प्रकृति देवी

नवल पाल प्रभाकर
झज्जर(हरियाणा)
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यूं ना अश्रु बहाओ
     मन में तुम धीर धरो,
          जा रहा हूं हे प्रकृति देवी
               हंसकर मुझे तुम विदा करो।
ये पहाड़ों की ऊंची चोटियां
     नीचे गहरी इनके घाटियां,
          होता निश्छल स्पंदन-सा
                दिखाई देती अश्रुधारा।
माता इन्हें तुम रोको
     जा रहा हूं ऐसे ना टोको,
          जा रहा हूं हे प्रकृति देवी
               हंसकर मुझे तुम विदा करो।
पेड़़ वृक्ष और पौधे सारे
     लगते हैं आवास हमारे,
          पहुंचो रणधीर नदी किनारे
               देंगे तुम्हें हम उपहार।
अश्रु रूपी जल के धारे
     जुदाई का गम हमें ना दो,
          जा रहा हूं हे प्रकृति  देवी
              हंसकर मुझे तुम विदा करोll
परिचय : विविध लेखन के अनुभवी नवल पाल प्रभाकर का निवास  हरियाणा राज्य के जिला झज्जर में है। साहित्यिक उपनाम ‘दिनकर’ है। आपकी  शिक्षा एम.ए.(हिन्दी) व बी.एड.है। आप हिन्दी सहित अंग्रेजी,उर्दू भाषा का भी ज्ञान रखते हैं। हैं। श्री पाल की प्रकाशित पुस्तकों में मुख्य रुप से यादें, उजला सवेरा, नारी की व्यथा (तीनों काव्य संग्रह),कुमुदिनी और वतन की ओर वापसी (दोनों कहानी संग्रह)आदि हैं। साथ ही ऑनलाईन पुस्तकें (हिन्दी का छायावादी युगीन काव्य, गौतम की कथा आदि)भी प्रक्रिया में हैं। कई भारतीय समाचार पत्रों के साथ ही विदेशी पत्रिकाओं में भी आपकी रचनाएँ प्रकाशित हैं। सम्मान व पुरस्कार के रुप में प्रज्ञा साहित्य मंच(रोहतक), हिन्दी अकादमी (दिल्ली) तथा अन्य मंचों द्वारा भी आप सम्मानित हुए हैं। श्री प्रभाकर की जन्मतिथि-३ जनवरी १९८५ एवं जन्म स्थान-साल्हावास शहर है। आपका स्थाई पता भी साल्हावास (राज्य-हरियाणा)ही है। आपकी लेखनी का उद्देश्य हिन्दी लेखन में नवोदित प्रतिभाओं को पल्लवित-पुष्पित करना है। आप ऑनलाइन साहित्यिक मंचों  में भी सक्रिय होकर नवोदितों को सहयोग करते हैं। 

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