प्राकृतिक संसाधन जीवन का बहुमूल्य साधन

हेमेन्द्र क्षीरसागर
बालाघाट(मध्यप्रदेश)
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हम जिस पर्यावरण में रहते हैं वह अनेक घटकों से मिलकर बना है। इसका
प्रत्येक घटक हमें किसी न किसी रूप में लाभ पहुंचाता हैं। हमारी आवश्कताएं चाहे मौलिक हो,भौतिक हो,सामाजिक हो,अर्थिक हो,अथवा सांस्कृतिक हो,

इनकी पूर्ति प्रकृति से ही संभव होती है। प्रकृति ने हमें भूमि,जल,वायु,खनिज, ईधन,सूर्य का प्रकाश और वन आदि ऐसे संसाधन विरासत में दिए हैं,जो हमारे जीवन का बहुमूल्य साधन हैं। यह तो हम सभी जानते हैं कि संसाधन सम्पूर्ण पृथ्वी पर असमान रूप से वितरित हैं तथा इनका उपयोग मनुष्य के क्रिया-कलापों पर निर्भर करता है। यदि इन संसाधनों का उचित प्रयोग करें तो मानव जाति का कल्याण और यदि दुरूपयोग हो तो विनाश निश्चित है।
अलबत्ता,समग्र राष्ट्रीय विकास और देश के नागरिकों के लिए समुचित जीवन
परिस्थितियों की सुनिश्चितता के फलस्वरूप बढ़ती जनसंख्या ने भारत में
प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव डाला है। समस्या की गंभीरता सीमित प्राकृतिक
संसाधनों के अंधाधुंध दोहन के साथ उन्हें भविष्य के वास्ते सुरक्षित और संरक्षित रखने पर कम ध्यान देने के कारण बढ़ गई हैं,जो हमारे देश के विकास और प्रगति के लिए खतरा है। मानव ने प्राकृतिक संसाधनों के विवेकहीन और अनियंत्रित उपभोग से स्वयं को प्रदूषण, भूक्षरण,जल संसाधनों के अवक्रमण,
वनोन्मूलन और जैव-विविधता के लोप के रूप में प्रकट किया है। हम इन  कारकों को पारिस्थितिकी व्यवस्था के लिए खतरा और यहाँ तक कि अपने
स्वास्थ्य और जीवन के लिए खतरे के रूप में देख सकते हैं।
हाल ही में संयुक्त राष्ट्र संघ के आंकलन के अनुसार भारत को अनेक घातक
प्राकृतिक आपदाओं की वजह से हर साल लगभग ९.८ अरब डालर की क्षति होती हैं। देश की ८.६ फीसदी जमीन भूकम्प के लिए संवेदनशील मानी जाती है,जबकि ८.५ फीसदी पर चक्रवात का खतरा बना रहता है। वीभत्स,बाढ़, भूस्खलन और आग आपदा के खतरों को कम करने से संबंधित संयुक्त राष्ट्र संघ के विभाग के आंकलन के अनुसार यह सब  नुकसान मानवघटित प्राकृतिक असंतुलन का दुष्परिणाम है,जिसे हम और आने वाली पीढ़ी भी झेलेगी।
अंतनिर्नहित पर्यावरण वैज्ञानिकों के एक अंतर्राष्ट्रीय समूह ने हाल ही में एक अध्ययन कर बताया है कि प्राकृतिक संसाधनों के अत्यधिक दोहन से
हमारा ग्रह पृथ्वी उस खतरनाक बिंदु पर पहुंच गया है,जहां से वापस लौटना
अब संभव नहीं है। या यह कहें कि अपरिवर्तनीय स्थिति बन गई है। गैर प्रजातांत्रिक ढंग से प्राकृतिक संसाधनों का दोहन एवं कु-प्रबंधन दुनियाभर में आज भी जारी है। इस पृथ्वी पर जो संसाधन एक समय अंतहीन लगते थे,
उनके बारे में अब यह स्पष्ट हो गया है कि सभी सीमित हैं फिर चाहे वह खनिज हो,
पेट्रोल हो,कोयला हो या प्राकृतिक गैसादि हो।
