फिर युद्ध न हो अयोध्या में

डॉ.वेदप्रताप वैदिक
गुड़गांव (दिल्ली) 
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कुम्भ के अवसर पर आयोजित धर्म-संसद में विश्व हिंदू परिषद ने जो घोषणा की है,उसके कारण देश के रामभक्त बेहद परेशान दिख रहे हैं। उन्हें आशा थी कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और विहिप के दबाव के चलते मोदी सरकार राम मंदिर का निर्माण अयोध्या में तुरंत शुरु कर देगी। संघ और विहिप,दोनों ने अदालत के फैसले का इंतजार करने का इरादा छोड़ दिया था और प्रधानमंत्री मोदी से आग्रह किया था कि अयोध्या में राम मंदिर बनाने के लिए वह अध्यादेश जारी करें, लेकिन अब इन संगठनों ने अगले चार-पांच माह के लिए चुप्पी साध ली है। वे न तो कोई मांग करेंगे और न ही कोई आंदोलन करेंगे,क्योंकि इसे वे एक घटिया चुनावी मुद्दा नहीं बनाना चाहते। इसमें शक नहीं कि इस मुद्दे को लेकर सारे दल जूतों में दाल बांटते और अन्य महत्वपूर्ण मुद्दे खूंटी पर टंग जाते। सबसे ज्यादा नुकसान भाजपा का होता। उसकी दशा कांग्रेस-जैसी हो जाती। जो नई सरकार बनती,उसका क्या पता,वह कैसी होती ? शायद वह राम मंदिर के मुद्दे को मोदी सरकार की ही तरह दरी के नीचे सरका देती। या खुद राम मंदिर खड़ा करके वह भाजपा,संघ और विहिप की जड़ों को मट्ठा पिला देती। कांग्रेस ने तो ऐसा संकेत भी दे दिया है। इस मामले में मेरी स्पष्ट राय है कि यह मामला न अदालत सुलझा सकती है और न ही कोई आंदोलन! ये दोनों रास्ते ऐसे हैं,जिनसे राम-मंदिर का मामला आगे जाकर भारत के गले का पत्थर बन जाएगा। इस मामले का स्थायी और सर्वमान्य हल यह है कि अयोध्या की इस कुल ७० एकड़ जमीन में एक सर्वधर्म तीर्थ खड़ा किया जाए,जहां राम का अपूर्व विश्व-स्तरीय सुंदर मंदिर बने और शेष स्थानों पर भारत के ही नहीं,विश्व के सभी प्रमुख धर्मों के पूजास्थल बन जाएं। उनका एक संग्रहालय और पुस्तकालय भी बने। सरकार ने अधिग्रहित जमीन उसके मालिकों को वापिस लौटाने की जो याचिका अदालत को दी है,वह उसने उचित नहीं किया है,उसे वह तुरंत वापस ले। स्वामी स्वरुपानंदजी भी तीनों याचिकाकर्ताओं से बात करें,उन्हें सहमत करवाएं। २१ फरवरी से आंदोलन न छेड़ें। सांसारिक नौकरशाहों के नौकरों याने हमारे नेताओं पर आध्यात्मिक कृपा करें। उनकी बुद्धि और विवेक को जागृत करें। अयोध्या को २१ वीं सदी की नई युद्ध-भूमि न बनने दें।
परिचय-डाॅ.वेदप्रताप वैदिक की गणना उन राष्ट्रीय अग्रदूतों में होती है,जिन्होंने हिंदी को मौलिक चिंतन की भाषा बनाया और भारतीय भाषाओं को उनका उचित स्थान दिलवाने के लिए सतत संघर्ष और त्याग किया। पत्रकारिता सहित राजनीतिक चिंतन, अंतरराष्ट्रीय राजनीति और हिंदी के लिए अपूर्व संघर्ष आदि अनेक क्षेत्रों में एकसाथ मूर्धन्यता प्रदर्शित करने वाले डाॅ.वैदिक का जन्म ३० दिसम्बर १९४४ को इंदौर में हुआ। आप रुसी, फारसी, जर्मन और संस्कृत भाषा के जानकार हैं। अपनी पीएच.