प्रारंभिक शिक्षण को अधिक प्रभावी बनाना होगा

रश्मि चौधरी ‘रिशिमा’
इंदौर (मध्यप्रदेश)
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‘टीचर जी,आज तो कहानी  सुनाइए…’
‘बहुत मजा आता है जब आप कहानी सुनाते  हो…’ और हिन्दी की किताब बालभारती  का पन्ना खोलकर छात्रा बोली-‘ये सांप और चीते  वाली कहानी सुनाइए…’
‘आज तो हम कहानी ही सुनेंगे…’ बाकी सभी छात्राओं ने भीे समर्थन  किया।
ऐसा वाकया पहली बार नहीं हुआ मेरी कक्षा में,आए-दिन बच्चों की उत्सुकता रहती है कि क्या पढ़ेंगे ?
छोटे बच्चों की कक्षाओं के शिक्षण की बात ही अलग है…कब शिक्षक से हम बच्चे बन जाते हैं,पता ही नहीं चलता। आज शिक्षा के क्षेत्र में नवाचार की हर जगह बात होती है। छोटे बच्चों को पढ़ाने के लिए नई नई विधियों का उपयोग किया जाता है। आज यह बात स्वीकारने का वक़्त है कि सिर्फ पुस्तकों  के माध्यम से या…बच्चों को डराकर…छड़ी दिखाकर नहीं पढ़ाया जा सकता। आमतौर पर कक्षाओं में श्याम पट और ज्यादा से ज्यादा एक-दो तस्वीरें होती हैं, परन्तु आज के बच्चे शिक्षक के अनुभव से ही सीखते हैं। उन्हें क्रिया-कलाप और खेलों के माध्यम से ही पढ़ाना होगा। शिक्षण-अधिगम क्रिया को प्रभावी बनाने के लिए शिक्षकों को अब बच्चों के बीच जाकर शामिल होना पड़ेगा। अब समय है कि,छात्र की आवश्यकता के अनुरूप शिक्षण किया जाए। शिक्षक को बच्चों के सामने नहीं,उनके बीच जाकर पढ़ाना होगा। बच्चा तभी सीखेगा  जब उसे कुछ रचनात्मकता मिलेगी  और इसके लिए शिक्षक को खेल एवं गतिविधियों का उपयोग करना ही होगा। बच्चे अपने खुद के अनुभव,प्राकृतिक वस्तुओं,किस्से- कहानियों,कविताओं से ज्यादा सीखते हैं,सिर्फ शिक्षकों के व्याख्यानों से नहीं। बच्चे हमारा व्यवहार देखते हैं और भावनाओं की अनुभूति करते हैं। इसके  अलावा बच्चे आपस में भी एक- दूसरे से सीखते हैं,अतः उन्हें आपस में अपने अनुभव तथा  विचार सम्प्रेषित करने के लिए कक्षा में खेल और गतिविधियां  करवाना बहुत आवश्यक है। बच्चों को छोटे-छोटे समूहों में बांटकर यदि प्रतिदिन कार्य करवाया जाए तो उनमें अप्रत्याशित विकास होता है,साथ ही वे प्रबंधन भी स्वयं सीख जाते हैं।
यदि हमारे पास स्थान का अभाव है तो हम बरामदे या मैदान का उपयोग कर सकते हैं,आर्थिक समस्याएँ हैं तो आसपास की सामान्य वस्तुएँ जैसे-पत्थर,रेत, वृक्ष,पौधे आदि के उपयोग से भी बहुत प्रभावी शिक्षण कर सकते हैं। यदि हफ्ते में एक बार भी आप बच्चों को कहानी,कविता आदि सुनाते हैं तो आपकी कक्षा की बात ही अलग होगी। आज जब ‘कहानी उत्सव’ और ‘मिल बाँचें’ जैसे कार्यक्रमों का जिक्र होता है तो बड़ा ही फक्र  होता है कि शासन का भी ध्यान इस तरफ है। इस लेख के माध्यम से सभी शिक्षकों से विनय करती हूँ कि शिक्षक केन्द्रित  अधिगम न करवाएं,बाल केन्द्रित अधिगम करवाएँ,तथा अपने शिक्षण को और अधिक प्रभावी बनाएँ।

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