प्राकृतिकता बनाम कृत्रिमता

लिली मित्रा
फरीदाबाद(हरियाणा)
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प्राकृतिकता ईश्वर की देन है,और कृत्रिमता मानव की। वह ईश्वर प्रदत्त हर स्वाभाविक वस्तु को अपनी सुविधानुसार काट-छांटकर एक नया रूप दे देता है।
पैरों के नीचे नरम दूब का मखमली एहसास,किसको नहीं प्रिय!! तो दीजिए इंसानी सोच को दाद,ऐसी हवाई चप्पलें बना दीं जिसकी सतह पर कृत्रिम हरी घास उगा दी।पहाड़ों पर छुट्टियां बिताना,प्रकृति के स्नेहिल अंचल में मन का सुकून खोजना,हम सभी को प्रिय है, पर पहाड़ों की तलहटियों तक पैदल चल के जाना,तौबा!! फिर किया कमाल इंसानी सोच ने,और काटकर पहाड़, वहाँ पहुँचने की राह बना डाली। अब तो डर है कि कहीं सारे पहाड़ सपाट मैदान ही न बन जाएं,और मनुष्य अपनी बुद्धि बल पर कृत्रिम पहाड़ बनाने की युक्ति भी न खोज निकाले। वैसे दिल्ली का ‘ओखला डंपिंग ग्राउंड’ अब पहाड़ी इलाके जैसा ही आकार पा रहा है।
गरमियों में पहले बच्चे ननिहाल-ददिहाल जाते थे माँ के साथ,वहाँ ताल-तलैया,नदी देखने को मिलती थी। अब तो नानियों-दादियों के ननिहाल-ददिहाल भी आधुनिक,वहाँ अब ‘वाॅटर पार्क’ दिखते हैं। अब अपनी ही कहूँ तो,भावी भविष्य की आधुनिक दादी बनने की कतार में कतारबद्ध हूँ। कहने का तात्पर्य ये कि,धीरे-धीरे कृत्रिमता प्राकृतिकता पर हावी होती जा रही है। यह कृत्रिमता मात्र हमारे प्राकृतिक परिवेश में ही नहीं,अपितु मानवीय आचरण पर भी अपना वर्चस्व स्थापित करती जा रही है।
कार्य-कारण पर प्रकाश नहीं डालना चाहती क्योंकि,जब हम इतने अधिक बुद्धिमान हो चुके हैं तथा लगातार और अधिक बुद्धिमान होने के लिए विकासशील हैं,उस एवज में ‘कार्य और कारण’ क्या हैं,इससे सभी भली-भांति अवगत हैं। अतः इस पर व्यर्थ चर्चा न करके अपनी अनुभूतियों को लिखना श्रेयस्कर है।
अरावली की पहाड़ियों को काटकर चौड़ी सड़कें बन गई हैं और बन भी रही हैं। उन्हीं सड़कों पर अपनी कार से कई बार गुजरी हूँ। एक तरफ अनछुआ-अनगढ़ अरावली का बीहड़ है, जहाँ टेसू तथा अन्य जंगली पादप-वनस्पतियों के खुशनुमा से बेतरबीब जंगल हैं,तो दूजी तरफ मानव निर्मित बड़ी खूबसूरती से तराशे हुए उपवन हैं।
इन उपवनों की सैर करने पर मन सदा विस्मृत,आंखें अचम्भित,दिमाग उलझा हुआ रहता है। इसका कारण अवश्य बताना चाहूँगी। बरगद का विशालकाय वृक्ष एक रोटी खाने वाली परात में उगा हुआ,केले का पेड़,गोल तने के बजाए फव्वारेदार निकलते पत्तों को लिए,नाना प्रकार की झाड़ियां कहीं हाथीं के आकार की छंटी हुई तो कहीं जिराफ के आकार में ढली। उस पर हरियाली देखने और स्वच्छ वायु खींचने के लिए उमड़ता लोगों का विशाल झुंड!!!
अब यहाँ के कृत्रिम परिवेश में आकर मन विस्मृत,आँखें अचम्भित और दिमाग़ उलझा हुआ ही रहेगा ना ?
इसके विपरीत अरावली की अनछुई प्राकृतिकता की ओर देखने मात्र से मन शान्त,नयन मुदित और दिमाग सुलझ-सा जाता है,परन्तु आशंकित हूँ कृत्रिमता की बेलगाम होती प्रवृत्ति से। कहीं ऐसा न हो कि,मानव सोच इन प्राकृतिक पहाड़ियों के बीहड़ों के ‘बॅनशाई’ बना दें और इनका नाम रख दें-‘द अरावली हिल्स!’ लोगों का हुजूम यहाँ छुट्टियां बिताने पहुँचें,शांति और सुकून की तलाश में परन्तु विस्मृत,अचम्भित और आन्दोलित मन लिए वापस लौट आएं।
अरावली की पहाड़ियों को एक उदाहरण के तौर पर लेकर मैंने अपने भाव व्यक्त किए हैं,क्योंकि तूफानी गति से अपने मद में मदमाती कृत्रिमता की बुलेट-ट्रेन पृथ्वी की कई अनछुई-अनगढ़ प्राकृतिकता को रौंदती आ रही है। मन आशंकित है,कहीं निकट भविष्य में’प्राकृतिकता’ शब्द को परिभाषित करने के लिए हमारे पास उदाहरण भी बचेंगें या नहीं…??

परिचय- ब्लॉग पर भी लेखन में सक्रिय लिली मित्रा का निवास फरीदाबाद (हरियाणा)में है। आपने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर(राजनीति शास्त्र) किया है एवं लेखन तथा नृत्य के प्रति विशेष लगाव से कार्य निष्पादन करती हैं। लिली मित्रा की रचनाएं कई ऑनलाइन पत्रिकाओं में श्रेष्ठ रुपक एंव श्रेष्ठ ब्लाॅग के रुप में चुनी गई हैं। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में रचनाओं का प्रकाशन काव्य,बाल कविताएं,कहानियां एवं लघुकथा के रुप में हो चुका है। श्रीमती मित्रा हिन्दी भाषा के प्रति स्वाभाविक आकर्षण रखती हैं। इनके अनुसार भावनाओं की अभिव्यक्ति साहित्य एवं नृत्य के माध्यम से प्रस्तुत करने का यह आरंभिक सिलसिला है। इनकी रुचि नृत्य,लेखन,रसोई और साहित्य पाठन विधा में भी है। कुछ समय पहले ही लेखन शुरू करने वाली श्रीमती मित्रा बतौर गृहिणि शौकिया लेखक हैं। आपकी विशेष उपलब्धि में एक समूह द्वारा आयोजित काव्यलेखन स्पर्धा में दिल्ली के ‘एवान-ए-ग़ालिब’ में ‘काव्य शिखर’ सम्मान,ऑनलाइन वेबसाइट पर कई लेख ‘बेस्ट ब्लाॅग’ एंव ‘फीचर्ड’ सहित एक वेबसाइट पर दो बार ‘शीर्षस्थ कवि’ सूची में नाम आना है। लेखन विधा-स्वतंत्र सृजन,आलेख,बाल रचनाएं है। आपकी लेखनी का उद्देश्य हिन्दी भाषा के प्रति अनुराग है।

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  1. अत्यंत, चिन्तानयुक्त आलेख, उम्दा लेखन, मंगलकममनाए

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