प्रतिभा प्रसाद की बोलती लेखनी

अवधेश कुमार ‘अवध’
मेघालय
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पुस्तक समीक्षा…………………………………. 
झारखंड न सिर्फ खनिज सम्पदा सम्पन्न राज्य है,बल्कि साहित्य जगत को भी कई अनमोल गद्य व काव्य विधाओं का सशक्त हस्ताक्षर दिए हैं। इनमें हाल-फिलहाल एक और नाम जोड़ लेना चाहिए,वह है श्रीमती प्रतिभा प्रसाद हां। हाँ जी,कहानी की सीढ़ियों पर चढ़ते हुए कविता को छू लेने की असीम ललक इस ६५ वर्षीया कलमकारा में कूट-कूटकर भरी है।
सन् २००३ में दस कहानियों को लेकर ‘आखिर एक दिन’ कहानी संग्रह के साथ इन्होंने साहित्य के प्रांगण में अंगद पाँव जमाया,जो लगातार शक्तिशाली होता जा रहा है। सन् २००८ में उनसठ कविताओं का संग्रह ‘झंकार’ एवं सन् २०१७ में छब्बीस कहानियों का संग्रह ‘क्यूँ क्षमा नहीं किया’ का लोकार्पण हुआ।


कहानी मानव जीवन के विकास के समानान्तर चलती रही है, जिसमें समय-समय पर आमूल-चूल परिवर्तन भी हुए,पर अस्तित्व की अहमियत आज भी कायम है। भौतिकता से ग्रसित समाज में बाल सुलभ आकांक्षाओं एवं जिज्ञासाओं को जीवन्त करती हैं प्रतिभा प्रसाद। इनकी कहानियों के पात्र हमारे बीच पाए जाते हैं। गिरते जीवन मूल्य,जीवन की अंधाधुंध दौड़ में असहज परिवेश की कठोर चुनौतियाँ और जीवन को सहज व आनंददायक बनाने के पल-पल प्रयास को लेखिका ने विषय वस्तु बनाया है। ‘आखिर एक दिन’ में आतंकवाद की मार्मिक परिणिति की सजीवता पाठक को बाँधे रहती है,किन्तु बिन जरूरत का विस्तार बोझिल-सा है,जबकि ‘छोटी-सी भूल’ में अंध समर्थन द्वारा दाम्पत्य का बिखराव तथा ‘दुस्साहस’ में नारी के क्रांतिकारी कदम की सराहना है। दहेज की वीभत्स समस्या के बीच ‘रिश्ता’ ने नव आशा का संचार किया,तो ‘केंकड़े’ ने दवा उद्योग के घिनौने रूप से रूबरू कराया। ‘बिन्नी’ पारिवारिक विघटन की दास्तान है और ‘मैनेजर बाबू’ विकास के लिए पथ प्रदर्शक है। ‘बचपन’ कहानी में लेखिका ने गरीबी के मध्य ज्ञान और कर्म की विसंगति को बताने में सफलता पाई है।
दिवंगत सुपुत्र निशिकर निशि को समर्पित ‘झंकार’ काव्य संग्रह में कवियित्री के ऊपर लेखिका का प्रभाव देखा जा सकता है। जीवन की छोटी-छोटी घटनाओं एवं अवस्थाओं को अतुकान्त कविता के कलेवर में उतारने का इनका उल्लेखनीय प्रयास है। ‘कुलवधू’ कविता की कुछ पंक्तियाँ देखी जा सकती हैं-
`जो कर देती है इससे विद्रोह
कहलाती है कुल कलंकिनी,
मर्यादाओं को तोड़ती,
पथभ्रष्टा,मनमौजी,
परिवार और पति से तिरस्कृत
अपने भाग्य को रोती`l
कवियित्री श्रीमती प्रसाद की ‘सच’ कविता एक नई मनोविश्लेषक सच्चाई से रूबरू कराती है। आइए देखते हैं-
`तुमने आँखें फेर ली
मुझे देखकर,
मैं आश्वस्त हुई
यह जानकर,
कि तुममें ताकत ही नहीं
सच की आँच को सहने की`!
अपने बच्चों को समर्पित कहानी संग्रह `क्यूँ क्षमा नहीं किया` लेखिका को आज की अग्रणी लेखिकाओं की श्रेणी में लाकर स्थापित करता है। `दर्द` में नवयौवना संजना महेश और निलय नामक दो युवकों के दिलों की धड़कन है। देशभक्ति,कर्त्तव्य और प्यार की कश्मकश में लेखिका ने बड़ी चतुराई से तीनों को विजयी बना दिया। बेरोजगारी की मार झेलती नव पीढ़ी अपनी मौलिक आवश्यकताओं को भी पूरा नहीं कर पाती,नतीजतन बाहर की अपेक्षा जेल में रहना उसे पसंद है,क्योंकि जेलों में खाना,कपड़ा और छत तो उपलब्ध है,ऐसा स्पष्ट होता है `हत्यारा` में। `वापसी` कहानी कुसंगत में पड़कर घर से भागे एक बच्चे के चारों ओर घूमती है,जो कभी एक पल के लिए भी घर को भुला नहीं पाता है। इस संकलन में हास्य,व्यंग्य और दर्द को उकेरती कहानियाँ भी हैं।
साहित्य में कालजयी होने के लिए सामाजिक सरोकार एवं समय की पहचान जरूरी है,जिसके द्वारा लेखनी कुछ ऐसा लिख सके जिसमें सबको अपने होने का आभास हो। पात्रों में हम स्वयं को देख सकें। कथोपकथन या वार्तालाप पात्रों के परिवेश तथा चरित्र के अनुरूप हो। प्रवाह,लगाव एवं जिज्ञासा बनी रहे। इस लेखिका-कवियित्री ने बहुत ही सजगता व सूझ-बूझ से इन कारकों को समझा है और जीया भी है। जीवन में बढ़ती सुविधाओं एवं उनसे सम्बंधित उपकरणों के नकारात्मक पक्षों के प्रति भी यह लेखिका सजग है।
निशिकर प्रकाशन(झारखंड) द्वारा क्रमश: `आखिर एक दिन` और `झंकार` प्रकाशित हैं,जबकि दिशा इंटरनेशनल पब्लिशिंग हाउस(दिल्ली) से `क्यूँ क्षमा नहीं किया` प्रकाशित है। हास्य, संवेदना और सीख से समृद्ध इस रचनाकार का अपना पाठक वर्ग है जो हर अगली रचना के साथ बढ़ता जाता है। जटिल जीवन के समयाभाव में लघुकथाओं ने कहानियों को पाठकों से दूर करने का काम किया है। क्षणिकाओं,मुक्तकों एवं गज़लों ने अच्छी कविताओं पर प्रहार किया है,लेकिन फिर भी प्रतिभा ने प्रतिभा का लोहा मनवाया है। कविताओं में शिल्प कमजोर है,काव्य सौन्दर्य फीका है,छंदबद्ध कविता न के बराबर है एवं विषयवस्तु के चयन एवं सृजन में कवियित्री के नएपन का बोध होता है,जो आने वाले समय में नींव की ईंट बनेगा। इसके विपरीत कहानी लेखन में लेखिका ने नएपन को सिरे से खारिज कर दिया है। यह मानना कठिन हो जाता है कि,लेखिका ने अभी तक मात्र तीन दर्जन कहानियाँ लिखी है। अब तक प्रकाशित ये तीनों संग्रह पाठकों के सिद्ध हाथों में हैं,और पूर्ण विश्वास के साथ कह सकता हूँ कि पाठकों की अभिरुचि एवं अपेक्षा के अनुरूप जल्द ही अगली पुस्तक साहित्य प्रेमियों एवं मनीषियों के प्रेम से पुलकित होगी और आल्हादित होंगे हम इस बहुमुखी प्रतिभा सम्पन्न प्रतिभा प्रसाद को पाकर।