डी. के शोध कार्य के दौरान कई विदेशी विश्वविद्यालयों में अध्ययन और शोध किया। अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त करके आप भारत के ऐसे पहले विद्वान हैं, जिन्होंने अंतरराष्ट्रीय राजनीति का शोध-ग्रंथ हिन्दी में लिखा है। इस पर उनका निष्कासन हुआ तो डाॅ. राममनोहर लोहिया,मधु लिमये,आचार्य कृपालानी,इंदिरा गांधी,गुरू गोलवलकर,दीनदयाल उपाध्याय, अटल बिहारी वाजपेयी सहित डाॅ. हरिवंशराय बच्चन जैसे कई नामी लोगों ने आपका डटकर समर्थन किया। सभी दलों के समर्थन से तब पहली बार उच्च शोध के लिए भारतीय भाषाओं के द्वार खुले। श्री वैदिक ने अपनी पहली जेल-यात्रा सिर्फ १३ वर्ष की आयु में हिंदी सत्याग्रही के तौर पर १९५७ में पटियाला जेल में की। कई भारतीय और विदेशी प्रधानमंत्रियों के व्यक्तिगत मित्र और अनौपचारिक सलाहकार डॉ.वैदिक लगभग ८० देशों की कूटनीतिक और अकादमिक यात्राएं कर चुके हैं। बड़ी उपलब्धि यह भी है कि १९९९ में संयुक्त राष्ट्र संघ में भारत का प्रतिनिधित्व किया है। आप पिछले ६० वर्ष में हजारों लेख लिख और भाषण दे चुके हैं। लगभग १० वर्ष तक समाचार समिति के संस्थापक-संपादक और उसके पहले अखबार के संपादक भी रहे हैं। फिलहाल दिल्ली तथा प्रदेशों और विदेशों के लगभग २०० समाचार पत्रों में भारतीय राजनीति और अंतरराष्ट्रीय राजनीति पर आपके लेख निरन्तर प्रकाशित होते हैं। आपको छात्र-काल में वक्तृत्व के अनेक अखिल भारतीय पुरस्कार मिले हैं तो भारतीय और विदेशी विश्वविद्यालयों में विशेष व्याख्यान दिए एवं अनेक अन्तरराष्ट्रीय सम्मेलनों में भारत का प्रतिनिधित्व किया है। आपकी प्रमुख पुस्तकें- ‘अफगानिस्तान में सोवियत-अमेरिकी प्रतिस्पर्धा’, ‘अंग्रेजी हटाओ:क्यों और कैसे ?’, ‘हिन्दी पत्रकारिता-विविध आयाम’,‘भारतीय विदेश नीतिः नए दिशा संकेत’,‘एथनिक क्राइसिस इन श्रीलंका:इंडियाज आॅप्शन्स’,‘हिन्दी का संपूर्ण समाचार-पत्र कैसा हो ?’ और ‘वर्तमान भारत’ आदि हैं। आप अनेक राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कारों और सम्मानों से विभूषित हैं,जिसमें विश्व हिन्दी सम्मान (२००३),महात्मा गांधी सम्मान (२००८),दिनकर शिखर सम्मान,पुरुषोत्तम टंडन स्वर्ण पदक, गोविंद वल्लभ पंत पुरस्कार,हिन्दी अकादमी सम्मान सहित लोहिया सम्मान आदि हैं। गतिविधि के तहत डॉ.वैदिक अनेक न्यास, संस्थाओं और संगठनों में सक्रिय हैं तो भारतीय भाषा सम्मेलन एवं भारतीय विदेश नीति परिषद से भी जुड़े हुए हैं। पेशे से आपकी वृत्ति-सम्पादकीय निदेशक (भारतीय भाषाओं का महापोर्टल) तथा लगभग दर्जनभर प्रमुख अखबारों के लिए नियमित स्तंभ-लेखन की है। आपकी शिक्षा बी.ए.,एम.ए. (राजनीति शास्त्र),संस्कृत (सातवलेकर परीक्षा), रूसी और फारसी भाषा है। पिछले ३० वर्षों में अनेक भारतीय एवं विदेशी विश्वविद्यालयों में अन्तरराष्ट्रीय राजनीति एवं पत्रकारिता पर अध्यापन कार्यक्रम चलाते रहे हैं। भारत सरकार की अनेक सलाहकार समितियों के सदस्य,अंतरराष्ट्रीय राजनीति के विशेषज्ञ और हिंदी को विश्व भाषा के रूप में प्रतिष्ठित करने के लिए कृतसंकल्पित डॉ.वैदिक का निवास दिल्ली स्थित गुड़गांव में है।

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