बदलते लोग

स्वीटी गोस्वामी भार्गव
आगरा(उत्तर प्रदेश)

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बदलते जो देखा लोगों को तो हम
खुद को बदलने को मजबूर हो गए,
इससे पहले क़ि करें कुछ लोग हमको
नजरअंदाज हम खुद ही उनसे दूर हो चले,
कहें भी किसी से तो क्या
वो सारे अपने हैं,
पर पता नहीं कैसे अपने हैं
बचपन से सुना था क़ि अपने वो होते हैं,
जो तकलीफों में साथ देते हैं
अपने वो होते हैं जो,
गिरते वक़्त में सम्भलने के लिए अपना
हाथ देते हैं,
मगर जब होश सम्भाला तो परिभाषा
बहुत अलग मिली अपनों की,
बस कर्तव्य की इतिश्री की
और पल्ला झाड़ने के लिए सारे दोष
मढ़ते रहे मेरे सिर पर मेरे अपने,
मैंने कब कहा क़ि मुझे चाहिए कोई सम्बल
बस इतना ही तो चाहा था क़ि,
झूठ के आगे न झुकाएं मुझे और
सत्य के साथ खड़ा रहने दें मुझे मजबूती से,
किन्तु अपनों ने क्या खूब अपनापन
निभाया है गैर को अपना लिया,
उसके महाझूठ के साथ
और मुझसे धीरे-धीरे अपना पिंड छुड़ाया,
आज टूटा-टूटा और जीर्ण-शीर्ण-सा
हो गया है हृदय इन आघातों को
झेल-झेलकर,
आज जैसे लग गया है हृदय और
मन मस्तिष्क को अकेले और एकाकीपन
का रोग,
द्वन्द है चलता,और रहता है दिमाग में शोक
बचपन में साथ रहते हैं फिर,
कैसे बदल जाते हैं लोग…l

परिचय- स्वीटी गोस्वामी भार्गव का शहर-जिला आगरा(उत्तर प्रदेश)है। वर्तमान में आप आगरा स्थित काना पटेली में निवासरत हैं। परास्नातक(हिंदी एवं संस्कृत) तक शिक्षित श्रीमती भार्गव हिंदी अध्यापिका के पद पर कार्यरत हैं। लिखना आपका शौक है। लेखन विधा-गद्य एवं पद्य है। १६ वर्ष से हिंदी के साथ आप संस्कृत भी पढ़ा रही हैं। माँ सरस्वती की कृपा से आप आकाशवाणी में कविता वाचन कर चुकी हैं। भिन्न-भिन्न समाचार पत्रों में रचना प्रकाशन हो चुका है। आपको एक प्रकाशन से काव्य गौरव और मानवता रत्न सम्मान-पत्र के साथ ही महफ़िल-ए-गजल साहित्य समागम सम्मान-पत्र और शतकवीर सम्मान-पत्र भी प्राप्त हुआ है। श्रीमती भार्गव की लेखनी का उद्देश्य हिंदी को प्रचारित करना और महिला चेतना फैलाना है।

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