दरअसल,हमारे देश में प्राकृतिक संसाधनों के दोहन के तौर पर जनसंख्या
वृद्धि और जीवन की बुनियादी आवश्यकताओं गोया भोजन,ऊर्जा, रोजगार,स्वास्थ्य और आवास की बढ़ती मांग है। अल्प अवधि के लाभों के लिए विभिन्न प्रकार की विकासात्मक कूटनीतियां भी प्राकृतिक संसाधनों के अत्यधिक शोषण और पर्यावरणीय क्षति के लिए उत्तरदायी हैं। लोगों का तुच्छ और स्वार्थपूर्ण रवैया समस्या को और अधिक गंभीर करता है। परिष्कृत कृषि
भूमि पर विकासमूलक,आवासीय और औद्योगिकरणादि और खेती में रासायनिक खादों और कीटनाशकों का उपयोग अन्तोतोगत्वा मृदा की उत्पादकता को नुकसान
पहुंचाता है।
लिहाजा,प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन के लिए कूटनीतियां बढ़ती आबादी और बढ़ती मांग के दृष्टिगत दीर्घकालीन होना आवश्यक है। प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन
नीतियों के दीर्घकालिक पहलू जनसंख्या, निर्धनता और असमानता की समस्याओं से संबंधित हैं। अतः कृषि, निर्धनता,वानिकी और जैव-विविधता से संबंधित विभिन्न पर्यावरणीय नीतियों के प्रतिपादन के संबंध में एक समेकित सुधार के उपाय की आवश्यकता है। भू-आधारित संसाधनों के संरक्षण में कृषि में
संस्थागत सुधार एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकता है। इन प्रयासों की
सफलता को सुनिश्चित करने के लिए समुचित बजट,सार्थक योजना और कड़े
नियमों,प्रावधानों को धरातल में लाने की आवश्यकता है,किन्तु,प्रकृति से प्राप्त संसाधनों के प्रति हमारी सोच भ्रमात्मक है।
हम यह मानकर चलते हैं कि प्रकृति से प्राप्त संसाधन हमारे लिए ही हैं। हम
इसका जितना चाहें जैसा चाहें वैसा उपयोग कर सकते हैं,किन्तु यह सही नहीं
है। प्राकृतिक संसाधन प्रकृति में सीमित मात्रा में ही हैं। एक दिन ये समाप्त हो जाएंगे। यह हमारे हाथ में हैं कि हम कितनी मितव्ययिता के साथ इन्हें खर्च करते हैं। यह साधन हमारी आगामी पीढ़ी की धरोहर भी हैं। हमारा दायित्व है कि हम उनके लिए इसे संरक्षित करें। बढ़ते असीमित जीवन तथा सम्पन्नता की दौड़ ने हमें संसाधनों के अति दोहन के लिए मजबूर कर दिया है।
वस्तुतः प्राकृतिक संसाधनों के दोषपूर्ण,विषम विभाजन और उपयोगिता का चिन्हांकन कर लेना चाहिए,क्योंकि यह प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से
पर्यावरणीय अवरोध में योगदान देते हैं। इस तरह असमानताएं सभी प्रकार की
समस्याएं उत्पन्न करती हैं। इसीलिए प्राकृतिक संसाधन का संरक्षण और
सवर्धन करना सर्वोचित होगा। प्रत्युत प्राकृतिक संसाधन के इस संकट से निपटने के लिए संसाधन के सतत् दोहन से उत्पन्न प्रदूषण को दृष्टिगत रखते हुए गैर वैकल्पिक संसाधन स्रोत के उपयोग हेतु प्रोत्साहित होना और किया जाना चाहिए। याद रहे,आज सीमित प्राकृतिक साधन को बचाएंगें तो कल आगामी
पीढ़ी की यह धरोहर हमारे जीवन को बचाएगी।

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