फव्वारा

सुनील जैन `राही`
पालम गांव(नई दिल्ली)

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वह बारात के गुजरने का इंतजार कर रहा था। जैसे ही बारात की रौशनियों की जगमगाहट कम हुई,उसने कागज का पुलिंदा उठाया और फव्वारे के पास जा लेटा। गर्मी के मौसम में सड़क किनारे बना फव्वारा रात को फटेहाल लोगों से सज जाता है। चांदनी रात में गरीबी में और चमक आ जाती है।
कुछ फव्वारे धर्म निरपेक्ष की तरह आय निरपेक्ष होते हैं। ये फव्वारे बाजारों में होते हैं,जहाँ इनके किनारे हर आय वर्ग का व्यक्ति बैठ सकता है,लेकिन फव्वारे आय न होने की वजह से सूख जाते हैं,केवल रह जाता है फव्वारा। जब तक इन फव्वारों का राजनीतिकरण नहीं होगा,तब तक ये फव्वारे नहीं चलेंगे। जब ये फव्वारे नहीं चलते,तब गरीब और फटेहाल लोगों से आबाद रहते हैं। फव्वारे किसी मुख्यमंत्री से कम नहीं होते। जब तक चलते हैं,तो मुख्यमंत्री और खराब हो गए राज्यपाल।
पहले शहर नहीं होते थे,नगर हुआ करते थे। किले भी होते थे उनमें होते थे,जहाज महल,मुमताज महल या अनारकली महल और इनमें होता,एक फव्वारा। महलों का जमाना लद गया,लेकिन महल अब भी हैं। कुछ जीर्ण-शीर्ण,तो कुछ आलीशान होटल के रूप में विख्यात।
प्रजातंत्र में एक राजा नहीं होता,एक रजवाड़ा नहीं होता। एक ही स्थान पर सारी विलासिता केन्द्रित नहीं होती। अब एक ही शहर में कई राजा होते हैं,कई रजवाड़े होते हैं,कई मुहल्ले होते हैं जो,रजवाड़े से कम नहीं होते। उन मुहल्लों में राजाओं जैसे कई महल होते हैं,जिन्हें कोठियां कहते हैं।
कुछ लोग शहर से दूर रजवाड़े के रूप में फार्म हाउस बनाते हैं,उसे रजवाड़े के रूप में संवार लेते हैं। उसमें होता है,स्वीमिंग, नाचने-गाने के लिए मंच,राजाओं के बैठने के लिए विशाल कुर्सीनुमा सिंहासन। उन राजाओं की खातिरदारी के लिए नौकर-चाकर होते हैं। नाच रात को भी होता है। यहां छेड़ने से शुरूआत नहीं होती,छेड़ना तो ऊंट के मुंह में जीरे वाले बात होती हैं। यहां तो होती हैं-बहुत-बहुत बड़ी-बड़ी बातें,सौदे,सत्ता की उठापठक, हार्स-ट्रेडिंग और वह सब कुछ,जो हरम में होता था।
यह सब बताना जरूरी था। ये सब महसूस करने के पहले सभी फव्वारे के पास जाते,घूमते,इठलाते हैं,बहकते हैं और फिर फव्वारे की बूंदों को वहीं अकेला छोड़ चले जाते हैं।
फव्वारों पर रईसों,राजाओं,मंत्रियों,संत्रियों का एकाधिकार है। गरीब इनके पास फटक नहीं सकता। उसे दूर से भी नहीं देख सकता। वह अपनी कड़कड़ाती ठंड को,फव्वारे की ठंडक से दूर नहीं कर सकता,क्योंकि कड़कडाती ठंड में फव्वारे अवश्य चलते हैं।
गरीब इन फव्वारों के दूषित पानी का उपयोग नहीं कर सकता। वह पानी पी नहीं सकता। वह पीना चाहता है,लेकिन पानी में विलासिता की बू आती है। पानी केवल सुंगधित युवाओं को रिझाने के लिए होता है। गरीब आदमी उस पानी से नहा नहीं सकता। उसकी पहुंच उन नालियों तक नहीं,जहां से फव्वारा शुरू होता और जहां पर खत्म होता है। इन फव्वारों की पहुंच मंत्रियों से लेकर संत्रियों तक होती है। हर किस्म की जलालत इस पानी में मिली हुई होती है। इसीलिए,गरीबों को इनसे काफी दूर रखा जाता है।
अब शहर के मुख्य चौराहों पर,सड़क किनारे फव्वारे बनाये जा रहे हैं। विदेशियों को आकर्षित करने,निवेश की इच्छा से, विदेश की इच्छा से। सड़क किनारे पेड़ लगाये गए थे,जैसे अब फव्वारे लगाये जा रहे हैं। ये पेड़ भ्रष्टाचार का प्रतीक बने खड़े हैं। पुलिस उन्हीं पेड़ों की छाया में काली कमाई करती है। अभी तक इन फव्वारों का भ्रष्टाचार सामने नहीं आया है। फव्वारों के पास कभी-कभार कोई गरीब अपना मुँह धो लेता है,लेकिन अगले ही पल व पानी से उठ रही सांस्कृतिक संड़ाध,व्यभिचार की गंध और जांच की आंच में सुलग रहे अफसरों के मगरमच्छीय आँसूओं के नमकयुक्त पानी से उसका मुँह झुलस जाता है। अपने गंदे गमछे से मुँह पोंछता है और दूर से आती वीआईपी गाड़ियों के सायरन की आवाज और रौशनी से बचने के लिए उसी फव्वारे के कोने में दुबक जाता है,ताकि वह फव्वारे की बदसूरती का प्रतीक न बन जाए।
फव्वारे चल रहे हैं,देश भी चल रहा है। नये फव्वारे बनाये जा रहे हैं। नई कच्ची कालोनियां,उन्हें पक्का करने के आश्वासन,पक्की कालोनियों में विधायक फण्ड चमक रहा है, गरीबों की झोपड़ियों में विधायक वोट दमक रहा है,दारू और दाम के रूप में।
फव्वारा होना चाहिए,हर शहर में होना चाहिए। इससे गरीबी को हटाया जा सकता है,गरीबों के जीवन स्तर में सुधार लाया जा सकता हैl गरीब भी अमीर होने का सपना देख सकते हैं,फव्वारे पर कभी-कभी गरीब भी अपना गंदा मुंह साफ कर सकते हैं। गर्मी की रातों में गरीब फव्‍वारे के किनारे अंधेरे में महलों का आनंद उठा सकते हैं।
देश के विकास के लिए हर चौराहे पर फव्‍वारा होना जरूरी है। तन ढंकने के लिए कपड़ा भले ही ना हो, पीने के लिए पानी ना हो, हर प्रकार की गंदगी साफ करने के लिए पानी ना हो, लेकिन हर चौराहे फव्‍वारा होना चाहिए।