परिचय-अवधेश कुमार विक्रम शाह का साहित्यिक नाम ‘अवध’ है। आपका स्थाई पता मैढ़ी,चन्दौली(उत्तर प्रदेश) है, परंतु कार्यक्षेत्र की वजह से गुवाहाटी (असम)में हैं। जन्मतिथि पन्द्रह जनवरी सन् उन्नीस सौ चौहत्तर है। आपके आदर्श -संत कबीर,दिनकर व निराला हैं। स्नातकोत्तर (हिन्दी व अर्थशास्त्र),बी. एड.,बी.टेक (सिविल),पत्रकारिता व विद्युत में डिप्लोमा की शिक्षा प्राप्त श्री शाह का मेघालय में व्यवसाय (सिविल अभियंता)है। रचनात्मकता की दृष्टि से ऑल इंडिया रेडियो पर काव्य पाठ व परिचर्चा का प्रसारण,दूरदर्शन वाराणसी पर काव्य पाठ,दूरदर्शन गुवाहाटी पर साक्षात्कार-काव्यपाठ आपके खाते में उपलब्धि है। आप कई साहित्यिक संस्थाओं के सदस्य,प्रभारी और अध्यक्ष के साथ ही सामाजिक मीडिया में समूहों के संचालक भी हैं। संपादन में साहित्य धरोहर,सावन के झूले एवं कुंज निनाद आदि में आपका योगदान है। आपने समीक्षा(श्रद्धार्घ,अमर्त्य,दीपिका एक कशिश आदि) की है तो साक्षात्कार( श्रीमती वाणी बरठाकुर ‘विभा’ एवं सुश्री शैल श्लेषा द्वारा)भी दिए हैं। शोध परक लेख लिखे हैं तो साझा संग्रह(कवियों की मधुशाला,नूर ए ग़ज़ल,सखी साहित्य आदि) भी आए हैं। अभी एक संग्रह प्रकाशनाधीन है। लेखनी के लिए आपको विभिन्न साहित्य संस्थानों द्वारा सम्मानित-पुरस्कृत किया गया है। इसी कड़ी में विविध पत्र-पत्रिकाओं में अनवरत प्रकाशन जारी है। अवधेश जी की सृजन विधा-गद्य व काव्य की समस्त प्रचलित विधाएं हैं। आपकी लेखनी का उद्देश्य-हिन्दी भाषा एवं साहित्य के प्रति जनमानस में अनुराग व सम्मान जगाना तथा पूर्वोत्तर व दक्षिण भारत में हिन्दी को सम्पर्क भाषा से जनभाषा बनाना है। 

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