सिंह ‘गैव’ एवं मदन मोहन ‘सजल’ हैं। इनकी विशेषज्ञता दोहा,रोला,चौपाई ,कुण्डली एवं स्वतंत्र विधा में है।

 

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