बरखा रानी आज़ा

कृणाल प्रियंकर
अहमदाबाद(गुजरात)
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जम के बरस जा,
तन भिगा
मेरा मन भिगा,
बंजर धरा को
हरित श्रृंगार दिला जा,
बरखा रानी आजा।
चातक बन रहा
निहारूं अंबर,
नयन में भरी है प्यास
व्याकुल है मन मोरा,
अब तेरे आने की आस
बिन तेरे ये मयूरा रोए,
देख उसे मोरानी भय उदास
बरखा रानी आज़ा।
छलिए बादल,
अब न छलना
दे जाकर संदेशा मेरा,
रिमझिम-रिमझिम
सावन बरसे अंखियन से मेरी,
व्यथित व्याकुल
मनवा तड़पे यादों में तेरी,
औऱ ना तड़पा
बस जल्दी से आ,
बरखा रानी अब मान भी जा॥
परिचय- गुजरात राज्य के अहमदाबाद के निवासी कृणाल प्रियंकर  ने वाणिज्य से स्नातक की पढ़ाई की है।आप वर्तमान में ग्रामीण विकास विभाग(गुजरात) में कार्यरत  हैं। आपको शुरु से ही कविताओं से विशेष लगाव रहा है,तथा कविताएं पढ़ना-लिखना बेहद पसंद है। आपके लेखन  का उदेश्य मन की खुशी है। 

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