परिचय-आपका जन्म स्थान पाढ़म(जिला-मैनपुरी,फिरोजाबाद)तथा जन्म तारीख २९ सितम्बर है।सुनील जैन का उपनाम `राही` है,और हिन्दी सहित मराठी,गुजराती(कार्यसाधक ज्ञान)भाषा भी जानते हैं।बी.कॉम.की शिक्षा खरगोन(मध्यप्रदेश)से तथा एम.ए.(हिन्दी,मुंबई विश्वविद्यालय) से करने के साथ ही बीटीसी भी किया है। पालम गांव(नई दिल्ली) निवासी श्री जैन के प्रकाशन खाते में-व्यंग्य संग्रह-झम्मन सरकार,व्यंग्य चालीसा सहित सम्पादन भी है।आपकी कुछ रचनाएं अभी प्रकाशन में हैं तो कई दैनिक समाचार पत्रों में लेखनी का प्रकाशन होने के साथ आकाशवाणी(मुंबई-दिल्ली)से कविताओं का सीधा और दूरदर्शन से भी कविताओं का प्रसारण हो चुका है। राही ने बाबा साहेब आम्बेडकर के मराठी भाषणों का हिन्दी अनुवाद भी किया है। मराठी के दो धारावाहिकों सहित करीब १२ आलेखों का अनुवाद भी कर चुके हैं। इतना ही नहीं,रेडियो सहित विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में ४५ से अधिक पुस्तकों की समीक्षाएं प्रसारित-प्रकाशित हो चुकी हैं। आप मुंबई विश्वविद्यालय में नामी रचनाओं पर पर्चा पठन भी कर चुके हैं। कुछ अखबारों में नियमित व्यंग्य लेखन करते हैं। एक व्यंग्य संग्रह अभी प्रकाशनाधीन हैl नई दिल्ली प्रदेश के निवासी श्री जैन सामाजिक गतिविधियों में भी सक्रीय है| व्यंग्य प्रमुख है,जबकि बाल कहानियां और कविताएं भी लिखते हैंl आप ब्लॉग पर भी लिखते हैंl आपकी लेखनी का उद्देश्य-पीड़ा देखना,महसूस करना और व्यक्त कर देना है।

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